मांसाहार बनाम शाकाहार | मांसाहारी के मिथक पर सर्वाहारी व्यंग्य बाण

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मांसाहार बनाम शाकाहार

“वाह क्या खुशबू है।” 
मन में लालच से भरे ये शब्द मुँह से अपने आप ही निकल आते है। जब पड़ोस वाले घर से या गली में चलते हुए किसी के घर से पकते हुए चिकन की खुशबू आती है। वैसे कलयुग में भी शाकाहार में पीएचडीधारीयो की काफी संख्या है। जिनको नॉनवेज का नाम सुन के ही उल्टी आने लगती है। और जो लोग मांसाहार में महारथ है उनके मुहँ में पानी आ जाता है। मांसाहार बनाम शाकाहार का युद्ध तो सदियों से चली आ रही है। आइये इस बहती गंगा पे हम भी हाथ धोले।

चिकन की खुशबू मांसाहार बनाम शाकाहार

मै ना तो मांसाहार में महारथ हूँ। ना ही शाकाहार में पारंगत। मै तो बस एक आम आदमी हूँ। जिसके पास ना ही इतने पैसे होते है की पूर्ण मांसाहारी जिंदगी अफ़ोर्ड कर सके। और ना ही इतना ज्ञान की पूर्ण शाकाहारी अपना के सादगी पूर्ण जिंदगी बिता सके। हम तो मार्किट के हिसाब से Update होते रहते है। कभी आलू के भाव चढ़ के 80रू किलो हो जाए तो हमें 40 रू दर्जन के अंडे खाने पड़ जाते है।

मांसाहारी और शाकाहारी लोगो के बीच अक्सर ही वाद-विवाद चलता रहता है। दोनों अपनी-अपनी अच्छाई और दुसरे की बुराई बताते है। शाकाहारी लोग कहेंगे की मांसाहार तमोआहर है उससे आत्मा अशुद्ध होता है। तो वही मांसाहारी कहते है की अंडे, चिकन, मटन खाने से प्रोटिन, विटामिन और कई ऐसे पोषक तत्व मिलती है जो हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है। डॉक्टर भी इसकी सलाह देते है। अब बिचारा मेरे जैसा एक आम आदमी सोच में पड़ जाता है की अपने आत्मा को शुद्ध करे या शरीर को स्वस्थ। क्योंकि इस जमाने में शुद्ध आत्मा वाले मिलते नही है और कलयुगी शरीर नश्वर होता  है।

कल ही की बात है। एक आदमी ने मुझसे पूछा ‘मुर्गा खाते हो’? ‘हां’ मैंने कहा। फिर पूछा “मछली, अंडा? वो भी खाता हूँ। “मत खाया करो मांसाहारी अच्छी बात नही।” मैंने हां में सर हिल दिया। फिर अगले हो पल तपाक से बोला “हां! बकरा खाया करो वो खाने में मस्त स्वादिष्ट होता है और फायदेजनक भी।” मैंने मन में सोचा कैसा बुड़बक आदमी है। कैसे-कैसे सलाह देने वाले पड़े है दुनिया में।

एक ओर जहां हमारे धर्म ग्रंथो में मांसाहार को मना किया गया है। वही दूसरी ओर सारे राजा लोग शिकार में जाते भी थे। ये सोचने पे मजबूर कर देता है की अगर वो लोग मांसाहारी नही थे तो फिर शिकार करने क्यों जाते थे? क्या बेचारे हिरन कोई खेलने की चीज़ है। की चलो समय व्यतीत करने उसके साथ शिकार-शिकार खेल लो। खैर राजा महाराजाओ के तो शौक ही बड़े होते है।

हमारे देश में तो फिर भी लोग थोड़े limit में रहते है और सिर्फ अंडे, मुर्गी, और बकरे तक ही सिमित रहते है। कुछ देशो जैसे चीन के लोग तो साँप, केकड़ा और पता नही क्या क्या खा जाते है। हैरान करने वाली एक बात ये भी है की बौद्ध धर्म जिसे दुनिया में सबसे ज्यादा अहिंसा वाला धर्म माना जाता है। वही लोग बहुत ज्यादा मांसाहारी होते है। हद की सीमा जिसे हमारे लोग पार नही करते वहाँ से वो लोग सुरुवात करते है। जब हम स्कूलों में पढ़ते थे तब ये सोच के हैरान ही रह जाते थे की विदेश के लोग रोज चिकन खाते है। मुझे याद है तब हमारे घर में साल में एकात बार ही चिकन पकता था।

पर सवाल ये है की इंसान को मांसाहार होना चाहिए या शाकाहार? इसे जानने के लिए हमे पहले दोनों के लाभ और हानि को जानना होगा। अब रही बात शाकाहार की तो इसके गुण-अवगुण तो किसी को बताने की जरुरत नही है इसके एक्सपर्ट तो हर घर में मिल जायेंगे। मांसाहार में जो ज्यादा ध्यान देने वाली बात है वो है इसका माइनस पक्ष। जो मुख्यतः तीन है। एक तो ये की मांसाहार खाने से पाँप लगता है, दूसरा एक प्राणी को बेवजह मरना पड़ता है, और आखिरी की ये भोजन मनुष्यों के लिए नही है।

मैंने उस दिन चिकन खा लिया तो एक धार्मिक पुरुष ने कहा “किसी जीव को मार के खाना पाँप है। इसका फल अगले जनम में मिलेगा। अगले जनम में तुम मुर्गा बनोगे और ये तुम्हे मार के खायेगा।” तो इसके जवाब में मैंनेै उनसे कहा “काका ये भी तो सोचो की हो सकता है इस मुर्गे ने मुझे पिछले जनम में खाया रहा होगा जिसके कर्मफल स्वरुप मै अब उसे खा रहा हूँ।” इस बात से तो ये बात साफ़ हो जाता है की मांसाहार से पाँप नही लगता।

दूसरी बात में मै भी थोडा doubtful हूँ। एक प्राणी को तो जान गवाना पड़ता है। पर क्या करे सब ऊपर वाले की मर्ज़ी है उसके मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नही हिलता। तो आपको क्या लगता है आप एक जीव के मार सकते है उसके मर्जी के बीना? पहले जब रात में चिकन खा के घर से टहलने निकलते थे तब छाती चौड़ा कर के चलते थे। जब कोई पूछता था तो बड़े ठाट से बताते थे “चिकन खाए है”। अब ये फीलिंग नही आती क्योंकि अब लोग जितने पढ़े लिखे और सभ्य होते जा रहे है वैसे ही मांसाहार होते जा रहे है।

ये कहना की मनुष्य सिर्फ शाकाहार के लिए बने है बिलकुल गलत है क्योंकि सभ्यता के विकास से पहले जब इन्सान इस दुनिया में आये थे और आदिमानव के रूप में थे तब वो मांस ही खाते थे। दुनियाभर में ऐसे कई लोग है जो अहिंसावादी होते है। दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाते है। पर खाने में बढ़िया-बढ़िया चिकन, meat और ना जाने क्या क्या खाते है। खैर उनकी सोच उनको ही मुबारक।

आप निश्चित ही ये सोच रहे होंगे की ये बन्दा मांसाहार का सपोर्ट कर रहा है। पर ये निहायत ही गलत होगा। मै तो साल में 300 से ज्यादा दिन सिर्फ शाकाहार भोजन ग्रहण करता हूँ। हम तो आम आदमी है हमारे लिए क्या मांसाहारी क्या शाकाहारी। हमें तो दिनभर मेहनत करने के बाद मुश्किल से घर का खर्चा निकालने लायक कमाई करते है तो जो सस्ता मिले उसे ही खा लेते है।

ये व्यंग्य चिकन की खुशबू बस मजे के लिए लिखा गया है। इसमें कही गयी सारी बाते लेखक के व्यक्तिगत विचार है। और दुसरो के विचारो में कोई भी प्रभाव डालने का कोई उद्देश्य नही है। फिर भी ये व्यंग कैसी लगी अगर बताने का मन हो रहा है, तो चिकन की खुशबू लेते हुए कमेंट में आप अपना भड़ास निकल सकते है। :mrgreen:


ये लेख झेलने के लिए धन्यवाद।

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