परीक्षा पर हास्य कविता :- परीक्षा के दिनों में विद्यार्थियों की हालत पर हास्य कविता

परीक्षा सिर पार आती है तो सबके तोते उड़ जाते हैं। जिन्होंने सारा साल परिश्रम किया होता है उनके लिए परीक्षा कुछ खास तकलीफदेह नहीं होती। जिन्होंने सारा वर्ष कभी किताब ही न उठायी हो उनके लिए तो जैसे कोई मुसीबत बिना बताये आ गयी हो, ऐसा हाल होता है। ऐसे में कोई भगवान को याद करता है तो किसी के सिर पे परीक्षा के कारन सिर दर्द होता रहता है परन्तु फिर भी सभी लोग किताब उठा कर पढ़ते हैं। हाँ, कुछ ऐसे भी होते हैं जो पढ़ने की बस एक्टिंग करते हैं। तो आइये ऐसे ही हालातों का जायजा लेते हुए हम पढ़ते हैं परीक्षा पर हास्य कविता :-

परीक्षा पर हास्य कविता

परीक्षा पर हास्य कविता

आयी परीक्षा सिर पर देखो
मुंह से निकला हाय राम,
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

रिश्तेदारों को है चिंता
हमसे ज्यादा खाय रही
फेल हुयी थी चुन्नी अपनी
बता के बुआ डराय रही,
बस उनके चक्कर में अब तो
जीना अपना हुआ हराम
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

नींद न आती रातों को
उल्लू बन-बन जाग रहे
समझ न आये कौन दिशा में
दिमाग के घोड़े भाग रहे,
सिर में ऐसी दर्द छिड़े है
भगा सके न झंडू बाम
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

पढ़िए :- किताब के महत्व पर कविता।

जादू टोना, तंतर मंतर,
काम न कुछ भी करता है
इसके जाल में जो भी फंसता
वो जीता न मरता है,
मंदिर मस्जिद जहाँ भी जाओ
आता न मन को आराम
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

जाने कौन वो मानव था
हमसे दुश्मनी जिसने निभायी
जाने किस बदले की खातिर
उसने फिर परीक्षा बनायी,
मिल जाए जो हमें कहीं वो
कर दें उसका काम तमाम
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

चैन कहाँ मिल रहा किसी को
किसे मिल रहा है विश्राम
भागा दौड़ी मची हुयी है
कुछ बैठे जपते हैं नाम,
बनेगा क्या अब लगी हैं चिंता
सब सोचें यही सुबह और शाम
बने किताबी कीड़ा हैं सब
छोड़ के देखो सारे काम।

पढ़िए लेख :- विद्यार्थी जीवन का कड़वा सच।

परीक्षा पर हास्य कविता आप सब को कैसे लगी? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिख कर बताएं।

धन्यवाद।

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