रश्मिरथी तृतीय सर्ग | Rashmirathi Krishna Ki Chetavani | Rashmirathi Poem

रश्मिरथी तृतीय सर्ग भाग 3 ( शेष भाग )

“कुन्ती का मैं भी एक तनय,
जिसको होगा इसका प्रत्यय
संसार मुझे धिक्कारेगा,
मन में वह यही विचारेगा

फिर गया तुरत जब राज्य मिला,
यह कर्ण बड़ा पापी निकला

“मैं ही न सहूंगा विषम डंक,
अर्जुन पर भी होगा कलंक
सब लोग कहेंगे डर कर ही,
अर्जुन ने अद्भुत नीति गही

चल चाल कर्ण को फोड़ लिया
सम्बन्ध अनोखा जोड़ लिया

“कोई भी कहीं न चूकेगा,
सारा जग मुझ पर थूकेगा
तप त्याग शील, जप योग दान,
मेरे होंगे मिट्टी समान

लोभी लालची कहाऊँगा
किसको क्या मुख दिखलाऊँगा?

“जो आज आप कह रहे आर्य,
कुन्ती के मुख से कृपाचार्य
सुन वही हुए लज्जित होते,
हम क्यों रण को सज्जित होते

मिलता न कर्ण दुर्योधन को,
पांडव न कभी जाते वन को

“लेकिन नौका तट छोड़ चली,
कुछ पता नहींं किस ओर चली
यह बीच नदी की धारा है,
सूझता न कूल-किनारा है

ले लील भले यह धार मुझे,
लौटना नहींं स्वीकार मुझे

“धर्माधिराज का ज्येष्ठ बनूँ,
भारत में सबसे श्रेष्ठ बनूँ?
कुल की पोशाक पहन कर के,
सिर उठा चलूँ कुछ तन कर के?

इस झूठ-मूठ में रस क्या है?
केशव ! यह सुयश – सुयश क्या है?

“सिर पर कुलीनता का टीका,
भीतर जीवन का रस फीका
अपना न नाम जो ले सकते,
परिचय न तेज से दे सकते

ऐसे भी कुछ नर होते हैं
कुल को खाते औ’ खोते हैं

“विक्रमी पुरुष लेकिन सिर पर,
चलता ना छत्र पुरखों का धर।
अपना बल-तेज जगाता है,
सम्मान जगत से पाता है।

सब देख उसे ललचाते हैं,
कर विविध यत्न अपनाते हैं

“कुल-गोत्र नहीं साधन मेरा,
पुरुषार्थ एक बस धन मेरा।
कुल ने तो मुझको फेंक दिया,
मैंने हिम्मत से काम लिया

अब वंश चकित भरमाया है,
खुद मुझे खोजने आया है,

“लेकिन मैं लौट चलूँगा क्या?
अपने प्रण से विचरूँगा क्या?
रण मे कुरूपति का विजय वरण,
या पार्थ हाथ कर्ण का मरण,

हे कृष्ण! यही मति मेरी है,
तीसरी नहींं गति मेरी है।

“मैत्री की बड़ी सुखद छाया,
शीतल हो जाती है काया,
धिक्कार-योग्य होगा वह नर,
जो पाकर भी ऐसा तरुवर,

हो अलग खड़ा कटवाता है
खुद आप नहींं कट जाता है।

“जिस नर की बाह गही मैंने,
जिस तरु की छाँह गहि मैंने,
उस पर न वार चलने दूँगा,
कैसे कुठार चलने दूँगा,

जीते जी उसे बचाऊँगा,
या आप स्वयं कट जाऊँगा,

“मित्रता बड़ा अनमोल रतन,
कब इसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ।

उसको भी न्योछावर कर दूँ,
कुरूपति के चरणों में धर दूँ।

“सिर लिए स्कंध पर चलता हूँ,
उस दिन के लिए मचलता हूँ,
यदि चले वज्र दुर्योधन पर,
ले लूँ बढ़कर अपने ऊपर।

कटवा दूँ उसके लिए गला,
चाहिए मुझे क्या और भला?

“सम्राट बनेंगे धर्मराज,
या पाएगा कुरूरज ताज,
लड़ना भर मेरा कम रहा,
दुर्योधन का संग्राम रहा,

मुझको न कहीं कुछ पाना है,
केवल ऋण मात्र चुकाना है।

“कुरूराज्य चाहता मैं कब हूँ?
साम्राज्य चाहता मैं कब हूँ?
क्या नहींं आपने भी जाना?
मुझको न आज तक पहचाना?

जीवन का मूल्य समझता हूँ,
धन को मैं धूल समझता हूँ।

“धनराशि जोगना लक्ष्य नहींं,
साम्राज्य भोगना लक्ष्य नहींं।
भुजबल से कर संसार विजय,
अगणित समृद्धियों का सन्चय,

दे दिया मित्र दुर्योधन को,
तृष्णा छू भी ना सकी मन को।

“वैभव विलास की चाह नहींं,
अपनी कोई परवाह नहींं,
बस यही चाहता हूँ केवल,
दान की देव सरिता निर्मल,

करतल से झरती रहे सदा,
निर्धन को भरती रहे सदा।

“तुच्छ है राज्य क्या है केशव?
पाता क्या नर कर प्राप्त विभव?
चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास,
कुछ चाकचिक्य, कुछ पल विलास,

पर, वह भी यहीं गवाना है,
कुछ साथ नहीं ले जाना है।

“मुझसे मनुष्य जो होते हैं,
कंचन का भार न ढोते हैं,
पाते हैं धन बिखराने को,
लाते हैं रतन लुटाने को,

जग से न कभी कुछ लेते हैं,
दान ही हृदय का देते हैं।

“प्रासादों के कनकाभ शिखर,
होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ ना होता है,
कंचन पर कभी न सोता है।

बसता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में।

“होकर सुख-समृद्धि के अधीन,
मानव होता निज तप क्षीण,
सत्ता किरीट मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज हरण।

नर विभव हेतु लालचाता है,
पर वही मनुज को खाता है।

“चाँदनी पुष्प-छाया मे पल,
नर भले बने सुमधुर कोमल,
पर अमृत क्लेश का पिए बिना,
आताप अंधड़ में जिए बिना,

वह पुरुष नहीं कहला सकता,
विघ्नों को नहीं हिला सकता।

“उड़ते जो झंझावातों में,
पीते सो वारि प्रपातों में,
सारा आकाश अयन जिनका,
विषधर भुजंग भोजन जिनका,

वे ही फणिबंध छुड़ाते हैं,
धरती का हृदय जुड़ाते हैं।

“मैं गरुड़ कृष्ण मै पक्षिराज,
सिर पर ना चाहिए मुझे ताज।
दुर्योधन पर है विपद घोर,
सकता न किसी विधि उसे छोड़,

रण-खेत पाटना है मुझको,
अहिपाश काटना है मुझको।

“संग्राम सिंधु लहराता है,
सामने प्रलय घहराता है,
रह रह कर भुजा फड़कती है,
बिजली-सी नसें कड़कतीं हैं,

चाहता तुरत मैं कूद पडू,
जीतूं कि समर में डूब मरूं।

“अब देर नहीं कीजै केशव,
अवसेर नहीं कीजै केशव।
धनु की डोरी तन जाने दें,
संग्राम तुरत ठन जाने दें,

तांडवी तेज लहरायेगा,
संसार ज्योति कुछ पायेगा।

“हाँ, एक विनय है मधुसूदन,
मेरी यह जन्मकथा गोपन,
मत कभी युधिष्ठिर से कहिए,
जैसे हो इसे छिपा रहिए,

वे इसे जान यदि पायेंगे,
सिंहासन को ठुकरायेंगे।

“साम्राज्य न कभी स्वयं लेंगे,
सारी संपत्ति मुझे देंगे।
मैं भी ना उसे रख पाऊँगा,
दुर्योधन को दे जाऊँगा।

पांडव वंचित रह जाएँगे,
दुख से न छूट वे पाएँगे।

“अच्छा अब चला प्रणाम आर्य !
हो सिद्ध समर के शीघ्र कार्य।
रण में ही अब दर्शन होगा,
शर से चरण-स्पर्शन होगा।

जय हो, दिनेश नभ में विहरें,
भूतल में दिव्य प्रकाश भरें।”

रथ से राधेय उतार आया,
हरि के मन में विस्मय छाया,
बोले कि “वीर! शत बार धन्य,
तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

तू कुरूपति का ही नहीं प्राण,
नरता का है भूषण महान।”

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