हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति की कमियाँ बनाम फ़िनलैंड की शिक्षा पद्धति

शिक्षा हमारे जीवन के लिए कितना आवश्यक है ये तो हम सब जानते है। लेकिन क्या आपको पता है पढ़ाई-लिखाई का तरीका सही होना उससे भी ज्यादा आवश्यक है। दुनिया में जितने भी देश है उनका अपना एक एजुकेशन सिस्टम होता है जिसे हिंदी में हम शिक्षा पद्धति कहते है। यही एजुकेशन सिस्टम शिक्षा के गुणवत्ता को निर्धारित करता है। दुनिया में बहुत से ऐसे देश है जिनके शिक्षा व्यवस्था बहुत ही गुणवत्ता पूर्ण है। उनमें से एक देश है फ़िनलैंड।


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इंडिया VS फ़िनलैंड शिक्षा व्यवस्था | Indian Education System vs Finland Education System in Hindi

फ़िनलैंड का एजुकेशन सिस्टम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। दूसरी ओर हमारा देश भारत है। जो फ़िनलैंड के शिक्षा व्यवस्था के सामने कहीं नही टिकता। लेकिन आखिर ऐसा क्यों है? भारत देश जिसे हम विश्व गुरु कहते है। जो सबसे प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। भगवद् गीता जैसे अध्यात्मिक ग्रन्थ के साथ-साथ ना जाने कितने ही ज्ञान के भंडार हमारे देश में भरे हुए है। इसके बावजूद एक छोटा सा देश जो हमारे सामने ना तो आकार में टिक सकता है ना जनसँख्या में। फिर शिक्षा व्यवस्था के मामले में हम उनके सामने पानी भी नही भर सकते। आखिर ऐसा क्यों?? इन्ही सब बातों पर एक तुलनात्मक चर्चा हम इस लेख में करेंगे।

हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति बनाम फ़िनलैंड की शिक्षा पद्धति

हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति बनाम फ़िनलैंड की शिक्षा पद्धति

१. शिक्षा व्यवस्था की शुरुवात :

शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में भारत का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। प्राचीन भारत में गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था प्रचलित था। और चाणक्य के समय में नालंदा के तक्षशिला विश्वविध्यालय के बारे में कौन नही जानता। लेकिन हमारा वर्तमान दुखदायी कहा जा सकता है।

अभी जो एजुकेशन सिस्टम हमारे देश में चल रहा है, वो दरअसल अंग्रेजो के द्वारा लागू की गई शिक्षा व्यवस्था है। इसे मैकॉले शिक्षा व्यवस्था भी कहा जाता है। जिसे अंग्रेजो ने हमारे देश में सन १८३५ में लागू किया था। ताकि यहाँ के युवाओं को अपने फैक्ट्री में क्लर्क और दूसरे काम करने लायक बनाया जा सके। लेकीन दुःख की बात तो ये है की आजादी के इतने साल बाद भी हम अंग्रेजो द्वारा लागू की गई शिक्षा व्यवस्था को ही चला रहे है।

वहीं अगर बात करे फ़िनलैंड की तो, सन १८६० तक तो वहाँ पब्लिक एजुकेशन की कोई व्यवस्था भी नहीं थी। अब तक यहाँ चर्च में ही पढ़ाया जाता था। तभी वहाँ के नेशनल चर्च के प्रमुख के दिमाग में ये आईडिया आया कि अगर सारे लोग पढ़ना सीख जायेंगे तो अपनी मातृभाषा में बाइबिल पढ़ सकेंगे। इसके 6 साल बाद सन १८६६ में चर्च से स्वतंत्र एक नेशनल स्कूल सिस्टम बनाया गया।*

२. शिक्षा सबके लिए – एजुकेशन फॉर आल:

कोई पीछे ना रह जाये वाली मानसिकता के साथ फ़िनलैंड में एजुकेशन फॉर आल का सिस्टम चलता है। मलतब की यहाँ शिक्षा सबके लिए सामान और फ्री में उपलब्ध है। स्कूल के बाद कॉलेज की भी पढ़ाई फ्री है। स्कूल में तो पढ़ाई के लिए जरुरी सभी चीजें स्कूल की तरफ से विद्यार्थियों को फ्री में उपलब्ध करवाई जाती हैं।

हमारे यहाँ शिक्षा सबके लिए सिर्फ कागजों में उपलब्ध है। असल में तो यहाँ भेदभाव से पूर्ण शिक्षा दी जाती है। सरकारी कॉलेज में जाति के हिसाब से सीट रिज़र्व होते है। और उसके हिसाब से ही एडमिशन दिया जाता है। यहाँ स्टूडेंट ज्यादा और कॉलेज कम हैं।  हर साल हजारों स्टूडेंट को एडमिशन सिर्फ इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि अधिकतर कॉलेज में स्टूडेंट्स क्षमता से अधिक होते है।

अगर फ्री शिक्षा की बात करें तो कुछ सालों से कुछ राज्यों की सरकार ने सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को फ्री किया है। बच्चों को किताबें और यूनिफार्म भी वितरित की जाती हैं। लेकिन अधिकतर जगहों में घोटाले किये जाते है। स्कूल वाले भी किसी ना किसी बात के लिए बच्चों से पैसे मंगाते ही रहते है।



३. सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूल:

कुछ दशकों से हमारे देश में सरकारी स्कूल के बजाय प्राइवेट स्कूल में पढ़ने का फैशन बना है। सरकारी स्कूल में सरकारी शिक्षकों और सरकारी लचर व्यवस्था के कारन पढ़ाई की हालत औंधे मुँह गिर पड़ी है। जिसके कारन हर कोई चाहता है की उनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़े।

प्राइवेट स्कूल में दिए जाने वाली सुविधाए और विज्ञापनों से पालक आकर्षित हो जाते है। लेकिन प्राइवेट स्कूल में मोटी फीस होने के कारन हर कोई अपने बच्चे को वहां एडमिशन नहीं दिलवा पाते। अधिकतर प्राइवेट स्कूलों में पैसे वाले घर के बच्चे ही पढ़ते है। हालत ये है की सरकार ने प्राइवेट स्कूलो में कुछ प्रतिशत सीटों को गरीब बच्चों के लिए आरक्षित कर रखा है। जिसमे एडमिशन लेने के लिए भी लोगो को अपनी गरीबी का प्रमाण देना पड़ता है।

दूसरी तरफ फ़िनलैंड है, जहां सारी सुविधाएँ और शिक्षा पूरी तरह फ्री है और सरकारी स्कूलो में पढ़ाई की गुणवत्ता इतनी अच्छी है की हर कोई सरकारी स्कूल में ही अपने बच्चे को पढ़ाना चाहता है। बड़े अमीर लोगो से लेके गरीब तक के बच्चे सब एक ही साथ एक ही कक्षा में पढ़ते है। प्राइवेट स्कूल में कोई दाखिला ही नही लेता इसलिए वहाँ प्राइवेट स्कूल ही नही है।

4. सही उम्र में सही शिक्षा:

हमारे देश में बाल मजदूरी कानूनन अपराध है, फिर भी स्कूलो पर कोई कारवाई क्यों नही होता जो 4-5 साल के बच्चों को १०-१० किलो वजनी बस्ते ढोने पे मजबूर करता है। हमारे यहाँ बच्चा जैसे-तैसे तीन साल की उम्र में पहुँचता है और उसे 5-१० किलो वजन के बस्ते के साथ स्कूल भेज दिया जाता है। जिस समय बच्चे को खेलने-कूदने और शारीरक विकास होना होता है उस समय यहाँ उसे स्कूल भेज के घंटो-घंटो तक बैठे रहने पे मजबूर किया जाता है। जब तक बच्चा ७ साल की उम्र में पहुँचता है उसकी रचनात्मकता आधी हो जाती है और वो रटने में माहिर होने वाला होता है।

वहीं बात अगर फ़िनलैंड की करें तो ७ साल की उम्र से पहले तक किसी भी बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं दिया जाता। ७ साल से पहले किसी बच्चे की फॉर्मल एजुकेशन स्टार्ट नहीं होती। ७ साल से कम उम्र के बच्चों के लिए डे-केयर और प्री-स्कूल होते हैं, लेकिन वहां पढाई नहीं करवाई जाती। बल्कि बच्चों को खेलने-कूदने और शारीरिक विकास करने का मौका दिया जाता है। साथ ही उन्हें दूसरे बच्चों के साथ कम्युनिकेशन करना, रिलेशन बिल्ड करना दूसरों को समझना जैसी चीजें सिखाई जाती है। प्री-स्कूल में भी पढ़ाई नही होता बल्कि स्कूल के माहोल के लिए बच्चों को मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। ताकि जब बच्चा अपना स्कूल और पढ़ाई शुरू करे तो उसे एक जबरदस्त शुरुवात मिले।



5. लेस इज मोर:

फ़िनलैंड में लेस इज मोर (कम ही ज्यादा है) के सिद्धांत को मानते है। अर्थात उनके स्कूल में बच्चे हफ्ते में सिर्फ २० घंटे ही पढ़ाई करते है। मतलब किसी दिन ३ घंटे तो दिन 4 घंटे का ही स्कूल होता है। और इनमे लंच ब्रेक भी शामिल होता है। कोई भी लेक्चर ४५ मिनट से ज्यादा का नहीं होता। और हर ४५ मिनट के बाद बच्चों को कम से कम 15 मिनट का ब्रेक दिया जाता है।

कम समय देने का इनका उद्देश्य ये है की बाकि समय में बच्चे खेले-कूदें, सोशल एक्टिविटी में शामिल हो, फैमिली के साथ समय बिताएं, अपने मनपसंद काम करें जैसे की कुकिंग, सिंगिंग, पेंटिंग आदि। इतना ही समय टीचर भी लगाते है पढ़ाने में। एक्स्ट्रा समय में वो लोग आगे के सिलेबस की प्लानिंग करते है और हर हफ्ते कुछ घंटो का उन्हें टीचर ट्रेनिंग लेना होता है। अब आप लोग सोच रहे होंगे की इतने कम टाइम का स्कूल होता है तो जरुर होमवर्क बहुत सारा होता होगा। लेकिन आश्चर्य की बात ये है की वहां के स्कूल में होमवर्क का कोई सिस्टम ही नहीं है। जो भी पढ़ना होता है वो स्कूल में पढ़ाया जाता है।

हमारे यहाँ एक स्टूडेंट का डेली रूटीन कुछ ऐसा होता है। स्टूडेंट सुबह 5.३० बजे उठता है। फ्रेश होकर ट्यूशन जाता है। २-३ सब्जेक्ट ट्यूशन पढ़के वो ९ बजे तक वापस आता है। नास्ता करके १० बजे स्कूल जाता है। 4 बजे स्कूल से आता है। फिर ट्यूशन को जाता है। ७ बजे ट्यूशन से आता है। १ घंटा होमवर्क करता है। डिनर करता है। फिर २ घंटा होमवर्क करता है। सो जाता है। अगले दिन फिर रिपीट। हमारे यहाँ के स्कूल में टॉप करने वाले बच्चे बताते है की वो दिन में १६-१६ घंटे तक पढाई करते थे। फैक्ट्री में मजदूर भी इतनी मेहनत नही करते यार।

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