दुनिया के 7 अजूबे | Seven Wonders Of The World Detail Info In Hindi

कितनी सुंदर लगती है न दुनिया जब हमें मनभावन दृश्य देखने को मिलते हैं। मन को कितनी शांति प्राप्त होती है। हमारी दुनिया में ऐसे कई कुदरती स्थान होंगे जिसे देख कर मन ख़ुशी से भर जाता है। परन्तु इस से अलग इस धरती पर कुछ ऐसे स्मारक और इमारतें भी हैं जो कलाकारी का एक अद्भुत उदाहरण हैं और जिन्हें देख कर बहुत आश्चर्य होता है, और जिन्हें दुनिया के 7 अजूबे कहा जाता है। इतना ही नहीं कुछ इमारतें सदियों से अपनी पहचान बनाये रखने में आज तक सक्षम रही हैं।

दुनिया के 7 अजूबे

दुनिया के 7 अजूबे

प्रतियोगिता एक ऐसी भावना है जो अक्सर हर इन्सान के अन्दर रहती है। इसी भावना को जब इन इमारतों से जोड़ा गया तो 2001 में स्विस कारपोरेशन न्यू 7 वंडर्स फाउंडेशन ने दुनिया भर में 200 स्मारकों के बीच 7 सर्वश्रेष्ठ स्मारकों को चुनने कि एक मुहिम चलायी। जिनसे हमें दुनिया के 7 अजूबे मिल सके। जिनमें से 21 विजेताओं के नाम 1 जनवरी, 2006 को घोषित किये गए।

मिस्त्र के लोगों में इस बात को लेकर असंतोष था कि उनके एकमात्र स्मारक गिज़ा के महान पिरामिड (Great Pyramid Of Giza) को अन्य प्रसिद्द स्मारकों के साथ प्रतियोगिता में रखा जा रहा है। उस समय इसे एक सम्माननीय प्रतिभागी मान कर प्रतियोगिता से अलग कर दिया गया। लिस्बन में 7 जुलाई, 2007 को दुनिया के 7 अजूबे की घोषणा की गयी। जो निम्नलिखित हैं:



1. चीचेन इट्ज़ा में पिरामिड (The pyramid at Chichen Itza)

chichen itza in hindi

दुनिया के 7 अजूबे में से यह पहला अजूबा है। माया नाम “चीचेन इट्ज़ा” का अर्थ होता है “इट्ज़ा के कुएं के मुहाने पर”। यह ची शब्द से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है “मुख” या “मुहाना” और चेन का अर्थ होता है “कुआं”। इट्ज़ा एक जातीय-वंश समूह का नाम है।

ऐसा माना जाता है कि यह नाम माया के इट्ज़ (itz) से लिया गया है, जिसका अर्थ है “जादू” और (h)á का अर्थ है “पानी।” स्पेनिश में इट्ज़ा (itzá) का अर्थ होता है “जल की चुड़ैलें (Brujas del Agua)” लेकिन इसका एक और अधिक सटीक अनुवाद है जल के जादूगर।

चीचेन के केन्द्र में प्रभावी रूप से स्थित है 79 फीट की ऊँचाई पर बना कुकुल्कन मंदिर (क्वेत्जालकोट के लिए माया नाम) जिसे अक्सर “अल कैस्टिलो” (महल) के रूप में सन्दर्भित किया जाता है। इस सीढ़ीदार पिरामिड का आधार चौकोर है और चारों ओर से शीर्ष पर स्थिति मंदिर के लिए हर तरफ 91 सीढ़ियां हैं। हर सीढ़ी एक दिन का प्रतीक है और मंदिर 365वां दिन।

वसंत और शरद के विषुव में, सूर्य के उदय और अस्त होने पर, यह संरचना उत्तर की सीढ़ी के पश्चिम में एक पंखदार सर्प की छाया निर्मित करती है – कुकुल्कन, या क्वेत्ज़लकोटल. इन दो वार्षिक अवसरों पर, इन कोनों की छाया सूरज की हरकत के साथ पिरामिड के उत्तर ओर गिरती है जो सर्प के सिर तक जाती है।



1930 के दशक के मध्य, मैक्सिकन सरकार ने अल कैस्टिलो की खुदाई को प्रायोजित किया। कई गलत शुरूआत के बाद, पिरामिड के उत्तर की ओर अन्दर उन्हें एक सीढ़ी मिली. ऊपर से खुदाई करने पर, उन्हें मौजूदा मंदिर के नीचे दबा हुआ एक और मंदिर मिला। मंदिर के चैम्बर के अन्दर एक चाक मूल मूर्ति थी और तेंदुएं के आकार का एक सिंहासन था, जो लाल रंग में रंगा था और उस पर इनलेड जेड से धब्बे बने हुए थे।

मैक्सिकन सरकार ने पुराने पिरामिड के गुप्त मंदिर तक जाने वाली सीढ़ी के लिए उत्तरी सीढ़ी के नीचे से एक सुरंग खोदी और इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया. 2006 में, INAH ने जनता के लिए सिंहासन कमरे को बंद कर दिया।

2. क्राइस्ट द रिडीमर (Christ the Redeemer)

Christ the Redeemer in hindi

ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो में स्थापित ईसा मसीह की एक प्रतिमा है जिसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आर्ट डेको स्टैच्यू माना जाता है। यह प्रतिमा अपने 9.5 मीटर (31 फीट) आधार सहित 39.6 मीटर (130 फ़ुट) लंबी और 30 मीटर (98 फ़ुट) चौड़ी है। इसका वजन 635 टन (700 शॉर्ट टन) है और तिजुका फोरेस्ट नेशनल पार्क में कोर्कोवाडो पर्वत की चोटी पर स्थित है। 700 मीटर (2,300 फ़ुट) जहाँ से पूरा शहर दिखाई पड़ता है।

यह दुनिया में अपनी तरह की सबसे ऊँची मूर्तियों में से एक है (बोलीविया के कोचाबम्बा में स्थित क्राइस्टो डी ला कोनकोर्डिया की प्रतिमा इससे थोड़ी अधिक ऊँची है)। ईसाई धर्म के एक प्रतीक के रूप में यह प्रतिमा रियो और ब्राजील की एक पहचान बन गयी है। यह मजबूत कांक्रीट और सोपस्टोन से बनी है, इसका निर्माण 1922 और 1931 के बीच किया गया था।

कोर्कोवाडो की चोटी पर एक विशाल प्रतिमा खड़ी करने का विचार पहली बार 1850 के दशक के मध्य में सुझाया गया था जब कैथोलिक पादरी पेड्रो मारिया बॉस ने राजकुमारी ईसाबेल से एक विशाल धार्मिक स्मारक बनाने के लिए धन देने का आग्रह किया था। राजकुमारी ईसाबेल ने इस विचार पर अधिक ध्यान नहीं दिया और ब्राजील के एक गणतंत्र बन जाने के बाद 1889 में इसे खारिज कर दिया गया, जिसके क़ानून में चर्च और राज्य को अलग-अलग रखने की अनिवार्यता थी।

पर्वत पर एक अभूतपूर्व प्रतिमा स्थापित करने का दूसरा प्रस्ताव रियो के कैथोलिक सर्कल द्वारा 1921 में लाया गया। इस समूह ने प्रतिमा के निर्माण के समर्थन में दान राशि और हस्ताक्षर जुटाने के लिए मोनुमेंट वीक (“सेमाना डू मोनुमेंटो”) नामक एक कार्यक्रम का आयोजन किया। दान ज्यादातर ब्राजील के कैथोलिक समुदाय से आए।

“ईसा मसीह की प्रतिमा” के लिए चुने गए डिजाइनों में ईसाई क्रॉस का एक प्रतिनिधित्व, अपने हाथ में पृथ्वी को लिए ईसा मसीह की एक मूर्ति और विश्व का प्रतीक एक चबूतरा शामिल था। खुली बाहों के साथ “क्राइस्ट द रिडीमर” की प्रतिमा को चुना गया। इसके निर्माण में 1922 से 1931 तक नौ साल लग गए और इसकी लागत 250,000 अमेरिकी डॉलर के समकक्ष (2009 में लगभग 3.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर) थी।

यह शांति का एक प्रतीक भी है। पक्षियों के इस पर बैठने से रोकने के लिए प्रतिमा के शीर्ष पर छोटी-छोटी कीलें भी लगाई गयी हैं। स्मारक को 12 अक्टूबर 1931 को खोला गया था।



अक्टूबर 2006 में प्रतिमा की 75वीं सालगिरह के अवसर पर रियो कार्डिनल यूसेबियो ऑस्कर शील्ड के आर्कबिशप ने प्रतिमा के नीचे एक चैपल (ब्राजील के संरक्षक संत–नोस्सा सेन्होरा एपारेसिडा या “अवर लेडी ऑफ द एप्पारिशन” के नाम पर) की स्थापना की। यह कैथोलिक धर्म के लोगों को वहाँ नामकरण और शादियों का आयोजन करने की अनुमति देता है।

10 फ़रवरी 2008, रविवार को एक प्रचंड बिजली के तूफ़ान के दौरान प्रतिमा पर बिजली गिरने से इसकी उंगलियों, सिर और भौहों को कुछ नुकसान पहुँचा था। सोपस्टोन की कुछ बाहरी परतों को बदलने और प्रतिमा पर लगायी गयी बिजली की छड़ों की मरम्मत के लिये रियो डी जेनेरो की राज्य सरकार और आर्कडायोसीज द्वारा एक जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया।

15 अप्रैल 2010 को प्रतिमा के सिर और दाहिने हाथ पर भित्ति चित्र (ग्राफीती) का स्प्रे कर दिया गया। मेयर एडुआर्डो पेस ने इस कार्य को “राष्ट्र के विरुद्ध एक अपराध” करार दिया और इन असभ्य लोगों को जेल भेजने की कसम खाई और यहाँ तक कि इनकी गिरफ़्तारी का कारण बनने वाली किसी भी सूचना के लिये 10,000 रोमन डॉलर (R$) के ईनाम की पेशकश कर दी। मिलिट्री पुलिस ने अंततः इस बर्बरतापूर्ण कार्य के लिये संदिग्ध के रूप में हाउस पेंटर पाउलो सूजा डोस सैन्टोस की पहचान की।

3. कोलोसियम या कोलिसियम (Colosseum)

Colosseum in hindi

इटली देश के रोम नगर के मध्य निर्मित रोमन साम्राज्य का सबसे विशाल एलिप्टिकल एंफ़ीथियेटर है। यह रोमन स्थापत्य और अभियांत्रिकी का सर्वोत्कृष्ट नमूना माना जाता है। इसका निर्माण तत्कालीन शासक वेस्पियन ने 70वीं – 72वीं ईस्वी के मध्य प्रारंभ किया और 80वीं ईस्वी में इसको सम्राट टाइटस ने पूरा किया।

81 और 96 वर्षों के बीच इसमें डोमीशियन के राज में इसमें कुछ और परिवर्तन करवाए गए। इस भवन का नाम एम्फ़ीथियेटरम् फ्लेवियम, वेस्पियन और टाइटस के पारिवारिक नाम फ्लेवियस के कारण है।



अंडाकार कोलोसियम की क्षमता 50,000 दर्शकों की थी, जो उस समय में साधारण बात नहीं थी। इस स्टेडियम में योद्धाओं के बीच मात्र मनोरंजन के लिए खूनी लड़ाईयाँ हुआ करती थीं। योद्धाओं को जानवरों से भी लड़ना पड़ता था। ग्लेडियेटर बाघों से लड़ते थे। अनुमान है कि इस स्टेडियम के ऐसे प्रदर्शनों में लगभग 5 लाख पशुओं और 10 लाख मनुष्य मारे गए।

इसके अतिरिक्त पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटक भी यहाँ खेले जाते थे। साल में दो बार भव्य आयोजन होते थे और रोमनवासी इस खेल को बहुत पसंद करते थे।

पूर्व मध्यकाल में इस इमारत को सार्वजनिक प्रयोग के लिए बंद कर दिया गया। बाद में इसे निवास, कार्यशालाओं, धार्मिक कार्यों, किले और तीर्थ स्थल के रूप में प्रयोग किया जाता रहा। आज इक्कीसवी शती में यह भूकंप और पत्थर चोरी के कारण केवल खंडहर के रूप में ही बची है लेकिन इसके खंडहर को पर्यटकों के लिए सजा सँवारकर रखा गया है।

यूनेस्को द्वारा इसका चयन विश्व विरासत के रूप में किया गया है। यह आज भी शक्तिशाली रोमन साम्राज्य के वैभव का प्रतीक है, पर्यटकों का सबसे लोकप्रिय गंतव्य है और रोमन चर्च से निकट संबंध रखता है क्यों कि आज भी हर गुड फ्राइडे को पोप यहाँ से एक मशाल जलूस निकालते हैं।

दुनिया के सात अजूबे भाग 2 >>

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