सूर्योदय – The Brightness once again | कर्तव्यबोध की कहानी भाग – २

सूचना: दूसरे ब्लॉगर, Youtube चैनल और फेसबुक पेज वाले, कृपया बिना अनुमति हमारी रचनाएँ चोरी ना करे। हम कॉपीराइट क्लेम कर सकते है।
रचना पसंद आये तो हमारे प्रोत्साहन के लिए कमेंट जरुर करें। हमारा प्रयास रहेगा कि हम ऐसी रचनाएँ आपके लिए आगे भी लाते रहें।

ये कहानी है सूर्यवीर की जो किन्हीं हालातों के कारण एक मुश्किल स्थिति में है। आगे क्या होगा उसके लिए ये कहानी पढ़ें।
(यह कहानी “कर्तव्य बोध की कहानी: सूर्योदय ” का दूसरा भाग है। इस कहानी का पहला हिस्सा इस लिंक पर पढ़ें :-कर्तव्यबोध की कहानी: भाग – १ ) आगे जारी-

सूर्योदय (भाग – २)

सूर्योदय

भटके हुए महामंत्री और सूर्यवीर अब एक नदी की तलाश करने लगे। क्योंकि सूर्यवीर ने गुरुकुल में शिक्षा प्राप्ति के समय ये पढ़ा था कि अगर कभी जंगल में फंस जाएं तो नदी के किनारे चलते हुए वहां से बाहर आया जा सकता है। इस तरह दोनों चलते-चलते सुबह सूर्योदय से पहले महल में पहुँच गए।

दरबार लगने का समय हो गया। कुछ दिनों से महाराज के दरबार में न आने से कई अहम फैसले रुके हुए थे। अभी सब इंतजार ही कर रहे थे की युवराज के आने का संदेश आ गया। युवराज को आता देख महामंत्री एक पल को थोड़े घबरा से गए। उनके मन में कई सवाल आने लगे कहीं युवराज कुछ ऐसा ना बोल दें जिस से राज्य को किसी प्रकार की हानि हो।

“हम जानते हैं की आप सब लोग महाराज के दरबार में आने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन महाराज का स्वास्थ्य सही न होने के कारण वो कुछ दिनों तक किसी से मिल नहीं सकते। तब तक राज्य का सारा कमकाज हम देखेंगे।“ दरबारियों के सामने सूर्यवीर ने किसी तरह बात को संभाल लिया। लेकिन महामंत्री के मुख पर अभी भी चिंता के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। युवराज इस चिंता का कारण न समझ सके।

किसी तरह दिन समाप्ति की ओर पहुंचा। सूर्यवीर सारा काम समाप्त कर महल में गया। वहां उसने महामंत्री को बुलाया और कहा,
“महामंत्री जी, आज हम उत्तर दिशा की ओर जाएंगे….”
“लेकिन युवराज आज आपने इतना कार्य किया है। आपको विश्राम की आवश्यकता है, नहीं तो आपका स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है।“
महामंत्री ने सूर्यवीर को रोकते हुए कहा। तो सूर्यवीर में जवाब दिया,
“महामंत्री जी, अगर सूर्य थक गया तो सारा संसार अंधकारमय हो जाएगा। और ऐसा आज तक कभी हुआ नहीं है। इसलिए आप व्यर्थ चिंता का त्याग कीजिये और हमारे साथ चलिए।”

महामंत्री को एक बदले हुए युवराज दिख रहे थे। वो चुपचाप युवराज के साथ चल दिए। अगले कुछ दिन तक यही सब चलता रहा। राज्य में इस बात की अफवाह उड़ने लगी कहीं युवराज ने ही तो महाराज को कुछ कर तो नहीं दिया। युवराज को इस बात की जानकारी मिली। लेकिन वो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था।

एक रात जब युवराज और महामंत्री जंगल में विश्राम कर रहे थे। तभी युवराज की आँख लग गयी। अचानक युवराज की आँख खुली और उसने ने देखा कि महामंत्री किसी से बात कर रहे हैं।
“महामंत्री जी कौन है वहाँ?”
जैसे ही युवराज ने ये सवाल पूछा वो नकाबपोश जो महामंत्री से बात कर रहा था वहां से भागने लगा। ये देख युवराज ने उसका पीछा किया और चेतावनी देने पर भी न रुकने पर तलवार से वार कर दिया। तलवार के वार के कारण उस नकाबपोश के कंधे पर घाव हो गया। लेकिन फिर भी वह भागने में कामयाब हो गया।

“कौन था वो महामंत्री जी?” सूर्यवीर ने पूछा।
“वो…वो…पता नहीं युवराज। यही तो हम भी उस से पूछ ही रहे थे की तुम आ गए।“ महामंत्री ने सकुचाते हुए जवाब दिया।
इस जवाब से सूर्यवीर संतुष्ट तो नहीं हुआ लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं उसके मन में कोई सवाल उठ रहा था, जैसे कोई सच झूठ की ओट में खड़ा हो। फिर भी बिना कुछ बोले वो दोनों महल को चल दिए।

वापस आने के बाद सूर्यवीर महामंत्री पर नजर रखने लगा। उसे ऐसा लगता रहता था जैसे उस से कुछ छुपाया जा रहा था। और उस दिन के बाद महामंत्री जब साथ जाते भी तो उनका ध्यान कहीं और ही लगा रहता। एक शाम महामंत्री राघवेंद्र सूर्यवीर के पास आये,
“युवराज चलिए समय हो गया है।“
“महामंत्री जी अब हम युवराज नहीं महाराज हैं।“
“आप क्या कहना चाहते हैं युवराज?”
“महामंत्री जी इतने दिनों तक हमने हर स्थान पर महाराज की खोज की लेकिन कोई खोजखबर नहीं मिली। और जनता से भी हम यह बात कब तक छिपाएंगे।“




“हमें एक दिन और प्रयास कर लेना चाहिए युवराज…”
“नहीं महामंत्री जी ये हमारा आदेश है। हम अब नहीं जाएंगे। आप भी जाइये और विश्राम कीजिये। बहुत दिनों से विश्राम नहीं मिला आपको।“
महामंत्री को टोकते हुए सूर्यवीर ने कहा। युवराज के व्यवहार को देख राघवेंद्र ने कुछ बोलना उचित न समझा और अपने कक्ष की ओर चला गया।

जंगल में आधी रात थी। चारों ओर सन्नाटा था। सियारों आवाजें आ रही थीं। पूर्णिमा होने के कारण चाँद की चांदनी पूरे जंगल में अपनी रौशनी बिखेर रही थी।
“हमने जैसा सोचा था सब कुछ वैसा ही चल रहा था। लेकिन अब लगता है हमारी योजना असफल हो जाएगी। हमें जल्दी ही कुछ करना पड़ेगा।“
महामंत्री जंगल में उसी नकाबपोश से बातें कर रहे थे जिसने सूर्यवीर पर हमला किया था। अभी इतनी बात हुयी थी कि चारों ओर से सैनिक निकल आये। महामंत्री और नकाबपोश दोनों पकडे गए। तभी सूर्यवीर वहां आया।

“महामंत्री जी, तो ये है आपका असली रूप। हमें तो आप पर तभी शंका हो गयी थी जब आपने उस दिन इस नकाबपोश की भागने में मदद की। वर्ना ये ईतनी आसानी से हमारी आँख में धुल ना झोंक पाता।“
“युवराज……….”
“चुप रहिये महामंत्री हमने आप को अपना सबसे भरोसेमंद समझा और आपने उसके बदले हमें ये दिया। शर्म आती है हमें आपको महामंत्री कहते हुए। बताइये…… बताइये हमारे पिताजी कहाँ हैं? बताइये….”

महामंत्री ने उस नकाबपोश की ओर देखा। युवराज ने आगे बढ़ कर जैसे ही उस नकाबपोश के चेहरे से नकाब हटाने की कोशिश की उसी वक्त उस नकाबपोश ने सूर्यवीर की कमर में लटकी हुयी तलवार निकली और उसे घुमा कर लगा दी सूर्यवीर की गर्दन पर।
“महराज संभल के…………”

अचानक ही महामंत्री चिल्लाये। सूर्यवीर ने हैरानी से महामंत्री की तरफ देखा और उसकी समझ में कुछ नहीं आया। तभी सूर्यवीर के पीछे खड़े उस नकाबपोश ने अपना नकाब हटाया और सब सैनिकों ने अपने हथियार नीचे रख दिए।
“हथियार उठाओ सैनिकों, तुमने कब से हार माननी सीख ली……..”
सब सूर्यवीर की ओर रहे थे की अचानक उसने मौके का फ़ायदा उठा कर नकाबपोश से तलवार लेकर उसके सीने पर तान दी। और उसकी तरफ देखते ही हाथ से तलवार छूट गयी।



“पिता जी………. आप ? ये सब क्या है? आपने ये क्या रूप बना रखा है ?”
“पुत्र संयम रखो हम तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर देंगे। ये सब हमारी और महामंत्री की योजना थी।“
“लेकिन क्यों पिता जी?”
“क्योंकि तुम भोग विलास के उस अंधकार में डूब रहे थे। जहाँ से वापस आना असंभव था। इसलिए हमने तुम्हारे भीतर के सूर्य को जगाने के लिए तुम्हें अपने वियोग की एक चिंगारी लगा कर छोड़ दिया। और उसी की तेज रौशनी आज मुझे तुम में दिख रही है।“
“मुझे माफ़ कर दीजिये पिता जी, मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। अब कृपया अपने राज्य को दुबारा वापस आ के संभाले। आपकी जनता आप की प्रतीक्षा कर रही है।“

“पुत्र मुझे लगता है अब तुम इस लायक हो गए हो की तुम्हें राज्यभार सौंप दिया जाए।“
“नहीं पिता जी आपके होते हुए मैं उस सिंहासन पर नहीं बैठूंगा।“
तभी महामंत्री मजाक के अंदाज में बोले,
“महाराज और युवराज क्षमा कीजियेगा। अगर आपकी बातचीत लंबी चलने वाली है तो हम यहीं सो जाएं?”
हा…..हा…..हा…..हा….हा….
जंगल के सन्नाटे में चारों तरफ हँसी की आवाज गूँज उठी। सारे सैनिक, महाराज, सूर्यवीर महामंत्री वापस राज्य की ओर चले गए।

उस दिन महाराज ने सूर्यवीर को अपने राज्य का नया राजा घोषित किया। सूर्यवीर ने अपने पिता के सम्मान को बनाये रखा और एक अनुशासित राजा की तरह राज्य किया। सारी जनता अपने नए राजा से बहुत प्रसन्न रहने लगी।

इस तरह आपने पढ़ा कैसे एक बिगड़ते हुए इंसान को उसके किसी अपने ने ही उसकी कमजोरी को पहचान कर उसे दूर करने की कोशिश की। वहीं सूर्यवीर ने अचानक पड़ी जिम्मेवारी को अपने पिता के नाम के लिए अच्छी तरह से निभाया। सबने सकारात्मक सोच अपनाई जिस कारन ऐसा संभव हुआ।

हमारी जिंदगी में भी कई ऐसे पल आते हैं जब हम अपने आपको सर्वश्रेष्ठ मानते हुए आलसी हो जाते हैं कि हम कोई भी काम कर सकते हैं। लेकिन उस समय हम एक साधारण जीवन जीते हैं। लेकिन हमें ऐसी जिंदगी जीने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें हम कुछ ऐसा करें जिस से अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर सकें। घर के बड़े बुजुर्ग अगर हमें कोई सलाह देते हैं तो उसे ध्यान से सुनना चाहिए। तभी हम जिंदगी में खुद को ऊंचाइयों पर पहुंचा पाएंगे।

पढ़िए एक सफल जीवन जीने से जुड़ी प्रेरक रचनाएँ :-


इस कर्तव्य बोध की कहानी के प्रति अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर दें।
धन्यवाद। 

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on telegram
Telegram
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on email
Email

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *