आपस की फूट :- सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’ जी द्वारा रचित ज्ञानवर्धक हिंदी पद्य कथा

‘आपस की फूट’ पद्य कथा में दो सिर वाले पौराणिक पक्षी ‘भारुण्ड’ के माध्यम से आपस में मिल जुलकर रहने और दूसरे की भावना को आदर देने की बात कही गई है। आपस में हिलमिल कर रहने से जीवन में प्रसन्नता बनी रहती है और आपस में वैर भाव एवं फूट हो तो जीवन एक दिन नष्ट हो जाता है। जीवन में सहिष्णुता का बड़ा महत्त्व होता है। हम छोटी-छोटी बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर एक – दूसरे से बदला लेने की नहीं सोचें। दूसरे के हित में ही हमारा हित छुपा होता है।

आपस की फूट

आपस की फूट

फूट नहीं होती है अच्छी
लेती है यह सब कुछ लूट,
सुख से जीने के सपने भी
दूर कहीं जाते हैं छूट। १।

प्रेम भाव सब खो जाता है
अपनापन हो जाता चूर,
कड़वाहट मन में घुल जाती
जीवन बन जाता नासूर। २।

दुश्मन भी ऐसे मौके का
लाभ उठाता आकर खूब,
बड़े – बड़े परिवार राष्ट्र भी
इसी फूट से जाते डूब। ३।

एक कथा मैं तुम्हें सुनाता
बच्चों ! समझाने यह बात,
किया फूट ने जिसमें जमकर
सुखमय जीवन पर आघात। ४।

रहता था प्राचीन काल में
कभी एक पक्षी भारुण्ड,
धड़ तो एक रहा था उसका
लेकिन दो थे उसके मुण्ड। ५।

अलग अलग दो सिर होने से
दोनों के थे अलग दिमाग,
इसीलिए ही सोच अलग भी
आई थी दोनों के भाग। ६।

एक देह थी एक प्राण था
सोच मगर होने से भिन्न,
रहता था भारुण्ड सदा ही
बेचारा अपने में खिन्न। ७।

इक सिर कहता पूरब की तो
दूजा जाता पश्चिम ओर,
दिखता इस खींचातानी का
नहीं कहीं पर कोई छोर। ८।

दोनों सिर की जिद के आगे
था भारुण्ड बड़ा लाचार,
तालमेल के इस अभाव ने
बना दिया जीवन ही भार। ९।

ऊपर से चाहे खुश दिखता
पर मन में था बहुत हताश,
यहाँ-वहाँ भटका फिरता था
भोजन करता हुआ तलाश। १०।

एक दिवस वह वन के अन्दर
रहा व्यर्थ ऐसे ही घूम,
तभी गिरा फल दीख पड़ा तो
उठा एक सिर उसका झूम। ११।

स्वाद लिया जब पहले सिर ने
फल पर शीघ्र चोंच को मार,
उसे लगा तब ऐसा फल तो
चखता है वह पहली बार। १२।

पहला सिर बोला – यह फल है
सचमुच में अनुपम स्वादिष्ट,
नहीं चखा अपने जीवन में
फल मैंने तो इतना मिष्ट। १३।

ऐसा मीठा भी फल होता
पता चला यह मुझको आज,
छुपे हुए हैं इस दुनिया में
ऐसे जाने कितने राज। १४।

पहले सिर की ये बातें सुन
गया दूसरे का मन डोल,
बोला – मुझको भी फल चखकर
लेने दो मुँह में रस घोल।। १५।

यह कह दूजे सिर ने अपनी
चोंच बढ़ाई फल की ओर,
लेकिन पहले सिर ने उसको
दूर कर दिया था झकझोर। १६।

बोला – तू इस फल पर अपनी
चला नहीं यह गन्दी चोंच,
मुझे मिले इस फल को देखो
तुम देना ना कहीं खरोंच। १७।

दूजा बोला – हम दोनों का
देखो भैया ! एक शरीर,
बँधी हुई है साथ जन्म के
आपस में अपनी तकदीर। १८।

जिसको जो भी चीज मिले वह
खाएँ हम मिल-जुलकर बाँट,
तभी उदासी के कुहरे को
सहज भाव से सकते छाँट। १९।

पहला सिर तब यह बोला था
बात तुम्हारी बिल्कुल नेक,
चाहे सिर दो रहे हमारे
किन्तु पेट तो अपना एक। २०।

मैं खाऊँ इस फल को तो भी
भर जाएगा तेरा पेट,
अरे ! इसे मैं खाकर ही तो
भूख रहा हूँ तेरी मेट। २१।

तर्क सुने पहले सिर के तो
दूजे को हो आई खीज,
बोला – स्वाद जीभ का भी तो
होता है भैया कुछ चीज। २२।

तुनक गया पहला सिर यह सुन
बोला दूजे को फटकार,
जा रे ! तेरे नहीं स्वाद का
मैं हूँ कोई ठेकेदार। २३।

फल खाने के बाद पेट से
आएगी जो तुझे डकार,
उससे भी अनुमान स्वाद का
हो जाएगा भली प्रकार। २४।

पहला सिर था इतना कहकर
फल खाने में फिर तल्लीन,
और दूसरा सिर बेचारा
रहा देखता बनकर दीन। २५।

इस घटना को दूजे सिर ने
समझ लिया अपना अपमान,
पहले सिर से तब उसने भी
बदला लेने की ली ठान। २६।

सोचा करता – पहले सिर का
कैसे अब मैं करूँ विनाश,
इस अवसर की चुपके चुपके
करता रहता सदा तलाश। २७।

नदी किनारे घूम रहा था
कुछ दिन बाद वही भारुण्ड,
उगे हुए थे वहाँ दूर तक
कई झाड़ियों के भी झुण्ड। २८।

देख एक फल पड़ा निकट ही
बोल उठा दूजा सिर ‘वाह’,
अरे ! इसी को बहुत दिनों से
पाने की थी मेरी चाह। २९।

दूजा सिर था फल पर ज्यों ही
चोंच मारने को तैयार,
पहले सिर को लगा तभी था
जैसे खड़ा मौत के द्वार। ३०।

बोला – नहीं पता क्या इसमें
विष है कड़वेपन के साथ,
खाएगा तो हम दोनों ही
धोएँगे जीवन से हाथ। ३१।

कहा दूसरे सिर ने हँसकर
क्यों करता रे व्यर्थ विलाप,
बात नहीं जब मेरी सुनता
तो अब तू भी रह चुपचाप। ३२।

पहले सिर ने फिर समझाया
बात आज ले मेरी मान,
यह जहरीला फल खाया तो
जाएगी दोनों की जान। ३३।

किन्तु दूसरे सिर के ऊपर
था बदले का भूत सवार,
बोला – तेरे जन्म मरण का
मान न मुझको ठेकेदार। ३४।

जो इच्छा है वह खाऊँगा
मेरे ऊपर है तू कौन,
चाहे जो भी रहे नतीजा
भुगत उसे अब रहकर मौन। ३५।

बड़े यत्न से यह फल पाया
है इसके विष का भी ज्ञान,
इसको खा मैं भूल सकूँगा
तेरे से पाया अपमान। ३६।

और दूसरे सिर ने सारा
फल खाकर कर दिया समाप्त,
तड़प – तड़प भारुण्ड वहीं पर
हुआ मौत को तब था प्राप्त। ३७।

वैर भाव से दोनों सिर का
गया कभी का नाता टूट,
और अन्त में जीवन को भी
ले बैठी आपस की फूट। ३८।

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धन्यवाद।