मेले पर कविता :- जब जब भी है आता मेला | मेला बाल कविता

मेले पर कविता में पढ़िए मेले के दृश्यों का वर्णन और मेले का उद्देश्य। मेला ही एक ऐसा अवसर होता है जब मनुष्य बहुत कम पैसों में या बिना पैसों के भी मेले की रौनक देख अपना दिल बहला लेता है। क्या-क्या और होता है मेले में आइये जानते हैं इस मेले पर कविता के जरिये :-

मेले पर कविता

मेले पर कविता

जब जब भी है आता मेला

हमको खूब लुभाता मेला,

इसे देख मन खुश हो जाता

नई उमंगें लाता मेला।

 

मेले में सजती दूकानें

सर्कस दिखता तम्बू ताने,

मेले में मिलते हैं हमको

लोग कई जाने अनजाने।

 

दृश्य कई भाते मेले में

चीज कई खाते मेले में,

झुंड बना ग्रामीण लोग तो

गीत कई गाते मेले में।

 

मेले में हैं चकरी झूले

बच्चे फिरते फूले – फूले,

रंग – बिरंगी इस दुनिया में

आ सब अपने दुःख को भूले।

 

मेले की है बात निराली

तिल रखने को जगह न खाली,

लगता जैसे मना रहे हैं

लोग यहाँ आकर दीवाली।

 

मेलों से अपनापन बढ़ता

रंग प्रेम का मन पर चढ़ता,

मानव सामाजिक होने का

पाठ इन्हीं मेलों से पढ़ता।

 

जब जब भी है आता मेला

हमको खूब लुभाता मेला,

इसे देख मन खुश हो जाता

नई उमंगें लाता मेला।

पढ़िए :- बचपन के दिनों पर कविता “बचपन की यादें”


सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा' कोटा, राजस्थान के रहने वाले सुरेश चन्द्र “सर्वहारा” जी स्वैच्छिक सेवानिवृत्त अनुभाग अधिकारी (रेलवे) हैं। सुरेश जी एक वरिष्ठ कवि और लेखक हैं। ये संस्कृत और हिंदी में परास्नातक हैं। इनकी कई काव्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें नागफनी, मन फिर हुआ उदास, मिट्टी से कटे लोग आदि प्रमुख हैं।

इन्होंने बच्चों के लिए भी साहित्य में बहुत योगदान दिया है और बाल गीत सुधा, बाल गीत सुमन, बच्चों का महके बचपन आदि पुस्तकें भी लिखी हैं।

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