मार्मिक लघु कथा – चिरंजीव | दरकते हुए रिश्तों पर एक कहानी

समय इतनी तेजी से बदल रहा है कि कुछ वर्षों पहले जो इंसान दूसरों की भलाई के लिए काम करता था आज अपनों से ही दूर होता जा रहा है। और ये बात किसी एक या दो घर की नहीं है बल्कि सारे समाज की है। व्यस्तता के कारन कुछ रिश्तों में दरार आ रही है  तो कुछ रिश्ते बस इसलिए तोड़ दिए जाते हैं क्योंकि उनसे हमारी सोच नहीं मिलती या फिर हम उन्हें पसंद नहीं करते। फिर चाहे ही उन्होंने ने हमारे लिए कितने ही त्याग क्यों न किये हों। ऐसे ही एक विषय ओअर आधारित है यह “ मार्मिक लघु कथा – चिरंजीव ”

मार्मिक लघु कथा – चिरंजीव

मार्मिक लघु कथा – चिरंजीव

रमेश बाबू, आज वृद्धाश्रम में उदास बैठे बैठे अतीत में खो गए, उनका एक छोटा सा संसार था। वो,पत्नी रेशमा और एक मात्र पुत्र अपूर्व। जैसा नाम वैसा जहीन,हर कक्षा में अव्वल,विज्ञान में क़ाफी रुचि थी उसे, अपूर्व को डॉक्टर बनकर एड्स पर रिसर्च करना था, और उसपर वैक्सीन बनानी थी।

पिताजी के पास उतने पैसे न थे, तो बेटे को पढ़ाने के लिए अपनी एक किडनी बेच दी, किसी को पता चलने न दिया। अपूर्व एम बी बी एस करने के बाद रिसर्च करने के वास्ते छात्र वृत्ति मिल गई। प्रोफेसर अनिल के अंडर में रिसर्च करने लगा, प्रोफेसर को अपूर्व को अपने घर बुलाने लगे, वहाँ उनकी बेटी अर्पिता से मुलाकात हुई, मुलाकात परिणय में बदल गया, माँ बाप ने सादगीपूर्ण तरीके से शादी कर दी।

कुछ दिन सही चला, थोड़े दिन बाद घर में खटपट बढ़ने लगी। रेशमा को हाई ब्लड प्रेशर रहने लगा और एक दिन ब्रेन स्ट्रोक होने से चल बसी। मेरा घर में रहना अर्पिता को खल रहा था, उसके मित्र मेरे रहने से घर पर आते नहीं थे। उसने मेरे ख़िलाफ़ अपूर्व के कान भरने शुरू कर दिए।

एक दिन बहू ने ये इल्ज़ाम लगा दिया कि मेरी बुरी नज़र है उस पर, उसी पल मैंने घर छोड़ने का निर्णय लिया, आज कोलकाता के एक वृद्धाश्रम में पनाह ली है। बेटे ने मुझे न रोकने की कोशिश की और न ये पता लगाने की के सच्चाई क्या है, क्या यही मेरा बेटा है?

जो मुझपर जान न्योछावर करता था। पापा पापा कहते हुए थकता न था। यूँ अचानक बदल गया।

क्या इसी वास्ते मैंने अपनी किडनी बेची थी, बुढ़ापे में इस बदनामी के वास्ते ?


हारुन वोराहारुन वोरा जी स्वरोजगार रत हैं। बचपन से इन्हें लिखने का शौक है। इन्होने बीएससी, बीए, एमए और अंग्रेजी में डिप्लोमा की शिक्षा ग्रहण की है। इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इतना ही नहीं ये निःस्वार्थ भावना से साहित्य की सेवा में लगे हुए हैं।

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