रावण का इतिहास – 1 | रावण के पूर्वजन्म की कहानी | History Of Rawan

रावण के बारे में कौन नहीं जानता। लंका नरेश रावण जिसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। वही रावण जिसने सीता का हरण किया और उसी कारण भगवान् राम के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ। क्या आप जानते हैं की ये सब योजना बद्ध था। रावण की मृत्यु श्री हरी विष्णु के अवतार भगवान् राम के हाथों ही होनी थी। इसी कारण से ही रावण ने पृथ्वी पर जन्म लिया था। आइये जानते हैं रावण के जन्म के कारण और उसक पूर्वजन्मों के बारे में ” रावण का इतिहास ” में  :-

रावण का इतिहास

रावण का इतिहास

जय विजय को श्राप

एक बार सनकादि मुनि सभी लोकों की यात्रा पर निकले। सनकादि मुनि यूँ तो ब्रह्मा की सृष्टि में उम्र में सब से बड़े थे परन्तु फिर भी देखने में पांच वर्ष के जान पड़ते थे। यही कारण था कि जब वे बैकुंठ लोक के दरवाजे पर श्री हरी विष्णु के दर्शन करने पहुंचे तो दरवाजे तक जाने के लिए वह छः सीढियां चढ़े। जैसे ही वह सातवीं सीढ़ी चढ़ने लगे। दरवाजे पर खड़े दो द्वारपालों जय-विजय ने उन्हें वहीं रोक लिया और अन्दर नहीं जाने दिया।

सनकादि मुनियों को इस पर क्रोध आ गया। उन्होंने उसी समय उन दोनों को श्राप दिया कि तुमने एक मुनि का अपमान किया है। तुम्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि बैकुंठ लोक में जब भगवान् विष्णु सबको एक समान मानते हैं तो तुम्हारे अन्दर ये विषमता की भावना कहाँ से घर कर गयी। इसके बावजूद तुमने मुझे रोका। इसलिए तुम मृत्युलोक में उस योनी में जन्म लोगे जहाँ काम, क्रोध और लोभ का वास होगा।



जब विष्णु जी ने बहार आवाज सुनी तो वे दौड़े चले आये। ब्राह्मणों से तो विष्णु जी पहले ही डरते थे। द्वारपालों को भी ये बात पता थी। इसलिए उन्होंने ने सनकादि मुनियों से क्षमा मांगने लगे। उन्होंने कहा,

” भगवन हम अवश्य अपराधी हैं और हमें अपने अपराध का उचित दंड मिला है। हम इस दंड के लिए तैयार हैं परन्तु हम पर कुछ दया कीजिये और कोई ऐसा उपाय कीजिये कि ऐसी पापी योनि में जन्म लेकर भी हम भगवान् का नाम लेते रहें।”

तभी वहां पहुंचे भगवान श्री हरी विष्णु ने अपने द्वारपालों की तरफ से सनकादि मुनियों से क्षमा मांगी। और उनका क्रोध शांत किया। उसके बाद उन्हें बताया कि ये जो आपने श्राप दिया है ये मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये दैत्य योनि में जन्म लेंगे। यह सुन कर सनकादि मुनि भगवान् विष्णु को प्रणाम कर आगे की यात्रा पर चले गये।

इसके बाद उन्होंने अपने द्वारपालों को बताया कि एक बार बैकुंठ में प्रवेश करती हुयी लक्ष्मी जी को भी तुमने रोका था और उन्होंने भी तुम्हें श्राप दिया था। अब तुम चिंता मत करो। तुम दैत्य योनि में जन्म लोगे और मैं भी मृत्युलोक में जन्म लेकर तुम्हारा संहार करूँगा। इस प्रकार तुम शीघ्र ही यहाँ वापस आओगे।

हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की कथा

श्राप के कारण जय विजय ने महर्षि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से जन्म लिया। उनके नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु रखे गए। दोनों बहुत ही बलवान थे। उन्होंने जल्दी ही उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने तीनों लोको को वश में कर लिया और पृथ्वी को ले जाकर गहरे पानी में डाल दिया।



अब जबकि उनके पास सब कुछ था और उनका कोई भी दुश्मन नहीं था। तब हिरण्याक्ष लड़ने के लिए एक प्रतिद्वंदी की तलाश करने लगा। उसी समय भगवान् विष्णु वराह अवतार लेकर धरती को हिरण्याक्ष की कैद से छुड़ाने पहुंचे। पहले उन्होंने धरती को समुद्र से बाहर निकाल कर उनके स्थान पर पहुँचाया। उसके बाद उन्होंने हिरण्याक्ष का संहार कर दिया।

हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद हिरण्यकशिपु ने पूरे परिवार को संभाला और उसके बाद ब्रह्मा जी की तपस्या करने लगा। ब्रह्मा जी ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे उसके द्वारा माँगा गया वरदान दिया। जिसके अनुसार उसकी मृत्यु किसी मनुष्य, पशु, देवता, दैत्य, नाग आदि से न हो। अस्त्र-शस्त्र से, पृथ्वी आकाश में कहीं भी उसकी मृत्यु न हो।

हिरण्यकशिपु का विवाह जम्भ नामक दानव की दानवी पुत्री कयाधू से हुआ। कयाधू और हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए जिनका नाम संह्लाद, अनुह्लाद, ह्लाद और प्रह्लाद था। प्रह्लाद सबसे छोटे थे। इसके अलावा उनकी एक पुत्री भी थी। जिसका नाम सिंहि था। उसका विवाह विप्रचित्त नाम के दानव के साथ हुआ। उन दोनों के घर राहू ने जन्म लिया। जी हाँ, वही राहू जिसने सबको धोखा देकर अमृतपान कर लिया था। जिसके बाद मोहिनी रूप धारण किये भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया था।

हिरण्यकशिपु की मृत्यु का कारण उसी का सबसे छोटा पुत्र प्रह्लाद बना। जो भगवान् विष्णु का भक्त था। हिरण्यकशिपु के बार-बार समझाने पर भी जब प्रह्लाद ने अपनी भक्ति का त्याग न किया तो हिरण्यकशिपु ने उसे मरवाने के बहुत प्रयास किये। इसी प्रयास में एक खम्भे से भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का अंत कर दिया।

इसके बाद ही त्रेतायुग में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु या यूँ कहें कि जय-विजय का जन्म रावण और कुम्भकर्ण के रूप में हुआ।



राजा प्रतापभानु की कथा

रामचरितमानस के अनुसार कैकेय देश में सत्यकेतु नमक एक राजा थे। उनके दो पुत्र हुए बड़े पुत्र का नाम प्रतापभानु और छोटे का अभिमर्दन था। नियम अनुसार राजा सत्यकेतु के बाद प्रतापभानु को राजा बनाया गया। प्रतापभानु सरे काम वेदों और शास्त्रों के अनुसार ही करते थे। वे ब्राह्मणों और संतो का विशेष आदर करते थे। उन्होंने सारी पृथ्वी पर विजय पताका फहरा कर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।

एक बार राजा प्रतापभानु जंगल में शिकार कर रहे थे। तभी अचानक उन्हें एक जंगली सूअर मिला। उसका पीछा करते-करते प्रतापभानु जंगल के अन्दर पहुँच गए और रास्ता भटक गए। सूअर भी न जाने कहाँ जाकर छिप गया। वहां उन्हें एक मुनि दिखाई दिए।

वह एक कपटी मुनि था। पहले वह एक राज्य का राजा हुआ करता था। एक युद्ध में वह राजा प्रतापभानु के हाथों हार गया था। तब से शर्म के मारे न वह अपने राज्य वापस गया और न ही किसी से संपर्क किया। वह भेष बदल कर वाही जंगल में रहने लगा। परन्तु इस बात का ज्ञान राजा प्रतापभानु को न था।

जब राजा प्रतापभानु उसे मिले तो उस कपटी मुनि ने अपनी बातों से राजा प्रतापभानु का विश्वास जीत लिया। उस मुनि ने राजा प्रतापभानु से कहा कि उसके जीवन में संकट सिर्फ ब्राह्मणों के शाप से ही आ सकता है। इस संसार में ब्राह्मणों के शाप के अतिरिक्त कोई और तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।

इसलिए सभी ब्राह्मणों को निमत्रण देकर उन्हें भोजन करवाओ। इस प्रकार सभी ब्राह्मण तुम्हारे अधीन हो जाएँगे और तुम्हारे जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आएगा। लेकिन ये भोजन मैं बनाऊंगा। आज से तीन दिन बाद मैं तुम्हारे पास आऊंगा और इस घटना के बारे में बताऊंगा। जिससे तुम मुझे पहचान जाओगे। हमारे इस मिलन का तुम किसी से कोई भेद न खोलना अन्यथा सब व्यर्थ हो जाएगा।



जब उस मुनि से बात कर थका हुआ राजा प्रतापभानु सो गया तो एक राक्षस आया। ये वही राक्षस था जो जंगली सूअर का भेष धारण कर राजा प्रतापभानु को यहाँ लेकर आया था। उस राक्षस का नाम कालकेतु था। उसके सौ पुत्र और दस भाई थे। जिन्होंने ब्राह्मणों, संतों और देवताओं को दुखी कर दिया था। उनका संहार भी राजा प्रतापभानु ने ही किया था।

अब दोनों मिल कर राजा प्रतापभानु से बदला के लिए एक चक्रव्यूह रचा। सोते हुए राजा को मायावी राक्षस उसके राज्य में छोड़ आया।

तीन दिन बाद वही राक्षस कालकेतु पुरोहित का भेष बना कर राजा प्रतापभानु के पास गया और जंगल की बात याद करवाई। उसके बाद राजा प्रतापभानु ने एक लाख ब्राह्मणों को निमंत्रण भेजा। राक्षस ने बहुत सारे व्यंजन बनाये। उसनेकई जानवरों के मांस को और ब्राह्मणों के मांस को भी पकाया। जब ब्राह्मण भोजन ग्रहण करने बैठे तभी आकाशवाणी हुयी। जिससे सभी ब्राह्मणों को पता चला कि उनके सामने मांस परोसा गया है।

इतना पता चलते ही सभी ब्राह्मणों ने राजा प्रतापभानु को श्राप दिया कि वो आगे जाकर राक्षस बन जाएँगे। इधर उस कपटी मुनि को ये खबर मिलते ही उसने आस-पास के सभी राजाओं को एकत्रित किया और राजा प्रतापभानु के राज्य पर आक्रमण कर दिया। फिर जो युद्ध हुआ उसमे सत्यकेतु का सारा वंश समाप्त हो गया।

वही राजा प्रतापभानु बाद में रावण के रूप में जन्मा और उसका भाई अभिमर्दन कुम्भकर्ण के रूप में। राजा प्रतापभानु का मंत्री धर्मरूचि रावण के सौतेले भाई विभीषण के रूप में जन्मा।

Image Source :- Vrindavana

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Sandeep Kumar Singh

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ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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6 Responses

  1. डी एस अमझरे कहते हैं:

    जानकारी शिक्षाप्रद लगी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद अध्यापक महोदय

  2. राम लखन कहते हैं:

    सर आपकी कहानियां अच्‍छी लगी, लेकिन इस संसार में ऐ कैसे पता लगता है कि मरने के बाद कौन कहां जन्‍मा है। जवाब जरूर दीजियेगा।

  3. ब्र.कु. संदीप कहते हैं:

    रावण में आत्मा थी या आत्मा में रावण है…? जानीए ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में…

  4. Piyush anand कहते हैं:

    Jankari aachi lagi ramayan ohadne ki jarurat nhi h but uska sanhar ram bhagwan, vishnu bhagwan ke avtar ne hi kyu kiya kya shiv ji ya anya devtao m itni shakti nhi yhi kya

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