कबीर के दोहे | संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित। भाग – १

कबीर के दोहे

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कबीर के दोहे

कबीर के दोहे:-
कबीर जी पढ़े लिखे नहीं थे। फिर भी कबीर जी ने इंसान को वो ज्ञान दिया जिसे विचार कर इंसान का जीवन बदल जाए। उन्होंने मनुष्यों को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने के लिए दोहों की रचना की। इन कबीर के दोहे को पढ़कर इंसान में सकारात्मकता आती है। मनुष्य अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होता है। इसीलिए हमने अपने पाठको के लिए कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित लेके आये है। आइये हम भी कबीर जी के इन अनमोल दोहों को पढ़ें और अपने जीवन को खुशहाल बनाने का प्रयास करें।

[ध्यान दे – हमने जितने कबीर के दोहे संग्रह किया है, संख्या में अधिक होने के कारन एक पोस्ट में आना संभव नही था। इसलिए पाठको की सुविधाओ को देखते हुए हमने कबीर के दोहे को 4 पोस्ट में बांटे है, प्रत्येक पोस्ट का लिंक इस पोस्ट के अंत में दिया गया है, सभी पोस्ट पढ़िए  ]


1. भक्ति बिगाडी कामिया, इन्द्रीन केरे स्वाद।
हीरा खोया हाथ सों, जन्म गंवाया बाद।।

अर्थ :- विषय भोगों के चक्कर में पडकर कामी मूर्ख मनुष्यों ने इन्द्रीयों को अपने वश में नहीं किया और सर्वहित साधन रूपी  भक्ति को बिगाड दिया अर्थात् अनमोल हीरे को गंवाकर सारा जीवन व्यर्थ में गुजार दिया।


2. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

अर्थ :- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।


3. ऊजल पाहिनै कपडा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपूर जाय।।

अर्थ :- सफेद रंग के सुन्दर कपडे पहनना और पान सुपारी खाना, यह पहनावा और दर्शन व्यर्थ है संत कबीर दास जी कहते हैं कि जो प्राणी सद्गुरू की भक्ति नहीं करता और विषय वासनाओं में लिप्त रहता है उसे यमदूत अपने पाशों नरक रुपी यातनाएँ सहना होता है।


4. जब मै था तब गुरु नहीं, अब गुरु है मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समांही।।

अर्थ :- जब अहंकार रूपी मैं मेरे अन्दर समाया हुआ था तब मुझे गुरु नहीं मिले थे, अब गुरु मिल गये और उनका प्रेम रस प्राप्त होते ही मेरा अहंकार नष्ट हो गया। प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें एक साथ दो नहीं समा सकते अर्थात गुरु के रहते हुए अहंकार नहीं उत्पन्न हो सकता।



5. क्यों नृपनारी निन्दिये, पनिहारी को मान।
वह मांग संवारे पीवहित, नित वह सुमिरे राम।।

अर्थ :- राजाओं महाराजाओं की रानी की क्यों निन्दा होती है और हरि का भजन करने वाली की प्रशंसा क्यों होती है? जरा इस पर विचार कीजिए। रानी तो अपने पति राजा को प्रसन्न करने के लिए नित्य श्रुंगार करके अपनी मांग सजाती है जबकि हरि भक्तिन घट घट व्यापी प्रभु राम नाम की सुमिरण करती है।


6. संगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय।
लोहा पारस परसते, सो भी कंचन होय।।

अर्थ :- सन्तो के साथ रहना, उनके वचनों को ध्यानपूर्वक सुनना तथा उस पर अमल करना हितकारी होता है। सन्तों की संगति करने से फल अवश्य प्राप्त होता है जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है उसी प्रकार साधुओं के दिव्य प्रभाव से साधारण मनुष्य पूज्यनीय हो जाता है।


7.  कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।

अर्थ :- एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते।


8. तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।।

अर्थ :- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।


9. पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।।

अर्थ :-  पांच पहर काम पर गए, तीन पहर नींद में बिताए, आखिरी एक पहर में भी भगवान् को याद नहीं किया, अब आप ही बताईये कि मुक्ति कैसे मिलेगी।


10. गुरु गोविन्द दोऊ एक हैं, दुजा सब आकार।
आपा मैटैं हरि भजैं, तब पावैं दीदार।।

अर्थ :- गुरु और गोविंद दोनो एक ही हैं केवळ नाम का अंतर है। गुरु का बाह्य(शारीरिक) रूप चाहे जैसा हो किन्तु अंदर से गुरु और गोविंद मे कोई अंतर नही है। मन से अहंकार कि भावना का त्याग करके सरल और सहज होकर आत्म ध्यान करने से सद्गुरू का दर्शन प्राप्त होगा। जिससे प्राणी का कल्याण होगा। जब तक मन  मे मैलरूपी “मैं और तू” की भावना रहेगी तब तक दर्शन नहीं प्राप्त  हो सकता।


11. रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते हैं कि रात सो कर गवां दी, और दिन खाने-पीने में गुजार दिया। हीरे जैसा अनमोल जीवन, बस यूं ही व्यर्थ गवां दिया।



12. चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए।
वैद्य बिचारा क्या करे, कहां तक दवा खवाय॥

अर्थ :- चिंता ऐसी डाकिनी है, जो कलेजे को भी काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। वे कहते हैं कि मन के चिंताग्रस्त होने की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है, जैसे समुद्र के भीतर आग लगी हो। इसमें से न धुआं निकलती है और न वह किसी को दिखाई देती है। इस आग को वही पहचान सकता है, जो खुद इस से हो कर गुजरा हो।


13. शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की संपदा, रही शील में आन।।

अर्थ :- जीवन में विनम्रता सबसे बड़ा गुण होता है, यह सब गुणों की खान है। सारे जहां की दौलत होने के बाद भी सम्मान, विनम्रता से ही मिलता है।


14. आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।।
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर ।

अर्थ :- जो भी व्यक्ति इस संसार में आता है चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब हो वह आखिरकार, इस दुनिया से चला जाता है। एक व्यक्ति को धन-दौलत मिलती है जबकि दूसरा जात-पात की जंजीरों में जकड़ा रहता है।


15. गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है – हे सांसारिक प्राणीयों। बिना गुरु के ज्ञान का मिलना असंभव है। तब टतक मनुष्य अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकडा राहता है जब तक कि गुरु की कृपा नहीं प्राप्त होती। मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं। बिना गुरु के सत्य एवम् असत्य का ज्ञान नही होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरु कि शरण मे जाओ। गुरु ही सच्ची रह दिखाएंगे।


16. कामी क्रोधी लालची, इनते भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा, जादि बरन कुल खोय।।

अर्थ :- विषय वासना में लिप्त रहने वाले, क्रोधी स्वभाव वाले तथा लालची प्रवृति के प्राणियों से भक्ति नहीं होती। धन संग्रह करना, दान पूण्य न करना ये तत्व भक्ति से दूर ले जाते है। भक्ति वही कर सकता है जो अपने कुल, परिवार जाति तथा अहंकार का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा एवम् विश्वास से कोई पुरुषार्थी ही कर सकता है। हर किसी के लिए संभव नहीं है।



17. भक्ति बीज पलटे नहीं, जो जुग जाय अनन्त।
ऊँच नीच बर अवतरै, होय सन्त का सन्त।।

अर्थ :- भक्ति का बोया बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता चाहे अनन्त युग व्यतीत हो जाये। यह किसी भी कुल अथवा जाति में ही, परन्तु इसमें होने वाला भक्त सन्त ही रहता है। वह छोटा बड़ा या ऊँचा नीचा नहीं होता अर्थात भक्त की कोई जात नहीं होती।


18. प्रीती बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।
उत्तम प्रीती सो जानियो, सतगुरु से जो होय।।

अर्थ :- इस जगत में अनेक प्रकार की प्रीती है किन्तु ऐसी प्रीती जो स्वार्थ युक्त हो उसमें स्थायीपन नहीं होता अर्थात आज प्रीती हुई कल किसी बात पर तू-तू , मै-मै होकर विखंडित हो गयी। प्रीती सद्गुरु स्वामी से हो तो यही सर्वश्रेष्ठ प्रीती है। सद्गुरु की कृपा से, सद्गुरु से प्रीती करने पर सदा अच्छे गुणों का आगमन होता है।


19. अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

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1 Response

  1. neelesh कहते हैं:

    Aap ne bhut achhe kabir ke dohe share kiye nice.

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