कबीर दास जी के दोहे । कबीर की रचनाओं का संकलन भाग – 3

कबीर दास जी के दोहे

कबीर दास जी के दोहे

कबीर दास जी के दोहे:- कबीर दास जी ने मनुष्यों को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने के लिए दोहों की रचना की। कबीर दास जी के दोहे को पढ़कर इंसान में सकारात्मकता आती है। मनुष्य अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होता है। इसीलिए हमने अपने पाठको के लिए कबीर दास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित लेके आये है। कबीर दास जी के दोहे के संकलन का ये तीसरा भाग है।

पहला भाग यहाँ से पढ़ सकते है- कबीर के दोहे भाग १

पढ़िए कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित भाग 3 –

शीलवन्त सुर ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय।।

अर्थ :- सद्गुरु की सेवा करने वाले शीलवान, ज्ञानवान और उदार ह्रदय वाले होते हैं और लज्जावान बहुत ही निश्छल स्वभाव और कोमल वाले होते है।


कबीर गुरु सबको चहै , गुरु को चहै न कोय।
जब लग आश शरीर की, तब लग दास न होय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि सबको कल्याण करने के लिए गुरु सबको चाहते है किन्तु गुरु को अज्ञानी लोग नहीं चाहते क्योंकि जब तक मायारूपी शरीर से मोह है तह तक प्राणी सच्चा दास नहीं हो सकता।


प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जो रुचै, शीश देय ले जाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि प्रेम की फसल खेतों में नहीं उपजती और न ही बाजारों में बिकती है अर्थात यह व्यापार करने वाली वास्तु नहीं है। प्रेम नामक अमृत राजा रंक, अमीर – गरीब जिस किसी को रुच कर लगे अपना शीश देकर बदले में ले।


साधु सीप समुद्र के, सतगुरु स्वाती बून्द।
तृषा गई एक बून्द से, क्या ले करो समुन्द।।

अर्थ :- साधु सन्त एवम ज्ञानी महात्मा को समुद्र की सीप के समान जानो और सद्गुरु को स्वाती नक्षत्र की अनमोल पानी की बूंद जानो जिसकी एक बूंद से ही सारी प्यास मिट गई फिर समुद्र के निकट जाने का क्या प्रयोजन। सद्गुरु के ज्ञान उपदेश से मन की सारी प्यास मिट जाती है।



आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगी रहे अनुराग।
हिरदै पलक न बीसरें, तब सांचा बैराग।।

अर्थ :- आठ प्रहर और चौसंठ घड़ी सद्गुरु के प्रेम में मग्न रहो अर्थ यह कि उठते बैठते, सोते जागते हर समय उनका ध्यान करो। अपने मन रूपी मन्दिर से एक पल के लिए भी अलग न करो तभी सच्चा बैराग्य है।


सुमिरण की सुधि यौ करो, जैसे कामी काम।
एक पल बिसरै नहीं, निश दिन आठौ जाम।।

अर्थ :- सुमिरण करने का उपाय बहुत ही सरल है किन्तु मन को एकाग्र करके उसमें लगाना अत्यन्त कठिन है। जिस तरह कामी पुरुष का मन हर समय विषय वासनाओं में लगा रहता है उसी तरह सुमिरण करने के लिए ध्यान करो। एक पल भी व्यर्थ नष्ट मत करो। सुबह, शाम, रात आठों पहर सुमिरण करो।


सुमिरण की सुधि यौ करो, ज्यौं गागर पनिहारि।
हालै डीलै सुरति में, कहैं कबीर बिचारी।।

अर्थ :- संत कबीर जी सुमिरण करने की विधि बताते हुए कहते है कि सुमिरन इस प्रकार करो जैसे पनिहार न अपनी गागर का करती है। गागर को जल से भरकर अपने सिर पर रखकर चलती है। उसका समूचा शरीर हिलता डुलता है किन्तु वह पानी को छलकने नहीं देती अर्थात हर पल उसे गागर का ध्यान रहता है उसी प्रकार भक्तों को सदैव सुमिरण करना चाहिए।


दया का लच्छन भक्ति है, भक्ति से होवै ध्यान।
ध्यान से मिलता ज्ञान है, यह सिद्धान्त उरान।।

अर्थ :- दया का लक्षण भक्ति है और श्रद्धा पूर्वक भक्ति करने से परमात्मा का ध्यान होता है। जो ध्यान करता है उसी को ज्ञान मिलता है यही सिद्धान्त है जो इस सिद्धान्त का अनुसरण करता है उसके समस्त क्लेश मिट जाते है।


दया धर्म का मूल है, पाप मूल संताप।
जहा क्षमा वहां धर्म है, जहा दया वहा आप।।

अर्थ :- परमज्ञानी कबीर दास जी अपनी वाणी से मानव जीवन को ज्ञान का उपदेश करते हुए कहते है। कि दया, धर्म की जड़ है और पाप युक्त जड़ दूसरों को दु:खी करने वाली हिंसा के समान है। जहा क्षमा है वहा धर्म का वास होता है तथा जहा दया है उस स्थान पर स्वयं परमात्मा का निवास होता है अतः प्रत्येक प्राणी को दया धर्म का पालन करना चाहिए।


तेरे अन्दर सांच जो, बाहर नाहिं जनाव।
जानन हारा जानि है, अन्तर गति का भाव।।

अर्थ :- तुम्हारे अन्दर जो सत्य भावना निहित है उसका प्रदर्शन मत करो। जो अन्तर गति का रहस्य जानने वाले ज्ञानी का प्रदर्शन करना उचित नहीं है।



कामी कबहूँ न गुरु भजै, मिटै न सांसै सूल।
और गुनह सब बख्शिहैं, कामी डाल न भूल।।

अर्थ :- कम के वशीभूत व्यक्ति जो सांसारिक माया में लिप्त रहता है वह कभी सद्गुरु का ध्यान नहीं करता क्योंकि हर घड़ी उसके मन में विकार भरा रहता है, उसके अन्दर संदेह रूपी शूल गड़ा रहता है जिस से उसका मनसदैव अशान्त रहता है। संत कबीर जी कहते हैं कि सभी अपराध क्षमा योग्य है किन्तु कामरूपी अपराध अक्षम्य है जिसके लिए कोई स्थान नहीं है।


धरती फाटै मेघ मिलै, कपडा फाटै डौर।
तन फाटै को औषधि , मन फाटै नहिं ठौर।।

अर्थ :- धरती फट गयी है अर्थात दरारे पड़ गयी है तो मेघों द्वारा जल बरसाने पर दरारें बन्द हो जाती हैं और वस्त्र फट गया है तो सिलाई करने पर जुड़ जाता है। चोट लगने पर तन में दवा का लेप किया जाता है जिससे शरीर का घाव ठीक हो जाता है किन्तु मन के फटने पर कोई औषधि या कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता।


माली आवत देखि के, कलियां करे पुकार।
फूली फूली चुन लई, काल हमारी बार।।

अर्थ :- माली को आता हुआ देखकर कलियां पुकारने लगी, जो फूल खिल चुके थे उन्हें माली ने चुन लिया और जो खिलने वाली है उनकी कल बारी है। फूलों की तरह काल रूपी माली उन्हें ग्रस लेता है जो खिल चुके है अर्थात जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है, कली के रूप में हम है हमारी बारी कल की है तात्पर्य यह कि एक एक करके सभी को काल का ग्रास बनना है।


झूठा सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद।
जगत – चबेना काल का , कछु मूठी कछु गोद।।

अर्थ :- उपरी आवरण को, भौतिक सुख को सांसारिक लोग सुख मानते है और प्रसन्न होते है किन्तु यह सम्पूर्ण संसार काल का चबेना है। यहां कुछ काल की गेंद में है और कुछ उसकी मुटठी में है। वह नित्य प्रतिदिन सबको क्रमानुसार चबाता जा रहा है।


जरा कुत्ता जोबन ससा, काल आहेरी नित्त।
गो बैरी बिच झोंपड़ा, कुशल कहां सो मित्त।।

अर्थ :- मनुष्यों को सचेत करते हुए संत कबीर जी कहते है – हे प्राणी! वृद्धावस्था कुत्ता और युवा वस्था खरगोश के समान है। यौवन रूपी शिकार पर वृद्धावस्था रूपी कुत्ता घात लगाये हुए है। एक तरफ वृद्धावस्था है तो दूसरी ओर काल। इस तरह दो शत्रुओं के बीच तुम्हारी झोंपडी है। यथार्थ सत्य से परिचित कराते हुए संत जी कहते है कि इनसे बचा नहीं जा सकता।


मूसा डरपे काल सू, कठिन काल का जोर।
स्वर्ग भूमि पाताल में, जहां जाव तहं गोर।।

अर्थ :- काल की शक्ति अपरम्पार है जिससे मूसा जैसे पीर पैगम्बर भी डरते थे और उसी डर से मुक्ति पाने के लिए अल्लाह और खुदा की बन्दगी करते थे। स्वर्ग , पृथ्वी अथवा पाताल में, जहां कहीं भी जाइये। सर्वत्र काल अपना विकराल पंजा फैलाये हुए है।



मन गोरख मन गोविंद, मन ही औघड़ सोय।
जो मन राखै जतन करि, आपै करता होय।।

अर्थ :- मन ही योगी गोरखनाथ है, मन ही भगवान है, मन ही औघड़ है अर्थात मन को एकाग्र करके कठिन साधना करने से गोरखनाथ जी महान योगी हुए, मन की शक्ति से मनुष्य की पूजा भगवान की तरह होती है। मन को वश में करके जो भी प्राणी साधना स्वाध्याय करता है वह स्वयं ही अपना कर्त्ता बन जाती है।


कबीर माया बेसवा, दोनूं की इक जात।
आवंत को आदर करै, जात न बुझै बात।।

अर्थ :- माया और वेश्या इन दोनों की एक जात है, एक कर्म है। ये दोनों पहले प्राणी को लुभाकर पूर्ण सम्मान देते है परन्तु जाते समय बात भी नहीं करते।


कामी अमी न भावई, विष को लेवै सोध।
कुबुधि न भाजै जीव की , भावै ज्यौं परमोध।।

अर्थ :- विषय भोगी कामी पुरुष को कितना भी उपदेश दो, सदाचार और ब्रह्ममर्य आदि की शिक्षा दो उसे अच्छा नहीं लगता। वह सदा काम रूपी विष को ढूंढता फिरता है। चित्त की चंचलता से उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। जिसे कारण सद्गुणों को वह ग्रहण नहीं कर पाता है।


कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम जनम का मोरचा, पल में डारे धोय।।

अर्थ :- अज्ञान रूपी कीचड़ में शिष्य डूबा रहता है अर्थात शिष्य अज्ञान के अन्धकार में भटकता रहता है जिसे गुरु अपने ज्ञान रूपी जल से धोकर स्वच्छ कर देता है।


दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग।
बढ़ी लहर जो विषय की, जरत न मारै अंग।।

अर्थ :- प्रज्जवलित दीपक की सुन्दर लौ को देख कर कीट पतंग मोह पाश में बंधकर उसके ऊपर मंडराते है ओर जल जलकर मरते है। ठीक इस प्रकार विषय वासना के मोह में बंधकर कामी पुरुष अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भटक कर दारुण दुःख भोगते है।

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