शेर और खरगोश कविता ( पद्यकथा ) | Sher Aur Khargosh Kavita

Sher Aur Khargosh Kavita – ‘ शेर और खरगोश ‘ पंचतंत्र की एक कहानी का पद्य में अनुवाद है। इस कहानी में एक छोटा – सा खरगोश अपनी बुद्धि से बलशाली शेर को भी मार देता है। शेर के भोजन के लिए हर दिन जंगल से एक जानवर भेजा जाता है। खरगोश की बारी आने पर आने पर वह जान बूझकर देर से पहुँचता है और शेर से रास्ते में दूसरे शेर द्वारा रोक लिए जाने की बात कहता है । वह गुस्साए शेर को एक कुएँ के पास ले जाता था है। कुएँ के पानी में शेर अपनी परछाई को दूसरा शेर समझकर उस पर झपटता है और पानी में गिरकर मर जाता है।

इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें कठिन परिस्थितियों में घबराना नहीं चाहिए वरन् बुद्धि से काम लेकर उसका हल निकालना चाहिए। धैर्य और विवेक से किसी भी समस्या का समाधान किया जा सकता है।

शेर और खरगोश कविता

शेर और खरगोश कविता

किसी समय रहता था वन में
शेर बहुत ही इक खूंँखार,
जो भी पड़ता उसे दिखाई
उसी जीव को देता मार। 1।

इसी वजह से वन के प्राणी
रहते थे हरदम भयभीत,
भूल गए थे वे बेचारे
खुशियों के गाना ही गीत। 2।

जब भी शेर निकलता बाहर
सब जाते थे डर से काँप,
छुप जाते थे इधर-उधर वे
अपने निकट मौत को भाँप। 3।

वह जंगल का राजा करता
एक साथ में कई शिकार,
बिना बात ही जानवरों को
देता था वह पल में मार। 4।

इस कारण से जानवरों की
रहती थी आफत में जान,
डर था ऐसे तो उन सबका
नहीं रहेगा नाम – निशान।5।

रोज रोज की हत्याओं से
मचा हुआ था हाहाकार,
सभा बुलाकर वन के प्राणी
करते हैं तब सोच-विचार। 6।

किया फैसला उन सबने मिल
कहें शेर से अपनी बात,
जाकर बोलें करे नही वह
बिना भूख जीवों की घात। 7।

और दूसरे दिन जंगल के
प्राणी गए शेर के पास,
समाधान कुछ तो निकलेगा
मन में पाले यह विश्वास। 8।

शेर गुफा के अन्दर ही तब
मिला उन्हें करता आराम,
हिम्मत करके उसे जगाया
और बताया अपना काम। 9।

हाथ जोड़कर उन जीवों के
दल का तब बोला सरदार,
महाराज ! इक विनती करने
आए हैं हम पहली बार। 10।

जितनी भूख आपको लगती
बस उतना ही करें शिकार,
बिन मतलब जीवों की हिंसा
सच में करना है बेकार । 11।

जरा सोचिए सभी जानवर
मार दिए जाते हैं आज,
तो फिर कल को बिना प्रजा के
आप करेंगे किस पर राज। 12।

अच्छा है हम रोज आपके
पास भेज दें एक शिकार,
जिससे भोजन घर बैठे ही
मिले आपको भली प्रकार। 13।

यहीं चैन से रहें आप अब
करने निकलें नहीं शिकार,
आ जाएगा एक जानवर
हर दिन इसी गुफा के द्वार। 14।

कहा शेर ने मुझे तुम्हारा
यह प्रस्ताव रहा स्वीकार,
कोताही बरती इसमें तो
आप रहेंगे जिम्मेदार। 15।

अगर किसी दिन मेरा भोजन
कम आया या होती देर,
उसी रोज मैं कई जानवर
मार – मार कर दूँगा ढेर। 16।

लौट जानवर आए घर को
समझौते को करके पुष्ट,
और शेर उनकी बातों से
पूरी तरह हुआ संतुष्ट। 17।

रोज जीव इक पास शेर के
जाता था इसके उपरान्त,
शेर उसे खाकर कर लेता
भूख पेट की अपनी शान्त।18।

इस क्रम के ही चलते इक दिन
सबने मिल भेजा खरगोश,
चला गया वह शीश झुकाकर
किन्तु न खोया उसने होश । 19।

छोटा था खरगोश बहुत वह
रहा बुद्धि का लेकिन तेज,
दुःखी हुए थे वन के प्राणी
निकट शेर के उसको भेज। 20।

सोच रहा खरगोश – एक तो
जीव रोज खोता है जान,
उस पर भी उपकार शेर का
रहे सभी वन – प्राणी मान। 21।

इस मुश्किल से बचने को कुछ
चलनी होगी मुझको चाल,
नहीं मरे जिससे इस वन का
कोई प्राणी मौत अकाल। 22।

और अन्त में उसे सोचते
एक युक्ति आती है याद,
जाता है वह पास शेर के
बहुत देर करने के बाद। 23।

तड़प रहा था शेर भूख से
बहुत बुरा था उसका हाल,
तब आता खरगोश दिखा था
उसको चलते धीमी चाल।। 24।

गया बौखला वह गुस्से से
बोला – क्यों की इतनी देर,
भूख मिटेगी क्या फिर तुझसे
कहा शेर ने आँख तरेर। 25।

जिन मूर्खों ने भेजा तुझको
भुगतेंगे वे अब परिणाम,
मार उन्हें ना दिया अगर तो
शेर नहीं मेरा भी नाम। 26।

बोला वह खरगोश डरा – सा
मेरी भी तो सुन लें बात,
ठीक नहीं लगते हैं मुझको
इस जंगल के अब हालात। 27।

दोष नहीं यह किसी और का
भेजा था हमको तो चार,
किन्तु तीन खरगोश बीच में
एक शेर देता है मार। 28।

एक गुफा में रहता है वह
जो लगती है बिल्कुल कूप,
बता रहा है वह अपने को
इस जंगल का असली भूप। 29।

कहा आपके बारे में तो
शेर हो गया था वह क्रुद्ध,
बोला – उस डरपोक शेर को
यहाँ भेजना करने युद्ध।30।

केवल मुझको जिन्दा छोड़ा
देने को ही यह संदेश,
कहता है वह – आप छोड़ दें
जल्दी उसका वन्य प्रदेश। 31।

उसी शेर के कारण मुझको
इतनी देर हुई है आज,
कहता है वह – इस जंगल पर
अबसे होगा उसका राज। 32।

इतना सुन वह शेर जोर से
गुस्से में भर उठा दहाड़,
बोला – उसका पता बताओ
दूँगा उसको वहीं पछाड़। 33।

मैं भी देखूँ कौन शेर यह
आया है इतना दिलदार,
जो मेरे जंगल में घुसकर
रहा मुझी को है ललकार। 34।

जल्दी उसके पास चलो अब
कहा शेर ने भरकर जोश,
निकट कुएँ के पहुँच गया था
तब उसको लेकर खरगोश। 35।

महाराज ! वह इसी गुफा में
रहता है होकर खामोश,
गहन कुआँ वह दिखा शेर को
बोला धीरे – से खरगोश। 36।

जरा निकट आ इसके अन्दर
आप लीजिए पहले झाँक,
दुश्मन की असली ताकत को
लें फिर अपने मन में आँक। 37।

शेर क्रोध में भरकर ज्यों ही
लगा देखने गहरा कूप,
पानी में दिखलाई पड़ता
उसको तब अपना ही रूप। 38।

शेर दहाड़ें लगा मारने
अपनी ही परछाई देख,
बोला – ठहर मिटा देता हूँ
मैं तेरे जीवन की रेख। 39।

लौट कुएँ से वापस आती
गूँज शेर की ही आवाज,
किन्तु क्रोध में भरकर वह तो
होता ही जाता नाराज। 40।

उसने समझा शेर दूसरा
रहा उसे ही है ललकार,
अब दुश्मन को मजा चखाने
हो जाता है वह तैयार। 41।

कूद शेर फिर गया कुएँ में
करने उसका काम तमाम.
खड़ा रहा खरगोश देखता
वह पानी में गिरा धड़ाम। 42।

निकल शेर फिर सका न बाहर,
मरा वहीं पानी में डूब,
समाचार यह पाकर अब तो
खुश थे वन के प्राणी खूब। 43।

नाच गानकर झूम रहे थे
भरा नया था उनमें जोश,
उठा घुमाते थे वे अपने
कंधों पर रखकर खरगोश। 44।

बच्चो ! था खरगोश जरा- सा
और बड़ा था काफी शेर,
लेकिन वह खरगोश शेर को
लगा बुद्धि कर देता ढेर। 45।

सचमुच संकट के आने पर
लिया बुद्धि से जिसने काम,
पार सभी बाधा कर उसने
जीवन में पाया आराम। 46।

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धन्यवाद।

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