वृक्षारोपण पर कविता :- वृक्ष लगाओ प्रदूषण हटाओ पर एक बेहतरीन रचना

वृक्षारोपण पर कविता प्रेरित करती है अपने आप-पास के बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने के लिए। प्रदूषण कम करने के लिए हमें पर्यावरण तो स्वच्छ बनाना ही होगा। साथ में अपने आस-पास पेड़-पौधे भी लगाने होंगे। जिससे हमें साफ़-सुथरी हवा भी मिलती रहे। तो आइये पढ़ते हैं वृक्षारोपण पर कविता :-

वृक्षारोपण पर कविता

वृक्षारोपण पर कविता

जन जन को जो व्यथित कर रहा,
अंत करो खरदूषण का।
प्रारंभ करो वृक्षारोपण,
अब इतिश्री प्रदूषण का।।

आज हवा जहरीली होकर,
श्वासों में विष घोल रही।
मानवता के प्राण हरण को,
सुरसा सा मुख खोल रही।।
बृक्ष प्रकृति सम्मान सरीखा,
रक्षण कर इस भूषण का।
प्रारंभ करो वृक्षारोपण,
अब इतिश्री प्रदूषण का।।

आज वनस्पति लुप्त हो रही,
खेत सभी हैं सूख रहे।
इंसा देखो अपने हाथों,
अपना जीवन फूंक रहे।।
मनु की सोच कलुषित है अब
अंत हो कैसे दूषण का।
प्रारंभ करो वृक्षारोपण,
अब इतिश्री प्रदूषण का।।

वन उपवन जो रहे सघन तो,
घन घनघोर बरसते हैं।
बिन बरसात मनुज पशु पक्षी,
पानी बिना तरसते हैं
वृक्ष ही हैं प्रकृति के गहना,
रक्षण हो आभूषण का।
प्रारंभ करो वृक्षारोपण,
इतिश्री प्रदूषण का।।

जन जन को जो व्यथित कर रहा,
अंत करो खरदूषण का।
प्रारंभ करो वृक्षारोपण,
अब इतिश्री प्रदूषण का।।


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पंडित संजीव शुक्ल यह कविता हमें भेजी है पं. संजीव शुक्ल “सचिन” जी  ने। आपका जन्म गांधीजी के प्रथम आंदोलन की भूमि बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के मुसहरवा(मंशानगर ग्राम) में 07 जनवरी 1976 को हुआ था | आपके पिता आदरणीय विनोद शुक्ला जी हैं और माता आदरणीया कुसुमलता देवी जी हैं जिन्होंने स्वत: आपको प्रारंभिक शिक्षा प्रदान किए| आपने अपनी शिक्षा एम.ए.(संस्कृत) तक ग्रहण किया है | आप वर्तमान में अपनी जीविकोपार्जन के लिए दिल्ली में एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी में प्रोडक्शन सुपरवाईजर के पद पर कार्यरत हैं| आप पिछले छ: वर्षों से साहित्य सेवा में तल्लीन हैं और अब तक विभिन्न छंदों के साथ-साथ गीत,ग़ज़ल,मुक्तक,घनाक्षरी जैसी कई विधाओं में अपनी भावनाओं को रचनाओं के रूप में उकेर चुके हैं | अब तक आपकी कई रचनाएं भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने के साथ-साथ आपकी  “कुसुमलता साहित्य संग्रह” नामक पुस्तक छप चुकी है |

आप हमेशा से ही समाज की कुरूतियों,बुराईयों,भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कलम चलाते रहे हैं|

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धन्यवाद।

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