इंसानियत की पहचान – कर्मो से या जगहों से?

इंसानियत की पहचान

इंसानियत की पहचान

इन्सान की प्रवृत्ति ऐसी होती है की वह जहाँ रहता है उसे वहां के लोग ज्यादातर नकारात्मक सोच वाले और गैरतमंद नजर आते हैं। ये चीजें धीरे-धीरे लोगों ने अपने मनों में बसा ली हैं। एक गाँव में रहने वाला दूसरे गाँव को अच्छा बताता है, एक शहर में रहने वाला दूसरे शहर को, एक राज्य में रहने वाला दूसरे राज्य और क्रमशः इसी श्रेणी में एक देश में रहने वाला दुसरे देश को उत्तम बताता है।

अच्छा हुआ हमारे वैज्ञानिकों को किसी और ग्रह के प्राणी नहीं मिले नही तो धरतीवासी उन्हें हमसे उत्तम ही बताते। लेकिन सभी ऐसे नहीं होते। जैसे फसल उगाने पर सारी फसल एक जैसी नहीं होती। कुछ अच्छी तरह पक जाती है, कुछ कच्ची रह जाती है और कुछ ख़राब हो जाती है।

इसी तरह समाज रुपी खेत में कुछ असल रुपी इन्सान अच्छी सोच वाले होते हैं जो अपने गाँव, शहर, राज्य और देश का नाम ऊंचा करते हैं। वहीँ कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन्हें हमेशा बदनाम करने पर तुले हैं।  इनमे एक वर्ग ऐसा भी होता है जिन्हें इस तरह कि दुनियादारी से मतलब ही नहीं होता। उन्हें बस अपने परिवार से मतलब होता है।

वैसे तो मैंने इस बारे में  कभी भी ध्यानपूर्वक नहीं सोचा लेकिन कुछ दिन पहले जब मैं किसी काम के सिलसिले में कुछ लोगों के साथ जा रहा था। तो एक सज्जन मेरे पास आकर बैठे। यहाँ पर मैं बताना चाहूँगा कि मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ और वो पंजाब के हैं और ये बातचीत भी पंजाब में ही हुयी है। धीरे-धीरे हम लोगों में बातचीत शुरू हुयी और विषय था इंसानियत।

लेकिन ये बातचीत इंसानियत से शुरू होकर राज्य स्तर पर जा पहुंची। शुरुआत मैंने यह कह कर की थी कि आजकल इंसानियत बहुत कम दिखती है। यहाँ पर मैंने किसी राज्य या किसी वर्ग का नाम नहीं लिया था। वो सज्जन तुरंत बोल पड़े नहीं ऐसा नहीं है इंसानियत आज भी है। मैंने कहा इंसानियत है तभी तो दुनिया चल रही है। फिर मैंने अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र उनके साथ किया।

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एक बार मैं अपने नाना जी के यहाँ से वापस पंजाब आ रहा था। अभी 2-4 स्टेशन ही निकले थे और वेटिंग टिकेट होने के कारण सीट ना मिलने पर मै दरवाजे के पास खड़ा था। तभी एक सिख बुजुर्ग पूरी वेशभूषा में थे (जिनको पंजाब में निहंग कह कर भी संबोधित किया जाता है)। मेरे पास से गुजर रहे थे कि अचानक किसी रूकावट के कारण उनके कदम डगमगा गए। तभी मेरे मुंह से अचानक निकला, ” देख के बाबा जी ।”

मेरे बोलने के लहजे से वो ये जान गए थे कि मुझे पंजाबी आती है। उन्होंने मुझसे पुछा पंजाबी आती है। तो मैंने हाँ में जवाब दे दिया। फिर वह वहां से चले गए। तकरीबन एक घंटे बाद वो फिर आये और उनके हाथ में रोटियाँ थीं। और रोटियों की मात्रा देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे काफी लोग हैं उनके साथ।  जब वो रोटियां बाँट कर वापस आये तो मेरे पास आकर रुक गए।

“आओ बेटा प्रसाद खा लो ।” (पंजाब में जिस खाने को भगवान का भोग लगाया जाए या किसी धार्मिक यात्रा में भोजन खाया जाए तो उसे प्रसाद कहा जाता है।­)
“बाबा जी मेरे पास है रोटियाँ खाने के लिए।”
“फिर क्या हुआ? उन्हें बाद में खा लेना।”
तभी अचानक एक आवाज आई, “अरे चले जाओ इतने प्यार से कह रहे हैं।”

मैं फिर चाह कर भी ना न कर सका। बातों बातों में पता चला कि वो सब अलग-अलग स्थानों पर स्थित गुरुद्वारों कि यात्रा पर थे और अभी-अभी बांग्लादेश में एक गुरूद्वारे के दर्शन करके आये थे। उनके साथ कुछ समय बिताने पर मन को बहुत शांति मिली। मेरे मन में ख्याल आया कि भगवान कितना ध्यान रखते हैं। पेट भरने का प्रबंध अपने आप करवा दिया।

उस समय तक मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं थी कि मैं उन लोगों को किसी राज्य का समझूँ। मैं उन्हें अपनी तरह का एक इंसान ही मान रहा था। और आज भी मैं हर व्यक्ति को उसके धर्म, क्षेत्र या जाति से नहीं देखता। मैं उन्हें बस एक इन्सान कि तरह देखता हूँ। लेकिन अब बात करते हैं उन सज्जन की जिन्होंने मुझे अपनी घटना सुनाई।

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वो अपने परिवार के साथ पंजाब के बाहर किसी स्थान पर घूमने जा रहे थे। उस सफ़र के लिए उन्होंने स्लीपर क्लास कि टिकट बुक करवायीं थीं। स्टेशन पर ट्रेन आई और वो अपने डिब्बे के पास आकार खड़े हो गए लेकिन भीड़ ज्यादा होने के कारण वो अन्दर नहीं जा पा रहे थे। ट्रेन चलने का सिग्नल  हो चुका था और अब उनके दिमाग ने काम किया और वे जल्दी से परिवार सहित ए.सी. डिब्बे में चढ़ गए। ट्रेन चल पड़ी।

वो आकर एक सीट पर बैठ गए। कुछ देर बाद एक टी.टी. आया। जो की हिंदी बोल रहा था जिससे स्पष्ट था कि वह पंजाब का नहीं था। वह सज्जन इस फ़िक्र में पड़ गए कि कहीं वह टी.टी. उनसे जुर्माने के रूप में पैसे कि मांग न करे। लेकिन पूरी घटना सुनने के बाद उसने ऐसा नहीं किया और अगले स्टेशन तक उन्हें वह बैठने कि इजाजत दे दी।

इसके बाद वह सजन कहने लगे कि अगर वह टी.टी. पंजाब का होता तो पक्का जुर्माने के रूप में पैसों कि मांग करता। लेकिन मैं इस पक्ष में नहीं था और ना आज ही हूँ। जिस तरह हाथ कि पांच उँगलियाँ बराबर नहीं होती उसी तरह दुनिया का हर इन्सान एक जैसा नहीं होता। ये हमारी सोच ही है जो कई बार दूसरों को बुरा और भला बना देती है। लेकिन वक़्त कुछ ऐसे सवाल लाकर खड़े कर देता है जिसके बारे में कोई जवाब देना मुश्किल हो जाता है।

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दोस्तों आज कि दुनिया को देखकर आपको क्या लगता है कि इंसानियत किसी हद कि मोहताज है या फिर इसकी कोई हद नहीं होती? क्या इंसानों को उनके धर्म, क्षेत्र और जाति इत्यादि से उनका मूल्याङ्कन करना चाहिए या फिर उनके कर्मों से? इस प्रश्न का उत्तर जरुर दें और यदि आपके साथ भी ऐसी कोई घटना हुयी हो तो हमारे साथ जरुर शेयर करें। धनयवाद।

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Sandeep Kumar Singh

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