नशे से क्या फर्क पड़ता है? :-ड्रग्स के समाज पर पड़ते बुरे प्रभाव की कहानी

क्या नशा सिर्फ नशेड़ियों को ही नुक्सान पहुंचाता है? क्या नशे और नशेड़ियों का हमसे कोई लेना देना नहीं होता? क्यों हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारियों के प्रति आँखें मूँद कर बैठे रहते हैं? क्यों हम कहते हैं कि हमें नशे से क्या फर्क पड़ता है? अगर आपको लगता है कि ये सब बातें फिजूल हैं और इनका हमसे कोई लेना देना नहीं तो आपको यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए। आइये पढ़ते हैं कहानी ‘ नशे से क्या फर्क पड़ता है? ‘:-

नशे से क्या फर्क पड़ता है?

नशे से क्या फर्क पड़ता है?

मोहंत ड्रग माफिया में एक जाना पहचाना नाम था। शहर के कहते से मोहल्ले से लेकर बड़े-बड़े रईसजादों की औलादें उसके पास ड्रग खरीदने आते थे। ये काम उसकी आमदनी का एकमात्र जरिया था। वो ड्रग से होने वाले नुक्सान को जनता था। इसलिए वो खुद तो इस ज़हर से दूर रहता था लेकिन इस देश की युवा पीढ़ी की रगों में वो ये ज़हर पिछले 30 सालों से भर रहा था।

करीब 20 साल की उम्र में वो ड्रग तस्करों के संपर्क में आया था। ऐसा चस्का लगा था उसे कि अब वो खुद को इस से अलग नहीं कर सकता था या यूँ कहें कि अलग करना ही नहीं चाहता था।

उसके माँ-बाप और साथियों ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की कि वो ये काम छोड़ दे। पर पैसों की खनक के आगे किसी कि आवाज उसके कानों के पास भी नहीं पहुँच रही थी। उसका कहना था कि कोई और नशा करे इस से उसका क्या लेना-देना। उसे नशे से क्या फर्क पड़ता है? वो तो नशा नहीं करता। अगर वो नशा नहीं बेचेगा तो कोई और बेच देगा।

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वो अब एक ऐसा दीमक बन चुका था जो न जाने कितने परिवारों की औलादों को इस नशे के दलदल में फंसा कर उनको अंदर ही अंदर से खोखला कर रहा था।

आज मोहंत के पास अमित आया था। अमित मोहंत का नया कस्टमर था। अमित किसी ज़माने में एक होनहार विद्यार्थी हुआ करता था। उसके पिता एक गाँव में किसान थे। बैंक से कर्जा लेकर उन्होंने बेटे को शहर पढ़ने के लिए भेजा था। अमित के पिता ने उसे भेजा तो उसका सुनहरा भविष्य बनाने के लिए था लेकिन किस्मत ने उसे जिंदगी के उन अंधेरों में धकेला कि अब शायद उसकी जिंदगी में इस अँधेरे को दूर करने के लिए कोई रौशनी की किरण नजर नहीं आती थी।

अमित कि पढ़ाई के पहले साल ही उसके पिता की फसल खेतों में बारिश के कारण बह गयी। बैंक का कर्जा न चुकाया गया तो अमित के पिता ने आत्महत्या कर ली। फिर भी अमित ने अपने आप को संभाला और घर की जिम्मेदारी खुद पर उठाई। इसके लिए उसे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और शहर में ही नौकरी करनी पड़ी।

बहुत कोशिशों के बाद भी बैंक का कर्जा उतार पाना अमित के लिए संभव न हुआ। छोटी बहन की शादी करते और बैंक का कर्ज उतारते हुए सभी खेत बिक गए। पिता की आत्महत्या, बहन की शादी और खेत बिक जाने के गम में अमित की माँ भी चल बसी।

अमित अब अकेला हो चुका था। इसी दौरान वह अपने एक नशेड़ी दोस्त के कारन खुद भी नशे के चंगुल में फंस गया। उसका डीलर अमित ही था।

आज अमित फिर से मोहंत के पास आया। लेकिन आज उसके पास ड्रग्स खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उसे उम्मीद थी कि शायद अमित उसे उधारी दे-दे। मोहंत कभी भी पैसे के मामले में किसी पर दया नहीं दिखता था। उसका मानना था कि नशेड़ी लोगों का क्या भरोसा आज हैं कल नहीं। इसलिए अगर पैसा नहीं तो माल नहीं।

अमित ने मोहंत से कहा,” मोहंत बस आज थोड़ा सा माल दे दो। माँ कसम कल पूरे पैसे दे दूंगा।”

“माँ कसम? तेरी तो माँ ही नहीं है…..फिर कसम किसलिए खा रहा है?” मोहंत ने थोड़े सख्ती भरे लहजे में कहा।

– मोहंत भाई मैं सच में कल पैसे ले आऊंगा।

– देखो, व्यापर कोई भी हो, उसक बर्बादी उधार से ही होती है। तुम्हें माल चाहिए तो पैसे लाओ। कहीं चोरी करो, डाका डालो या किसी को मार कर लाओ। लेकिन अगर पैसे नहीं तो माल नहीं। अब दफा हो जाओ यहाँ से।

– मोहंत आप समझो न…..मैं……मैं कल किसी भी तरह इंतजाम कर दूंगा।

मोहंत का दिल पिघलने वाला नहीं था। क्योंकि ये काम दिलवालों का था ही नहीं और अगर मोहंत के पास दिल होता तो शायद वो ये काम न करता।

खैर, अमित को जब ड्रग्स नहीं मिला तो उसकी हालत और बिगड़ने लगी। नशा न मिलने के कारन उसका शरीर टूट रहा था। नशेड़ी बन जाने के कारन उसके अपने भी उसका साथ छोड़ चुके था। उसे कहीं से भी पैसे मिलने की उम्मीद न थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस समय वो क्या करे।

वो एक अजीब सी कशमकश में था। अचानक उसके कानों में मोहंत के कहे शब्द गूंजने लगे – ‘तुम्हें माल चाहिए तो पैसे लाओ। कहीं चोरी करो, डाका डालो या किसी को मार कर लाओ। ‘

अपने आप को जब वो न संभाल पाया तो उसने फैसला किया कि वो एक लूट को अंजाम देगा। हालाँकि वो इसके पक्ष में नहीं था लेकिन नशे की आग ने उसे इस कदर जला रखा था कि उसे इस आग को बुझाने के लिए कुछ भी करना मंजूर था।

दोपहर 12 बजे के करीब अमित पहुँच चुका था शहर से बाहर सुनसान सड़क पर अपनी पहली लूट को अंजाम देने। कुछ देर इन्तजार करने के बाद एक नौजवान लड़का उधर मोटरसाइकिल पर आया। पहली लूट होने के कारन अमित इस बात से अनजान था कि उसे कौन सा कदम कब उठाना है। इसलिए वो पहले ही सड़क पर हाथों में लोहे का सरिया लिए हुए खड़ा हो गया।

मोटरसाइकिल पर बैठा हुआ लड़का अमित को देख कर घबराया नहीं और उसके पास जाकर अपनी बाइक कड़ी कर दी। बब्म्बर ने उसे धमकाते हुए पैसे देने के लिए कहा। लेकिन ये दांव उल्टा पड़ गया। उस लड़के के पास बन्दूक थी। अमित बन्दूक देख कर डर गया। उसे कुछ भी समझ न आया। अचानक उस लड़के का फ़ोन बजने लगा। जैसे ही एक पल के लिए उस लड़के का ध्यान अपने फ़ोन की तरफ गया अमित ने मौके का फ़ायदा उठाते हुए उसके हाथ पर वो सरिया दे मारा।

बात यहीं ख़त्म हो जाती तो शायद सब सही चलता। वो लड़का इस से भी नहीं डरा और अमित के साथ दो-दो हाथ हो लिया। इसी लडाई में न जाने कम अमित के हाथों उस लड़के के सिर पर सरिया लग गया और उसके सिर से खून बहने लगा। ये देख अमित बहुत डर गया। उसे कुछ न सूझा तो वो बिना पैसे लिए ही वहां से भागने लगा। पर नशे की याद ने उसे फिर रोक लिया और उसने उस लड़के का पर्स उठा लिया।

घर पहुंचा कर देखा तो उसने पाया कि वो पर्स पैसों से भरा हुआ था। ये उसकी पहली ऐसी कामयाबी थी जिस पर शायद उसे ख़ुशी नहीं हो रही थी। क्योंकि अब उसे जरूरत थी तो बस नशे की।

शाम को अमित नशे कि पूर्ती के लिए मोहंत के घर गया।

“पैसे लाये हो?”

मोहंत ने जैसे ही ये सवाल अमित के आगे दागा उसने पर्स निकाल मोहंत के आगे रख दिया और बोला सारे पैसों का माल दे दो।

इस से पहले कोई और कुछ बोलता पुलिस वहां आ गयी। पुलिस को देख सबके गले सूख गये। किसी को पता नहीं चला कि पुलिस कहाँ से आई और उसे किसने बुलाया।

“आप में से अमित कौन है?”

इंस्पेक्टर ने सवाल करते हुए पूछा।

“क्या हुआ इंस्पेक्टर साहब? हमसे कोई गुस्ताखी हुयी क्या?”

“जी नहीं, हमें एक लाश मिली है और तफ्तीश में ये पता चला है कि वो लाश आपके बेटे की है।”

तभी अचानक पर्स की तरफ देखते हुए उसने बोलना जारी रखा,”अरे हाँ, यही तो है आपका बेटा। लेकिन इसका पर्स यहाँ कैसे आया?”

इसके बाद कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

जिस शख्स को आज तक किसी की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता था। इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि उसके दिए गए नशे से कितने परिवार उजड़ गए। लेकिन शायद आज उसे समझ आ गया था कि इस नशे के व्यापर से किसी को क्या फर्क पड़ता है?

जो दीमक आज तक दूसरे परिवारों को खोखला कर रहा था। आज वो अनजाने में अपने ही घर के चिराग को खा गया। अपने ही कहे गये शब्द ‘ तुम्हें माल चाहिए तो पैसे लाओ। कहीं चोरी करो, डाका डालो या किसी को मार कर लाओ।’ उसे अपने बेटे की मौत का फरमान लग रहे थे।

अब किसी के जीवन में कुछ नहीं बचा था। अमित को मोहंत के बेटे की मौत के जुर्म में उम्र कैद की सजा हो गयी और मोहंत को नशा बेचने के लिए सजा भुगतनी पड़ी।

दोस्तों ये कहानी उन लोगों के लिए है जो कहते हैं समाज में यदि कोई गलत रस्ते पर जा रहा है तो उस से हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई और नशा करे तो हमें उसके नशे से क्या फर्क पड़ता है? क्या आप जानते हैं कि नशे करने वाला व्यक्ति आपके परिवार को कोई हानि नहीं पंहुचाएगा? यदि हम समाज में रह रहे हैं तो उसके अच्छे या बुरे कामों का प्रभाव हमारी जिंदगी पर कभी न कभी जरूर पड़ेगा। आपको कुछ न कुछ फर्क जरूर पड़ेगा।

ऐसे में हर जिम्मेदार नागरिक की ये जिम्मेदारी बनती है कि समाज में फ़ैल रही हर बुराई को समय रहते दूर किया जाए। क्योंकि जब आग लगती है तो वो एक दो-पेड़ नहीं जलाती बल्कि पूरा का पूरा जंगल जला देती है।

इस कहानी का विडियो यहाँ देखिये :-

आशा करते हैं आपको यह कहानी ‘नशे से क्या फर्क पड़ता है?’ और इसके पीछे दिया गया सन्देश जरूर पसंद आया होगा। इस कहानी ‘नशे से क्या फर्क पड़ता है?’ के बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

धन्यवाद।

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Sandeep Kumar Singh

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