होली पर निबंध – रंगों का त्यौहार, इतिहास और जानकारी | Holi Essay In Hindi

होली पर निबंध में पढ़िए होली का इतिहास , कैसे शुरू हुआ होली में रंगों का उपयोग , अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाई जाती है होली का निबंध में :-

होली पर निबंध

रंगों के त्यौहार होली पर निबंध – परिचय एक नज़र में।

होली एक ऐसा त्यौहार है जो सबको रंग-बिरंगा कर देता है और सब एक सामान हो जाते हैं। प्यार मोहब्बत को बढ़ाने और बुराई के अंत का यह त्यौहार बहुत ही रंगीला होता है। भारत में यह त्यौहार मुख्यतः हिन्दू धर्म के लोग मानते हैं। लेकिन भारत विविधताओं का देश है, यहाँ हर धर्म के व्यक्ति सारे त्यौहार मिल जुल कर मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी अपनी सारी कटुता भुला कर फिर से मित्रता कर लेते हैं। एक दूसरे के चेहरे पर रंग, गुलाल और अबीर लगाते हैं।

रंग-बिरंगी ये त्यौहार भारत के साथ साथ दुनिया भर के लोगो को आकर्षित करता है। लेकिन क्या आपको पता है, कब और क्यों मनाई जाती है होली ? क्या है इसका इतिहास और क्यों इस त्यौहार में रंगों का इस्तेमाल होता है? चलिए नही पता तो कोई बात नही, इसी सदर्भ में हमने होली से सम्बंधित जितनी जानकारी संभव हो सका आपके सामने पेश कर रहे है, होली पर निबंध ‘ नाम से इस लेख में।

होली पर निबंध

होली कब मनाई जाती है?

आगे बढ़ने से पहले चलिए ये जान ले की ये रंगों का त्यौहार होली कब मनाया जाता है। होली भारत में बहुत उत्साह से मनाया जाने वाला वसंत ऋतु का त्यौहार है। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। अंग्रेजी महीनों के हिसाब से होलिका दहन का समय २०१९ ( 2019 ) में 20 मार्च को है व 21 मार्च को होली है।



होली क्यों मनाई जाती है? होली के इतिहास के बारे में जानकारी

१. होलिका दहन की कहानी

भारतीय संस्कृति में होलिका दहन की कहानी का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है। प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक राक्षस रहता था। वह बहुत ही पापी था। उसकी यह इच्छा थी कि सभी लोग उसे भगवान् की जगह पूजें। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। राक्षस हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने ही उसे भगवान मानने से इंकार कर दिया। भक्त प्रह्लाद इश्वर के नाम ही लेता था।

यह बात उस राक्षस को बिलकुल भी अच्छी न लगी। उसे लगा अगर उसका अपना पुत्र ही उसे प्रभु मानने से इंकार कर रहा है तो बाकी लोग क्या सोचेंगे। हिरण्यकशिपु की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। होलिका ने अपने तपोबल से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसे आग न जला सके। उसने प्रह्लाद को मरने के लिए अपने भाई को यह सुझाव दिया की प्रह्लाद को उसकी गोद में बिठा कर आग में जला दिया जाए। जिसमें वह वरदान के कारन बच जाएगी और प्रहलाद का अंत हो जायेगा।

अब होलिका और प्रह्लाद को एक साथ बिठा कर जलाया गया तो प्रह्लाद इश्वर का नाम लेता रहा और बच गया। वहीं होलिका अपने वरदान का अनुचित उपयोग करने के कारन जल कर मर गयी। उस दिन से ये होली का त्यौहार अस्तित्व में आया। होलिका दहन का प्रचलन आज भी है और होली से एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म निभाई आती है। और होलिका दहन के बाद एक दूसरे के चेहरे पर रंग लगाया जाता है।

२. पौराणिक कथाएँ

होलिका दहन के इलावा और भी कई पौराणिक कथाएं हैं। जिसमें राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था।



३. ऐतिहासिक कहानियाँ

पौराणिक कथाओं में तो होली का वर्णन मिलता ही है। इसके साथ ही इतिहास में भी कई ऐसे शासक हुए हैं जो होली खेला करते थे। इसके प्रमाण मिलते हैं मुग़ल काल के इतिहास में। ऐसी कई तस्वीरें हैं जो इस बात की गवाही देती हैं कि होली सिर्फ हिन्दू ही नहीं अपितु मुसलामानों में भी उतनी ही प्रचलित रही है। अकबर-जोधाबाई से लेकर जहाँगीर-नूरजहाँ तक होली के शौक़ीन थे। ऐसा वर्णन मुग़ल इतिहास में मिलता है।

जहाँगीर के होली खेलने के प्रमाण अलवर संग्रहालय में चित्रों के रूप में आज भी हैं।  इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के समय में तो उनके मंत्री होली के दिन उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।

कैसे इस त्यौहार का नाम होली पड़ा?

होली के पर्व की शुरुआत ऐसी न थी जैसा इसका आज का स्वरुप है। प्राचीन काल में जब परिवार  की सुख समृद्धि के लिए विवाहित औरतें पूर्ण चन्द्र की पूजा करती थीं।  वैदिक काल में इसे नवात्रैष्टि यज्ञ के नाम से जाना जाता था। उस यज्ञ में खेत के अधपके अन्न को दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था।  उस समय अन्न को होला भी कहते थे। इसी कारन इस उत्सव का नाम होलिकोत्सव रखा गया।

भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।

होली पर निबंध में जानिए होली में रंगों का उपयोग कैसे शुरू हुआ?

होली के रंग

कहते हैं पूतना ने श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया। लेकिन श्री कृष्ण ने पूतना का ही वध कर दिया। पूतना वध के उपलक्ष्य में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की। इसके बाद सबने एक दूसरे के साथ रंग खेला। रंग खेलने कि शुरुआत श्री कृष्ण जी ने ही की थी।



कैसे मनाया जाता है होली का त्यौहार?

kaise manaya jata hai holi tyohar

होली दो दिनों का त्यौहार होता है, जिसमे प्रथम दिवस को सिर्फ होलिका दहन किया जाता है, जिसमे लकड़ियों और दुसरे जलाऊ चीजो का कुंड बना के जलाया जाता है। और साथ में नगाढे बजाये जाते है। अगले दिन रंग खेलने का दिन होता है  जिसे धुरेडी भी कहते है

होली के दिन सब सुबह से ही रंग खेलना शुरू कर देते हैं। एक दूसरे के चेहरे पर गुलाल, अबीर और रंग लगाये जाते हैं। चारों और हर्षोल्लास का माहौल ही नजर आता है। बच्चे पिचकारियों में रंग भर-भर कर एक दूसरे पर डालते हैं। यह कार्यक्रम दोपहर तक चलता है। उसके बाद सब नहा-धोकर विश्राम करते हैं। शाम के समय में सब लोग अपने जान-पहचान के लोगों से मिलने जाते हैं। आपस में मिठाइयाँ बांटते हैं। कहते हैं होली प्यार-मोहब्बत का त्यौहार है। इस दिन दुश्मन भी दुश्मनी भुला कर गले मिलते हैं।

होली के विशेष पकवान

holi ke pakwan

वैसे तो होली का मुख्या पकवान गुझिया होता है। लेकिन इसके साथ और भी कई मीठे पकवान बनते हैं जिनमें मालपुआ, ठंडाई, खीर, कांजी वड़ा , पूरन पोली, दही बड़ा, समोसे, दाल भरी कचौडियां आदि बनाया जाता है। सारा दिन यही पकवान ही खाए जाते हैं और आने वाले मेहमानों का स्वागत भी इन्ही पकवानों से किया जाता है।

होली पर निबंध आगे पढ़ने के लिए :- यहाँ क्लिक करें होली पर निबंध – 2 

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