विदुर कौन थे ? धर्मराज को मिले श्राप की रोचक कहानी | विदुर जी की कथा

विदुर कौन थे ? इसका जवाब वही दे सकता है जिसने महाभारत देखा या पढ़ा हो। वे हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री, कौरवो और पांडवो के काका और धृतराष्ट्र एवं पाण्डु के भाई थे। उनका जन्म एक दासी के गर्भ से हुआ था। विदुर को धर्मराज का अवतार भी माना जाता है। जी हाँ, विदुर जी धर्मराज ( यमराज ) के ही अवतार थे। धर्मराज के मानव रूप में जन्म लेने का कारण माण्डव्य ऋषि द्वारा दिया गया श्राप था। आइये जानते हैं किस कारण मिला था धर्मराज को यह श्राप :-

विदुर कौन थे

विदुर कौन थे

माण्डव्य ऋषि खांडव में शांतिपूर्वक रहा करते थे। वे अपने आश्रम के बाहर लगे वृक्ष के नीचे तपस्या किया करते थे। कुछ दिन बाद कुछ चोर वहां चोरी का सामान लेकर पहुंचे। खुद को उन्होंने व्यापारी बताया और ये कहा कि कुछ लुटेरे उनका पीछा कर रहे हैं। माण्डव्य ऋषि ने उन पर विश्वास करते हुए उनका सामान आश्रम में रखवा दिया। उसके बाद उन्हें वहां से सुरक्षित भागने का मार्ग भी बता दिया।

थोड़ी ही देर में वहां सैनिक आ पहुंचे। वे ऋषि की कुटिया का निरिक्षण करते हैं तो उन्हें चोरों का छिपाया सामान मिलता है। चोरों का साथ देने के कारण सिपाही माण्डव्य ऋषि को पकड़ लेते हैं। ऋषि अपना पक्ष रखते हुए स्वयं को निर्दोष बताते हैं। इस पर सिपाही उन्हें कहते हैं, “आप निर्दोष हैं या नहीं इसका निर्णय अब महाराज ही करेंगे। ”

माण्डव्य ऋषि को महाराज के सामने प्रस्तुत किया गया। ऋषि ने अपनी बात रखनी चाहि परन्तु महाराज ने उनकी एक न सुनते हुए उन्हें शूली पर चढ़ाने का आदेश दे दिया। सिपाही माण्डव्य ऋषि को शूली पर चढ़ाने के लिए पकड़ कर ले गए।

जब ऋषि को शूली पर चढ़ाया गया तो उन्होंने अपने तपोबल से अपनी रक्षा की। बहुत समय तक जब सिपाहियों ने देखा की ऋषि को शूली पर चढ़ाने से उनको कुछ नहीं हुआ तो इसकी सूचना महाराज को दी गयी।

महाराज ने जब यह बात सुनी तो उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ। ऋषि से क्षमा याचना करने के लिए महाराज उसी समय ऋषि के पास जा पहुंचे। उन्होंने ने हाथ जोड़ कर ऋषि से क्षमा याचना की और उनसे शूली से उतरने का आग्रह किया। शूली से उतरने के बाद से ऋषि माण्डव्य को अणीमाण्डव्य के नाम से जाना जाने लगा।

माण्डव्य ऋषि ने महाराज को बताया कि इसमें उनका कोई दोष नहीं था। यह तो उनके ही कर्मों का फल था जो उन्हें शूली पर चढ़ने का दंड मिला। लेकिन उन्होंने सिया क्या कर्म किया था जो उन्हें इसका फल शूली पर चढ़कर उतारना पड़ा। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए माण्डव्य ऋषि धर्मराज के पास गए।

धर्मराज के पास पहुँच कर उनसे पूछा,

“ हे धर्मराज! मुझे बताएं, मैंने अनजाने में ऐसा कौन सा अपराध किया था जिसके कारण मुझे शूली पर चढ़ना पड़ा। ”

इस बात पर धर्मराज ने माण्डव्य ऋषि को बताया कई बारह वर्ष की आयु में उन्होंने एक पतंगे ( तितली ) की पूंछ में काँटा चुभाया था। जिस कारण उन्हें ये परिणाम भुगतना पड़ा।

यह बात जानने पर माण्डव्य ऋषि क्रोधित हुए और उन्होंने धर्मराज को बताया कि बालक बारह वर्ष तक जो भी काम करता है उसे अधर्म नहीं कहा जा सकता। उस आयु तक उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता है। आपने मेरे साथ अन्याय किया है। न्याय के आसन पर बैठ कर अन्याय करना भी अपराध है।

इस अपराध का दंड तुम्हें मानव योनी में जन्म लेकर भोगना होगा। आज सही से न्याय न कर पाने के कारण तम्हारी मानव योनी न्याय और अन्याय की समस्याएँ सुलझाते ही निकलेगी।

तो ये था वो कारण जिसके कारण धर्मराज को विदुर के रूप में मानव बनकर धरती पर जन्म लेना पड़ा। श्राप के प्रभाव के कारण वे सारा जीवन गलत और सही का निर्णय करने में ही लगे रहे।

तो ये था विदुर कौन थे का पहला भाग। विदुर कौन थे के दूसरे भाग में हम जानेंगे विदुर किसके पुत्र थे , कौन थे विदुर के पिता , क्या था विदुर की माता का नाम और किस तरह बने थे वे धृतराष्ट्र और पांडू के भाई।

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