विश्वास की परीक्षा :- आस्था और विश्वास का ज्ञान देती हुयी कहानी

जब विश्वास की परीक्षा होती है तो उसमें ऐसी चीजों का सामना करना पड़ता है जिसके बारे में हमने सोचा भी नहीं होता। आपमें से कई लोग दूसरों को मुसीबत में अक्सर दिलासा देते हैं। लेकिन क्या होता है जब वही स्थिति अपने ऊपर पड़ती है? आइये पढ़ते हैं कहानी ‘ विश्वास की परीक्षा ‘ में :-

विश्वास की परीक्षा

विश्वास की परीक्षा

“अरे भाई जल्दी करो मुझे बैंक जाना है।”

कहते हुए राजेश घर के दरवाजे से बहार बरामदे में निकला और बरामदे में ही कड़ी बाइक की तरफ बढ़ गया।

राजेश अपने गाँव में एक समृद्ध किसान था। गाँव भर में उसकी फसल ही सबसे अच्छी होती थी। भगवन शिव के वो परमभक्त थे। किसी को कोई तकलीफ होती तो हर समय बस एक ही रट लगाये रहते थे,” भगवन शिव पर विश्वास रखो सब ठीक होगा।”

राजेश की ये बात सुन-सुन कर एक दिन शायद भगवन शंकर ने भी सोचा कि क्यों न इसके भी विश्वास की परीक्षा ले ही ली जाए। इसे मुझ पर सच्चा विश्वास भी है या बस अपने मतलब के लिए ही मेरा नाम जपता रहता है और आगे बढ़ी ये कहानी।

हर बार की तरह इस बार भी राजेश की फसल बहुत अच्छी हुयी और अनाज बेचने के बाद जो पैसे मिले थे उन्हें आज बैंक में जमा करवाने के लिए रहा था।

“ये लीजिये पैसे।”

राजेश की पत्नी हिमानी ने राजेश को रुपयों से भरा हुआ बैग पकड़ाया।

“अपना ख्याल रखना।”

इतना कहते हुए राजेश ने बाइक की किक मारी और चल पड़ा बैंक की तरफ। बैंक पहुँचते ही जैसे उसने अपना बैग पकड़ना चाहा वैसे ही उसके पैरों तले की जमीन खिसक गयी। वो यकीन नहीं कर पा रहा था की रुपयों भरा बैग उसके पास था ही नहीं।

वह तीन-चार बार उस रास्ते पर गया जहाँ से वो आया था। लेकिन उसे उसका बैग नहीं मिला। रस्ते में किस से नहीं पूछा उसने उस बैग के बारे में। अब वो पूरी तरह टूट चुका। कुछ समझ न आते देख वो घर वापस चल पड़ा।

घर पहुँचते ही वो बरामदे में पड़ी चारपाई पर सिर पकड़ कर बैठ गया। तभी हिमानी उसके पास आई और उसके चेहरे के उड़े हुए भाव देख कर बोली,

“सब ठीक तो है ना?”

कोई जवाब न मिलने पर हिमानी के मन में असमंजस और सवालों का एक तूफ़ान उठने लगा। “सब ठीक तो हैं? पैसे जमा हो गए न बैंक में?”

राजेश कुछ न बोला। सीधा उठा कर कमरे में चला गया। हिमानी अब डर भी गयी थी।

“राजेश….राजेश……” चिल्लाते हुए हिमानी राजेश के पीछे-पीछे चली जा रही थी।

– बस…मिल गयी शांति?

कमरे में सामने की दीवार पर लगे हुए भगवान् शिव के चित्र के आगे खड़े होकर राजेश ऐसे बोलने लगा। जैसे मानो भगवान् शिव शाक्षात उसके सामने खड़े हों।

“क्या मिला तुम्हें? मेरी मेहनत की कमाई मुझसे छीन कर?”

हिमानी को अब बात समझ आ गयी थी। परन्तु वो अभी भी जानना चाहती थी की ये सब हुआ कैसे।

“जवाब दो मुझे….जवाब दो?”

इतना कह कर राजेश वहीं बैठ गया। हिमानी ने राजेश से इस समय कुछ और पूछना ठीक नहीं समझा। उसने अपने बेटे को फोन लगाया।

अचानक ही हिमानी के हाथों से फ़ोन नीचे गिर गया और वो राजेश के पास बैठ कर बस रोने लगी।

“रोहित……रोहित का….रोहित का एक्सीडेंट हो गया है।”

अब तो जैसे दोनों पर मुसीबतों का ऐसा पहाड़ टूट पड़ा था जिससे उनके सारे जज़्बात बिखर चुके थे।

इधर शहर में शाम ढल रही थी। उधर राजेश और हिमानी की जिंदगी में अमावास का अँधेरा छा रहा था। दोनों किसी तरह हिम्मत बांधे हुए शहर के अस्पताल में पहुंचे।

“कहाँ है मेरा बेटा?”

अस्पताल में जाते ही राजेश ने रिसेप्शन पर बैठी हुयी नर्स से पूछा। नर्स ने थोड़ी पूछताछ के बाद कमरे की तरफ इशारा किया। दोनों भागते हुए उस कमरे की तरफ पहुंचे। देखा तो वहां पुलिस भी थी। रोहित के सर से काफी खून बह रहा था। ये देख राजेश बोला,

“क्या हुआ मेरे बेटे को? डॉक्टर साहब ये ठीक तो हो जायेगा ना?”

“इंस्पेक्टर साहब ये कैसे हुआ? किसने किया? मेरा बेटा…..मेरा बेटा, बोलता क्यों नहीं?”

राजेश और हिमानी दोनों आंसुओं में भीगे हुए ये जान ने की कोशिश ही कर रहे थे कि उनके बेटे के साथ क्या हुआ है। तभी उनकी नजर पुलिस के हाथ में पकडे हुए बैग की तरफ गयी।

“ये तो मेरा बैग है। इंस्पेक्टर साहब ये मेरा बैग है….कहाँ मिला ये आपको?”

“आपका बैग है? क्या सबूत है कि ये आपका बैग है। ये बैग तो उस गरीब को मिला था। जो तुम्हारे बेटे को यहाँ लेकर आया है।”

“साहब इसमें शंकर भगवान् की फोटो है। दस लाख रुपये हैं इसमें। मैं बैंक जमा करवाने जा रहा था और रास्ते में न जाने कहाँ गिर गए साहब….आप चाहें तो गिन सकते हैं। पूरे दस लाख हैं इसमें।”

सबके सामने बैग खोला गया। पैसे गिने गए और शंकर भगवान् की फोटो भी निकली। तब तक डॉक्टर ने रोहित के सिर पर पट्टी बाँध दी थी।

“अच्छा हुआ जो समय रहते ये आदमी इसे यहाँ ले आया। अगर खून ज्यादा बह जाता तो इसे बचाना मुश्किल हो जाता।”

डॉक्टर ने पट्टी बाँधने के बाद राजेश से कहा। पैसे गिने जाने के बाद जब पुलिस को विश्वास हो गया तो बैग राजेश के सुपुर्द कर दिया गया।

– डॉक्टर साहब इसे होश कब तक आएगा?

– कल सुबह तक ये होश में आ जायेगा।

इन सब में राजेश उस आदमी का शुक्रिया करना तो भूल ही गया था जिसकी वजह से उसे अपना बैग और अपना बेटा वापस मिला था।

“इंस्पेक्टर साहब वो आदमी कहाँ है जिसे ये बैग मिला था। मई उस से मिलना चाहता हूँ।”

इंस्पेक्टर ने कांस्टेबल को इशारा किया और वो उस आदमी को बुला लाया।

– धन्यवाद भाई। तुम नहीं जानते तुमने कितना बड़ा अहसान किया है हम पर। तुम चाहो तो इसमें से कुछ पैसे अपने पास रख सकते हो।

– साहब गरीब का ईमान ही उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है। पैसों का क्या है आज इधर कल उधर।

– बहुत अच्छे विचार हैं आपके। आपका नाम क्या है?

– शंकर….

इसके बाद कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा पसर गया।

राजेश को एक बार फिर लग रहा था जैसे साक्षात भगवान् शंकर उसके सामने खड़े थे और कह रहे थे कि बस इतना ही भरोसा है अपने भगवान् पर……


हमारे समाज की भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। हम दूसरों को तो सलाह या दिलासा तो देते हैं लेकिन जब खुद पर ऐसी कोई स्थिति आती है तो हम खुद ही हौसला हार जाते हैं। जबकि हमें हालातों को स्वीकार कर उनका सामना करना चाहिए। तभी हम भी भगवान् द्वारा ली गयी विश्वास की परीक्षा में खरे उतर सकेंगे और हमारे मन में घमंड कभी नहीं आयेगा।

‘ विश्वास की परीक्षा ‘ कहानी के बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

धन्यवाद।

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Sandeep Kumar Singh

Sandeep Kumar Singh

ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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