मैं चन्द्रशेखर आजाद हूँ – चंद्रशेखर आज़ाद की एक अनकही कहानी

आप पढ़ रहे है कहानी – मैं चन्द्रशेखर आजाद हूँ – एक अनकही कहानी | Mai ChandraShekhar Azad Hoon

मैं चन्द्रशेखर आजाद हूँ – एक अनकही कहानी

मैं चन्द्रशेखर आजाद हूँ

बुंदेलखंड के निकट बहने वाली सातार नदी के तट पर एक कुटिया थी। उस कुटिया में एक व्यक्ति रहता था। वस्त्र के नाम पर उसके बदन पर बस एक लंगोट होता था। उसने कई मंत्र याद कर रखे थे और आस-पास के गाँवों में जब भी कोई उत्सव होता था तो लोग उसे पूजा-पाठ के लिए बुलाते थे। अकेले रहने के कारण लोग उसे ब्रह्मचारी बुलाया करते थे। आस-पास बहुत घना जंगल था। जहाँ हर समय पक्षियों के चहचहाने कि आवाजे आया करती थीं।

एक दिन जब वह ब्रह्मचारी ध्यानमग्न बैठा था। तभी एक व्यक्ति वहां आया और बोला,
” महात्मा यहाँ एक जंगली सुअर आया है। उसे मारना है।। अतः तुम हमारे साथ चलो।”
पूछने पर पता चला कि वह व्यक्ति जंगल का एक बड़ा अधिकारी था। इसके बाद ब्रह्मचारी ने कहा,
“साहब मुझे जानवरों से बहुत डर लगता है। मै आपके साथ नहीं जाऊँगा।”
“कैसे ब्रह्मचारी हो तुम? तुम्हें कैसा डर, ये लो बन्दूक और जब भी सुअर तुम्हारे सामने आये उसे…..”
“ब….ब…..बन्दूक कैसे चलाऊंगा मैं ?मुझे बन्दूक पकड़ने तक नहीं आती।”

इतना सुन अधिकारी ने ब्रह्मचारी को हौसला देते हुए कहा,
“कोई बात नहीं यदि बन्दूक चलानी नहीं आती तो इसे लाठी कि तरह इस्तेमाल करना और जब वह जंगली सुअर तुम्हारे सामने आये तो उसके सर पर मार देना।”
ब्रह्मचारी इस से पहले कुछ कह पाता अधिकारी उसे जबरदस्ती जंगल में ले गया और उसके हाथ में बन्दूक थमा दी।

जंगल में जाने के थोड़ी देर बाद उन्हें झाड़ियों के पीछे वो जंगली सुअर दिखाई दिया। अधिकारी ने निशाना साधा और धांय से एक गोली चला दी। सुअर बहुत तेज था इसलिए गोली से बच गया। उसे दूसरी गोली चलाने का मौका नहीं मिला। अधिकारी सोच में पड़ गया कि अब क्या किया जाये? तभी अचानक एक गोली चली।

जंगल के अधिकारी ने आगे बढ़ कर देखा तो सुअर चित्त होकर गिर पडा था। अभी वह छटपटा ही रहा था कि वहां वह ब्रह्मचारी वापस आ गया। गोली ठीक उस जगह लगी थी जहाँ लगनी चाहिए थी। अधिकारी ब्रह्मचारी कि तरफ देखने लगा।
“म..म…मैंने कुछ नहीं किया। वो सुअर मेरी तरफ आ रहा था। मुझे कुछ सूझा नहीं। हाथ-पैर कांपने लगे और पता नहीं कब बन्दूक चल गयी।”

अधिकारी को सफाई देते हुए ब्रह्मचारी घबरायी हुयी आवाज में बोला। अधिकारी ने उसकी बात अनसुनी कर दी और बोला,
“मुझे बेवक़ूफ़ बनाने कि कोशिश मत करो। मैंने भी जिंदगी में बहुत अनुभव किये हैं। तुम कोई साधारण ब्रह्मचारी नहीं हो। तुम एक कुशल निशानेबाज हो। बताओ तुम कौन हो?”
“राम-राम साहब, मैं आपसे झूठ क्यूँ बोलूँगा भला? देखिये अभी तक मेरे सीने में दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है। बन्दूक तो बस घबराहट में चल गयी थी। ऊपर वाले का हाथ था जो आज जान बच गयी।”

लेकिन अधिकारी ने यह मानने से इंकार कर दिया। ब्रह्मचारी उसे अपनी कुटिया में ले गया। काफी देर बहस करने के बाद ब्रह्मचारी ने जंगल अधिकारी को किसी को सच्चाई न बताने कि कसम खिलते हुए बताया कि,

” मैं चन्द्रशेखर आजाद हूँ । “


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Sandeep Kumar Singh

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ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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2 Responses

  1. जमशेद आज़मी कहते हैं:

    शहीद चन्‍द्रशेखर आज़ाद पर बहुत ही अच्‍छा लेख। मुझे बहुत पसंद आया। आपकी जानकारी मैं बताना चाहता हूं, चन्‍द्रशेखर आजाद की मुखबिरी करने वाला गददार मेरे ही शहर का रहने वाला था। शर्मनाक बात यह कि बाद में उसे स्‍वतंत्रासेनानी का दर्जा भी दे दिया गया।

    • Mr. Genius Mr. Genius कहते हैं:

      जमशेद आज़मी जी आपके शहर से तिवारी रहा होगा। लेकिन मैंने सुना है कि वो नेहरू जी से भी भगत सिंह को छुड़वाने की बात करने के लिए उसी वक़्त मिल कर आये थे। इसलिए मैं अपना कोई निर्णय नहीं दे सकता। जानकारी देने के लिए धन्यवाद।

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