पुरुष पर कविता :- बस वही पुरुष कहलाता है | पुरुष का अर्थ

समाज में अक्सर महिलाओं के ही गुणगान गाये जाते हैं। जबकि पुरुष समाज का एक ऐसा अंग बन जाते हैं जिनकी सराहना बहुत कम ही की जाती है। पुरुष जो अपना सारा जीवन अपने परिवार के न्योछावर कर देता है। आइये उसी पुरुष की महिमा बताती हुयी कविता पढ़ते हैं, ‘ पुरुष पर कविता ‘-

पुरुष पर कविता

पुरुष पर कविता

घर में सुख वर्षा करने को
परेशानियां स्वयं उठाता
दुनिया की इस भीड़ में भी
खुद की एक पहचान बनाता,
हो तपता मन या भीगा तन
चाहे अंग अंग भरी ठिठुरन
घर परिवार संभाले अपना
किंचित भी नहीं घबराता है,
बस वही पुरुष कहलाता है।

घर के दायित्वों के साथ
जो वाह्य कर्तव्य निभाता है
नित कर्म में रहकर लीन सदा
दर दर की ठोकरें खाता है,
खुद को थामे रखता है वह
कितना भी आहत हो मन
अपनो को ना दुख हो कोई
चट्टान सा जो डट जाता है,
बस वही पुरुष कहलाता है।

जिम्मेदारी का भान जिसे
रिश्तेदारी का मान जिसे
दबा अपनी ख्वाहिशें को
औरों खातिर मुस्काता है,
दिल अपना चाहे टूटा हो
मोती आंखो के छुपाता है
हृदय वेदना पी जाता और
पत्थर दिल कहलाता है,
बस वही पुरुष कहलाता है।

दूजे के घर की बेटी को
निज घर सम्मान दिलाता है
गृह लक्ष्मी बनाकर उसको
अपनी गृहस्थी बसाता है,
पूरी दुनिया से लड़ जाए
पर नारी सम्मान बचाता है
माता-पिता,पत्नी,बच्चों में
सामंजस्य जो बिठाता है,
बस वही पुरुष कहलाता है।

देश की रक्षा खातिर वह
सीमा का प्रहरी बन जाए
बन जाता प्यारा बेटा जब
करती माँ आंचल छाँव भरी,
कर के ऊँचा नाम जगत में
माँ-बाप का गर्व बन जाता है
वंश बेल हरी रखता और
जो घर आंगन महकाता है,
बस वही पुरुष कहलाता है।

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शिक्षक पर कवितामेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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