सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास :- भारत की प्राचीन सभ्यता की सम्पूर्ण जानकारी

विश्व की सबसे पुरानी नगरीय सभ्यता सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास:-

सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास

सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज

सिन्धु घटी सभ्यता विश्व की प्रथम नगरीय सभ्यता है। इसके साथ ही ये विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक सबसे महत्वपूर्ण सभ्यता है। ईराक की मेसोपोटामिया सभ्यता व मिस्त्र की नील नदी सभ्यता के समकालीन सभ्यता थी। इस सभ्यता को सबसे पहले 1826 में चार्ल्स मैसेन ने खोजा था। यहाँ पर मिटटी की खुदाई के समय ईंटों के साक्ष्य मिले थे।

एक बार फिर उसके बाद 1853 में कनिघम ने कराची से लाहौर के मध्य भारत में रेलवे लाइन के निर्माण कार्य के दौरान बर्टन बंधुओं ( जॉन बर्टन व विलियम बर्टन ) को भेजा था। बर्टन बंधुओं को यहाँ से पक्की ईंटों के साक्ष्य मिले। इसके बाद 1921 में जॉन मार्शल ( तत्कालीन भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक ) के समय में हड़प्पा नामक स्थान पर इस सभ्यता की खोज की। दयाराम सहनी को इसका खोजकर्ता कहा जाता है। उन्होंने इस सभ्यता का उत्खनन किया था।

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भूमिका

इस महत्वपूर्ण सभ्यता की एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सभ्यता के व्यापक क्षेत्र से हम अंदाजा लगा सकते है कि अपने समय में यह सभ्यता कितनी विस्तृत रही होगी। इस सभ्यता का क्षेत्र मेसोपोटामिया व नील नदी की सभ्यता से 12 गुना बड़ा है। इस सभ्यता को 5 नामों से जाना जाता है।

  • हड़प्पा सभ्यता
  • सिन्धु घटी सभ्यता
  • सरस्वती सभ्यता
  • कांस्य युगीन सभ्यता
  • प्रथम नगरिया सभ्यता

इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता इसलिए कहा जाता है क्योंकि सबसे पहले हड़प्पा नमक स्थान पर इसे खोजा गया था। इस सभ्यता का क्षेत्र सिन्धु नदी के किनारे पर बहुत ही विस्तृत रूप से फैला हुआ है। इसलिए इसे सिन्धु घाटी सभ्यता भी कहा गया है। इसका क्षेत्र सरस्वती नदी के किनारे भी बहुत विस्तृत है। इसलिए इसे सरस्वती सभ्यता भी कहते हैं।

(नोट :- घघ्घर नदी प्राचीन सरस्वती, जोकि राजस्थान में है। यह विन्सन नमक स्थान पर विलुप्त हो जाती है।)

इसे प्रथम नगरीय सभ्यता भी कहा गया है क्योंकि यह सभ्यता अपने आप में एक विकसित सभ्यता थी। इतनी पुरानी सभ्यता में नगरीय विकास होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी। इस सभ्यता में सर्वप्रथम लोग पत्थर से बने हथियार का इस्तेमाल करते थे। उसके बाद उस समय के लोग ताम्बे का इस्तेमाल करने लगे। उसके कुछ समय बाद लोग कांसे का इस्तेमाल करने लगे। सबसे पहले इसी सभ्यता में कांसे के इस्तेमाल के अवशेष मिले हैं। इसी वजह से इस सभ्यता को कांस्य युगीन सभ्यता कहा गया है।

सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति

यह सभ्यता चित्राक्षर लिपि में है। इस लिपि को अभी तक किसी के द्वारा पढ़ा नहीं गया है। इस सभ्यता की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए थे। कुछ विद्वानों ने सिन्धु घाटी सभ्यता को विदेशी उत्पत्ति का बताया है। वहीं कुछ अन्य ने इसे देशी सभ्यता का बताया है।

सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति

खोजकर्ताओं ने सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में कहा कि इसकी उत्पत्ति मेसोपोटामिया सभ्यता से हुयी है। और यह भी कहा कि विसरणवादी सिद्धांत के अनुसार सुमेरियन सभ्यता के लोग उस जगह से दूसरी जगह विस्थापित हो गए। इस सिद्धांत का समर्थन गार्डनचाइल्ड, जॉन मार्शल, एच.डी., सांकलिय लियोनार्ड व क्रैमर नमक इतिहासकारों ने किया था।

सुमेरियन साक्ष्यों में सिन्धु सभ्यता का उल्लेख ‘दिलमुन’ नाम से है। सुमेरियन सभ्यता के साक्ष्यों में भी पक्की ईंटों के भवन, पीतल व ताम्बे का प्रयोग, चित्रमय मोहरें आदि प्राप्त हुयी थीं। पर आगे और खोजबीन करने पर पता चला कि सुमेरियन सभ्यता व सिन्धु सभ्यता के बीच कुछ स्तर पर व्यापारिक संबंध व सांस्कृतिक संबंध थे। जिसकी वजह से सुमेरियन सभ्यता की मोहरें सिन्धु सभ्यता में मिली थीं। तो हम यह ख सकते हैं कि सिन्धु सभ्यता की उत्पत्ति विदेशी तो नहीं होगी।

सिन्धु सभ्यता को कई खोजकर्ताओं द्वारा देशी उत्पत्ति के अंतर्गत ईरानी, बलूचिस्तानी संस्कृति से उत्पन्न या सोथी संस्कृति से उत्पन्न बताया था। और इसके बारे में कहा था कि क्रमिक वादी सिद्धांत के अनुसार सिन्धु सभ्यता देशी उत्पत्ति की सभ्यता है। इस सिद्धांत के बार एमे यह कहा गया है कि अगर हम या कुछ लोग किसी जगह पर रहते हैं तो हम अपने आप को उसी जगह पर धीरे-धीरे विकसित करते हैं और अपनी संस्कृति को बढ़ाते हैं।

रोमिला थापर और फेयर सर्विस ने इसे ईरानी या बलूचिस्तानी संस्कृति से उत्पन्न बताया था। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर खुदाई के द्वारा प्राप्त साक्ष्यों से बताया कि नाल, कुल्ली व आमरी में खुदाई करवाई। कहीं पर ग्रामीण साक्ष्य प्राप्त हुए, कहीं पर अर्ध ग्रामीण व कहीं नगरीय साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

वहीं अमलानंद घोष ने सिन्धु सभ्यता को सोती संस्कृति ( भारतीय ) से माना है। 1953 में उन्होंने राजस्थान में खुदाई द्वारा प्राप्त साक्ष्यों से बताया कि इन दोनों संस्कृतियों के पूर्वज एक सामान मिले व बर्तनों में पीपल के पत्तों के निशान भी प्राप्त हुए हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता का कालक्रम

यह प्राचीन सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी होगी। (‘नेचर’ पत्रिका के शोध के अनुसार ) इस सभ्यता के कालक्रम के बारे में भी खोजकर्ताओं के अलग-अलग मत थे। फादर हेरास ने इसे 6000 ई.पू. का बताया था। वहीं सर जॉन मार्शल ने इस सभ्यता को 3250-2750 ई.पू. का बताया था। पर कार्बन डेटिंग तकनीक के द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता को 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. का बताया गया है।

(नोट :- कार्बन डेटिंग ऐसी तकनीक है जिसमें C-14 कार्बन के द्वारा अवशेषों की आयु ज्ञात की जा सकती है।)

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार

भौगोलिक व सामाजिक दृष्टि से यह सभ्यता विश्व की सबसे बड़ी सभ्यता थी। इसका क्षेत्र पूर्व में उत्तर प्रदेश के अलमगीरपुर से पश्चिम में सुतकांगेडोर तक और उत्तर में जम्मू कश्मीर के मांडा से दक्षिण के दायमाबाद जोकि महाराष्ट्र में है, तक फैला हुआ है।

इस सभ्यता का क्षेत्र त्रिकोणाकार रूप में फैला हुआ है। इस सभ्य्त्य के अवशेष भारत, पाकिस्तान व अफगानिस्तान में प्राप्त हुए हैं। अबतक सिन्धु घाटी के 3% क्षेत्र के अवशेष ही प्राप्त हो सके हैं। सिन्धु सभ्यता के अवशेष भारत कि आज़ादी के पहले सिर्फ 40 स्थानों से प्राप्त हुए थे। भारत के आज़ादी के पश्चात से अब तक 1600 स्थानों पर इस सभ्यता के अवशेष प्राप्त हो चुके हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता के कुछ प्रमुख स्थल भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान में हैं। जो इस प्रकार हैं :-

  • अफगानिस्तान :- मुंडीगाक और शुर्तगोई
  • पाकिस्तान :- बलूचिस्तान में प्रमुख स्थल बालाकोट, सुतकांगेडोर व डाबरकोट। सिंध प्रान्त में मोहन जोदड़ो ( खोजकर्ता :- राखलदास बैनर्जी) जिसका अर्थ है मृतों का टीला, चनहुदड़ो। पंजाब प्रान्त में हड़प्पा (रावी नदी के तट पर स्थित), रहमानढेरी, दारा इस्माइल खां
  • भारत :- मांडा, रोपड़, बनवाली, राजखेड़ी, कालीयंगा, दायमाबाद (प्रवरा नदी के तट पर), सहारनपुर, आलमगीरपुर, लोथल (गुजरात – खम्बात की खाड़ी ), धोलावीरा (गुजरात -कच्छ की खाड़ी ), रोपड़, रंगपुर, राखीगढ़ी, हुलस आदि।

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