Rashmirathi Karna Vadh | रश्मिरथी कर्ण वध | Rashmirathi Poem 7th sarg

रश्मिरथी कर्ण वध ( 7th sarg Rashmirathi Karna Vadh )  “ रश्मिरथी ” महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन और चरित्र पर रचा गया काव्य है। जिसमें उनके जीवन से लेकर मृत्यु तक की सभी घटनाएं सम्मिलित की गयी हैं। कर्ण के द्वारा कवि ने यह सन्देश हम तक पहुँचाने का प्रयास किया है कि मानव जीवन में किसी कुल या वंश में जन्म लेने से ही श्रेष्ठता नहींं आती। व्यक्ति उत्तम बनता है अपने गुणों और व्यव्हार से

रश्मिरथी किताब खरीदने के लिए
यहाँ क्लिक करें

रश्मिरथी के सप्तम सर्ग में कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध का वर्णन है। किस तरह भगवान् कृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध करते हैं। तो आइये पढ़ते हैं रामधारी दिनकर जी के शब्दों में रश्मिरथी कर्ण वध :-

Rashmirathi Karna Vadh
रश्मिरथी कर्ण वध

Rashmirathi Karna Vadh

निशा बीती, गगन का रूप दमका,
किनारे पर किसी का चीर चमका।
क्षितिज के पास लाली छा रही है,
अतल से कौन ऊपर आ रही है?

सँभाले शीश पर आलोक मण्डल,
दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरञ्चल,
किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी,
शिशिर-कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी,

खगों का स्पर्श से कर पङ्गु – मोचन,
कुसुम के पोंछती हिम – सिक्त लोचन,
दिवस की स्वामिनी आयी गगन में,
उड़ा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में।

मगर, नर बुद्धि – मद से चूर होकर,
अलग बैठा हुआ है दूर होकर,
उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे?
करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे?

मनुज विभाट् ज्ञानी हो चुका है,
कुतुक का उत्स पानी हो चुका है।
प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे?
सितारों के हृदय में राह खोजे?

विभा नर को नहीं भरमायगी यह?
मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह?
कभी मिलता नहीं आराम इसको,
न छेड़ो, हैं अनेकों काम इसको।

महाभारत मही पर चल रहा है,
भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।
मनुज ललकारता फिरता मनुज को,
मनुज ही मारता फिरता मनुज को।

पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,
सहेली सर्पिणी की हो चुकी है।
न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,
निगल ही जायगी सद्धर्म को वह।

मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें,
पिता के प्राण सुत के साथ छूटें,
मचे घनघोर हाहाकार जग में,
भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,

मगर, पत्थर हुआ मानव-हृदय है,
फ़क़त, वह खोजता अपनी विजय है.
नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह,
पतन के गर्त में भी जायगा वह।

पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में,
गिरे जिस रोज द्रोणाचार्य रण में,
बड़े धर्मिष्ठ, भावुक और भोले,
युधिष्ठिर-जीत के हित झूठ बोले।

नहीं थोड़े बहुत का भेद मानो,
बुरे साधन हुए तो सत्य जानो,
गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी,
अंगूठा ही नहीं, सम्पूर्ण तन भी।

नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर,
कलङ्कित शत्रु को, निज को अमर कर।
नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है,
हुआ राधेय नायक सैन्य का है।

जगा लो वह निराशा छोड़ करके,
द्विधा का जाल झीना तोड़ करके।
गरजता, “ज्योति के आधार! जय हो,
चरम आलोक मेरा भी उदय हो!

“बहुत धुधुआ चुकी, अब आग फूटे,
किरण सारी सिमट कर आज छूटे।
छिपे हों देवता! अङ्गार जो भी,
दबे हों प्राण में हुङ्कार जो भी,

“उन्हें पुञ्जित करो, आकार दो हे!
मुझे मेरा ज्वलित शृङ्गार दो हे!
पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,
विकतन! आज अपना तेज-बल दो!

“मही का सूर्य होना चाहता हूँ,
विभा का तूर्य होना चाहता हूँ।
समय को चाहता हूँ दास करना,
अभय हो मृत्यु का उपहास करना।

“भुजा की थाह पाना चाहता हूँ,
हिमालय को उठाना चाहता हूँ।
समर के सिन्धु को मथ कर शरों से,
धरा हूँ चाहता श्री को करों से।

“ग्रहों को खींच लाना चाहता हूँ
हथेली पर नचाना चाहता हूँ,
मचलना चाहता हूँ धरा पर मैं,
हँसा हूँ चाहता अङ्गार पर मैं।

“समूचा सिन्धु पीना चाहता हूँ,
धधक कर आज जीना चाहता हूँ,
समय को बन्द करके एक क्षण में,
चमकना चाहता हूँ हो सघन मैं।

“असम्भव कल्पना साकार होगी,
पुरुष की आज जयजयकार होगी!
समर वह आज ही होगा मही पर,
न जैसा था हुआ पहले कहीं पर।

“चरण का भार लो, सिर पर सँभालो,
नियति की दूतियो! मस्तक झुका लो।
चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,
ढलो, जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं।

“न कर छल-छत्र से आघात फूलो,
पुरुष हूँ मैं, नहीं यह बात भूलो।
कुचल दूंगा, निशानी मेट दूंगा,
चढ़ा दुर्जय भुजा की भेंट दूंगा।

“अरी, यों भागती कबतक चलोगी?
मुझे ओ वंचिके! कबतक छलोगी?
चुराओगी कहाँ तक दाँव मेरा?
रखोगी रोक कबतक पाँव मेरा?

“अभी भी सत्त्व है उद्दाम तुमसे,
हृदय की भावना निष्काम तुमसे,
चले संघर्ष आठों आठों याम तुमसे,
करूँगा अन्त तक संग्राम तुमसे।

“कहाँ तक शक्ति से वंचित करोगी?
कहाँ तक सिद्धियाँ मेरी हरोगी?
तुम्हारा छद्म सारा शेष होगा,
न सञ्चय कर्ण का निःशेष होगा।

“कवच-कुण्डल गया ; पर, प्राण तो हैं,
भुजा में शक्ति, धनु पर बाण तो हैं।
गयी एकघ्नि तो सब कुछ गया क्या?
बचा मुझमें नहीं कुछ भी नया क्या?

“समर की शूरता साकार हूँ मैं,
महा मार्तण्ड का अवतार हूँ मैं।
विभूषण वेद-भूषित कर्म मेरा,
कवच है आज तक का धर्म मेरा।

“तपस्याओ! उठो, रण में गलो तुम,
नयी एकघ्नियाँ बन कर ढलो तुम।
अरी ओ सिद्धियों की आग! आओ,
प्रलय का तेज बन मुझमें समाओ।

“कहाँ हो पुण्य? बाँहों में भरो तुम,
अरी व्रत – साधने! आकार लो तुम ।
हमारे योग की पावन शिखाओ,
समर में आज मेरे साथ आओ।

“उगी हों ज्योतियाँ यदि दान से भी,
मनुज – निष्ठा, दलित – कल्याण से भी,
चलें वे भी हमारे साथ होकर,
पराक्रम – शौर्य की ज्वाला सँजो कर।

“हृदय से पूजनीया मान करके,
बड़ी ही भक्ति से सम्मान करके,
सुवामा – जाति को सुख दे सका हूँ,
अगर आशीष उनसे ले सका हूँ,

‘समर में तो हमारा वर्म हो वह,
सहायक आज ही सत्कर्म हो वह।
सहारा माँगता हूँ पुण्य – बल का
उजागर धर्म का, निष्ठा अचल का।

‘प्रवंचित हूँ, नियति की दृष्टि में दोषी बड़ा हूँ,
विधाता से किये विद्रोह जीवन में खड़ा हूँ।
स्वयं भगवान् मेरे शत्रु को ले चल रहे हैं,
अनेकों भाँति से गोविन्द मुझको छल रहे हैं।

“मगर, राधेय का स्यन्दन नहीं तब भी रुकेगा,
नहीं गोविन्द को भी युद्ध में मस्तक झुकेगा।
बताऊँगा उन्हें मैं आज, नर धर्म क्या है,
समर कहते किसे हैं और जय का मर्म क्या है।

“बचा कर पाँव धरना, थाहते चलना समर को
बनाना ग्रास अपनी मृत्यु का योद्धा अपर को,
पुकारे शत्रु तो छिप व्यूह में प्रच्छन्न रहना,
सभी के सामने ललकार को मन मार सहना ।

“प्रकट होगा विपद् के बीच में प्रतिवीर हो जब,
धनुष ढीला, शिथिल उसका ज़रा कुछ तीर हो जब ।
कहाँ का धर्म? कैसी भर्त्सना की बात है यह?
नहीं यह वीरता, कौटिल्य का अपघात है यह।

“समझ में कुछ न आता, कृष्ण क्या सिखला रहे हैं,
जगत् को कौन नूतन पुण्य-पथ दिखला रहे हैं।
हुआ वध द्रोण का कल जिस तरह वह धर्म था क्या?
समर्थन-योग्य केशव के लिए वह कर्म था क्या?

‘यही धर्मिष्ठता? नय-नीति का पालन यही है?
मनुज मलपुंज के मालिन्य का क्षालन यही है?
यही कुछ देखकर संसार क्या आगे बढ़ेगा?
जहाँ गोविन्द हैं, उस शृङ्ग के ऊपर चढ़ेगा?

“करें भगवान जो चाहें, उन्हें सब कुछ क्षमा है,
मगर क्या वज्र का विस्फोट छींटों से थमा है?
चलें वे बुद्धि की ही चाल, मैं बल से चलूँगा,
न तो उनको, न होकर जिह्य अपने को छलूँगा।

“डिगाना धर्म क्या इस चार वित्तों की मही को?
भुलाना क्या मरण के बादवाली जिन्दगी को।
बसाना एक पुर क्या लाख जन्मों को जलाकर!
मुकुट गढ़ना भला क्या पुण्य को रण में गला कर?

“नहीं राधेय सत्पथ छोड़ कर अघ-ओक लेगा,
विजय पाये न पाये, रश्मियों का लोक लेगा!
विजय-गुरु कृष्ण हों, गुरु किन्तु, मैं बलिदान का हूँ,
असीसें देह को वे, मैं निरन्तर प्राण का हूँ।

“जगी, बलिदान की पावन शिखाओ,
समर में आज कुछ करतब दिखाओ।
नहीं शर ही, सखा सत्कर्म भी हो,
धनुष पर आज मेरा धर्म भी हो।

“मचे भूडोल प्राणों के महल में,
समर डूबे हमारे बाहु-बल में।
गगन से वज्र की बौछार छूटे,
किरण के तार से झङ्कार फूटे।

“चलें अचलेश, पारावार डोले,
मरण अपनी पुरी का द्वार खोले।
समर में ध्वंस फटने जा रहा है,
महीमण्डल उलटने जा रहा है।

अनुठा कर्ण का रण आज होगा,
जगत् को काल-दर्शन आज होगा।
प्रलय का भीम नर्तन आज होगा,
वियद्व्यापी विवर्तन आज होगा।

“विशिख जब छोड़ कर तरकस चलेगा,
नहीं गोविन्द का भी बस चलेगा।
गिरेगा पार्थ का सिर छिन्न धड़ से,
जयी कुरुराज लौटेगा समर से।

“बड़ा आनन्द उर में छा रहा है,
लहू में ज्वार उठता जा रहा है।
हुआ रोमाञ्च यह सारे बदन में,
उगे हैं या कटीले वृक्ष तन में।

“अहा! भावस्थ होता जा रहा हूँ,
जगा हूँ या कि सोता जा रहा हूँ?
बजाओ, युद्ध के बाजे बजाओ,
सजाओ, शल्य! मेरा रथ सजाओ।”

पढ़िए :- प्रेरणादायक कहानी ज़िंदगी खूबसूरत है

Rashmirathi Karna Vadh भाग 2 के लिए यहाँ क्लिक करें।

Add Comment