कबीर के दोहे | संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित। भाग – १

20. प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।


21. माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख॥

अर्थ :- माँगना मरने के बराबर है, इसलिए किसी से भीख मत मांगो। सतगुरु कहते हैं कि मांगने से मर जाना बेहतर है, अर्थात पुरुषार्थ से स्वयं चीजों को प्राप्त करो, उसे किसी से मांगो मत।


22. करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।
जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।

अर्थ :- मनुष्य को अपने आप ही मुक्ति के रास्ते पर चलना चाहिए। कर्म कांड और पुरोहितों के चक्कर में न पड़ो। तुम्हारे मन के आंगन में ही आनंद की नदी बह रही है, तुम प्यास से क्यों मर रहे हो? इसलिए कि कोई पंडित आ कर बताए कि यहां से जल पी कर प्यास बुझा लो। इसकी जरूरत नहीं है। तुम कोशिश करो तो खुद ही इस नदी को पहचान लोगे।


23. दुख लेने जावै नहीं, आवै आचा बूच।
सुख का पहरा होयगा, दुख करेगा कूच।।

अर्थ :- संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुःख लेने कोई नहीं जाता। आदमी को दुखी देखकर लोग भाग जाते हैं। किन्तु जब सुख का पहरा होता होता है तो सभी पास आ जाते हैं।


24. गुरु शरणगति छाडि के, करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली, नहीं नरक में ठौर।।

अर्थ :- संत जी कहते हैं कि जो मनुष्य गुरु के पावन पवित्र चरणों को त्यागकर अन्य पर भरोसा करता है उसके सुख संपती की बात ही क्या, उसे नरक में भी स्थान नहीं मिलता।


25. पढ़ि पढ़ि के पत्थर भये, लिखि भये जुईंट।
कबीर अन्तर प्रेम का लागी नेक न छींट।।

अर्थ :- कबीर जी ज्ञान का सन्देश देते हुए कहते हैं कि बहुत अधिक पढकर लोक पत्थर के समान और लिख लिखकर ईंट  के समान अति कठोर हो जाते हैं। उनके हृदय में प्रेम की छींट भी नहीं लगी अर्थात् ‘प्रेम’ शब्द का अभिप्राय ही न जान सके जिस कारण वे  सच्चे मनुष्य न बन सके।


26. मन मोटा मन पातरा, मन पानी मन लाय।
मन के जैसी ऊपजै, तैसे ही हवै जाय।।

अर्थ :- यह मन रुपी भौरा कहीं बहुत अधिक बलवान बन जाता है तो कहीं अत्यन्त सरल बन जाता है। कहीं पानी के समान शीतल तो कहीं अग्नि के समान क्रोधी बन जाता है अर्थात जैसी इच्छा मन में उपजत हैं, यह वैसी ही रूप में परिवर्तित हो जाता हैं।



27. सांचे को सांचा मिलै, अधिका बढै सनेह।
झूठे को सांचा मिलै, तड़ दे टूटे नेह।।

अर्थ :- सत्य बोलने वाले को सत्य बोलने वाला मनुष्य मिलता है तो उन दोनों के मध्य अधिक प्रेम बढता है किन्तु झूठ बोलने वाले को जब सच्चा मनुष्य मिलता है तो प्रेम अतिशीघ्र टूट जाता है क्योंकि उनकी विचार धारायें विपरीत होती है।


28. जिनके नाम निशान है, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया आवा गौन।।

अर्थ :- जिस मनुष्य के जीवन मी सतगुरु के नाम का निशान है उन्हें रोक सकाने की भला किसमें सामर्थ्य है, वे परम पुरुष परमात्मा के ज्ञान रुपी भंडार को पाकर जन्म मरण के भवरूपी सागर से पार उतरकर परमपद को पाते है।


29. राजपाट धन पायके, क्यों करता अभिमान।
पडोसी की जो दशा, सो अपनी जान ।।

अर्थ :- राज पाट सुख सम्पत्ती पाकर तू क्यों अभिमान करता है। मोहरूपी यह अभिमान झूठा और दारूण दुःख देणे वाला है। तेरे पडोसी जो दशा हुई वही तेरी भी दशा होगी अर्थात् मृत्यु अटल सत्य है। एक दिन तुम्हें भी मरना है फिर अभिमान कैसा?


30. हरिजन तो हारा भला , जीतन दे संसार।
हारा तो हरिं सों मिले, जीता जम के द्वार।।

अर्थ :- संसारी लोग जिस जीत को जीत और जिस हार को हार समझते हैं हरि भक्त उनसे भिन्न हैं। सुमार्ग पर चलने वाले उस हार को उस जीत से अच्छा समझते हैं जो बुराई की ओर ले जाते हैं। संतों की विनम्र साधना रूपी हार संसार में सर्वोत्तम हैं।


31. कबीर क्षुधा है कुकरी, करत भजन में भंग।
वांकू टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग।।

अर्थ :- संत स्वामी कबीर जो कहते हैं कि भूख उस कुतिया के समान है जो मनुष्य को स्थिर नहीं रहने देती। अतः भूख रुपी कुतिया के सामने रोटी का टुकडा डालकर शान्त कर दो तब स्थिर मन से सुमिरन करो।


32. ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत।
सत्यवान परमार थी, आदर भाव सहेत।।

अर्थ :- ज्ञानी व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं होते। उनके हृद्य में सबके हित की भावना बसी रहती है और वे हर प्राणी से प्रेम का व्यवहार करते है। सदा सत्य का पालन करने वाले तथा परमार्थ होते हैं।



33. शब्द सहारे बोलिय, शब्द के हाथ न पाव।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।

अर्थ :- मुख से जो भी बोलो, सम्भाल कर बोलो कहने का तात्पर्य यह कि जब भी बोलो सोच समझकर बोलो क्योंकि शब्द के हाथ पैर नहीं होते किन्तु इस शब्द के अनेकों रूप हैं। यही शब्द कहीं औषधि का कार्य करता है तो कहीं घाव पहूँचाता है अर्थात कटु शब्द दुःख देता है।


34. नाम रसायन प्रेम रस, पीवन अधिक रसाल।
कबीर पीवन दुर्लभ है, मांगै शीश कलाल।।

अर्थ :- संत कबीर जी कहते है कि सद्गुरू के ज्ञान का प्रेम रस पीनें में बहुत ही मधुर और स्वादिष्ट होता है किन्तु वह रस सभी को प्राप्त नहीं होता। जो इस प्राप्त करने के लिए अनेकों काठीनाइयो को सहन करते हुए आगे बढता है उसे ही प्राप्त होता है क्योंकि उसके बदले में सद्गुरू तुम्हारा शीश मांगते हैं अर्थात् अहंकार का पूर्ण रूप से त्याग करके सद्गुरू को अपना तन मन अर्पित कर दो।


35. सतगुरु हमसों रीझि कै, कह्य एक परसंग।
बरषै बादल प्रेम को, भिंजी गया सब अंग।।

अर्थ :- सद्गुरू ने मुझसे प्रसन्न होकर एक प्रसंग कहा जिसका वर्णन शब्दों में कर पाना अत्यन्त कठिन है। उनके हृदय से प्रेम रुपी बादल उमड कर बरसने लगा और मेरा मनरूपी शरीर उस प्रेम वर्षा से भीगकर सराबोर हो गया।


36. सहज मिलै सो दूध है, मांगि मिलै सो पानि।
कहैं कबीर वह रक्त है, जामें ऐंचातानि।।

अर्थ :- उपरोक्त का निरूपण करते हुए कबीरदास जी कहते है। जो बिना मांगे सहज रूप से प्राप्त हो जाये वह दूध के समान है और जो मांगने पर प्राप्त हो वह पानी के समान है और किसी को कष्ट पहुंचाकर या दु:खी करके जो प्राप्त हो वह रक्त के समान है।


37. मोह सलिल की धार में, बहि गये गहिर गंभीर।
सूक्ष्म मछली सुरति है, चढ़ती उल्टी नीर।।

अर्थ :- मोहरूपी जल की तीव्र धारा में बड़े बड़े समझदार और वीर बह गये, इससे पार न पा सके। सूक्ष्म रूप से शरीर के अन्दर विद्यमान सुरति एक मछली की तरह है जो विपरीत दिशा ऊपर की ओर चढ़ती जाती है। इसकी साधना से सार तत्व रूपी ज्ञान की प्राप्ती होती है।



38. जो जल बाढे नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।

अर्थ :- यदि नव में जल भरने लगे और घर में धन संपत्ति बढ़ने लगे तो दोनों हाथ से उलीचना आरम्भ कर दो। दोनों हाथो से बाहर निकालों यही बुद्धिमानी का काम है अन्यथा डूब मरोगे। धन अधिक संग्रह करने से अहंकार उत्पन्न होता है जो पाप को जन्म देता है।


39. बहुता पानी निरमला, जो टुक गहिरा होय।
साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय।।

अर्थ :- बहता हुआ पानी निर्मल और स्वच्छ है किन्तु रुका हुआ पानी भी स्वच्छ हो सकता है यदि थोडा गहरा हो इसी तरह बैठे हुए साधु भी अच्छे हो सकते हैं यदि वे साधना की गहराई से परिपूर्ण हो अर्थात ध्यान भजन, पूजा पाठ का ज्ञान हो।


40. बहुत जतन करि कीजिए, सब फल जाय न साय।
कबीर संचै सूम धन, अन्त चोर लै जाय।।

अर्थ :- कबीरदास जी कहते है कि कठिन परिश्रम करके संग्रह किया गया धन अन्त में नष्ट हो जाता है जैसे कंजूस व्यक्ति जीवन भार पाई पाई करके धन जोड़ता है अन्त में उसे चोर चुरा ले जाता है अर्थात वह उस धन का उपयोग भी नहीं कर पाता।

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