ढल चुका है सूरज हो चली है शाम धीरे-धीरे | हिंदी कविता Hindi Poem

पढ़िए कविता -ढल चुका है सूरज हो चली है शाम धीरे-धीरे

ढल चुका है सूरज हो चली है शाम धीरे-धीरे

ढल चुका है सूरज

ढल चुका है सूरज, पंछी हैं घर चले
इक मैं रुका शहर में, अकेला दिन ढले,
कर इंतजार खत्म कि हो चली है
शाम धीरे-धीरे।

खत भी लिखे थे मैंने संदेश भी थे भेजे,
पवन संग बरसने को मेघ भी थे भेजे,
न जाने कब मिलेगा भेजा है जो तूने
पैगाम धीरे-धीरे।

महफ़िलें सजेंगी तो राज सब खुलेंगे,
सच्चाइयों के आईनों को तब हम धुलेंगे,
सुना है हो रहा है आशियाने में तेरे
इंतजाम धीरे-धीरे।

तब दौर वो चलेगा जो न सोचा होगा तुमने,
तब हम बताएंगे कि क्या देखा है जी हमने,
चलती रहेंगी बातें और चलते रहेंगे
जाम धीरे-धीरे।

सुनकर दलीलें मेरी तू मुख न फेर लेना,
जो दिल तेरा करेगा तू फैसला वो देना,
हम भी देखेंगे क्या होता है इस महफ़िल का
अंजाम धीरे-धीरे।

ढल चुका है सूरज, पंछी हैं घर चले
इक मैं रुका शहर में, अकेला दिन ढले,
कर इंतजार खत्म कि हो चली है
शाम धीरे-धीरे।

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Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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