घमण्ड और दिखावे पर कविता :- मटकू मेंढक | Ghamand Par Kavita

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घमण्ड और दिखावे पर कविता में घमण्ड और दिखावा नहीं करने की सीख दी गई है। मटकू नामक मेंढक बहुत घमण्डी था और अपने आगे किसी को कुछ भी नहीं समझता था। एक बार संगीत सभा में योग्यता नहीं होने पर भी मटकू मेंढक हिस्सा लेता है और वाहवाही लूटने के लिए जोर जोर से गाना गाता है। बहुत तेज चिल्लाने से उसका गला फट जाता है और वह अपनी जान गँवा बैठता है। हमें अपनी क्षमताओं के अनुसार ही काम करना चाहिए और व्यर्थ के प्रदर्शन से बचना चाहिए।

घमण्ड और दिखावे पर कविता

घमण्ड और दिखावे पर कविता

मेंढक कभी रहा करता था
एक कुएँ में मटकूराम ,
नहीं मानता बात किसी की
बिन सोचे वह करता काम ।

छोटे से बढ़ बड़ा बना था
भूल मगर वह गया अतीत,
अकड़ दिखाने से छूटे थे
उसके सभी पुराने मीत ।

नाप कुएँ की दूरी को वह
जाता था खुशियों से फूल,
बहुत बड़ी है दुनिया बाहर
करता इसको नहीं कबूल ।

टर्र टर्र टर्राता रहता
नहीं और की सुनता बात,
जो विरोध उसका करता तो
मार उसे वह देता लात ।

ताली की गड़गड़ सुनना ही
उसको हरदम रहा पसन्द,
वाह वाह अपनी सुनकर वह
पाता था अनुपम आनन्द ।

बहुत बड़ी संगीत सभा जब
हुई कुएँ में पहली बार,
मटकू भी जा लगा वहाँ पर
धारण कर फूलों का हार ।

कई गुणी मेंढक गाते थे
सधे सुरों में सुन्दर राग,
यह सुन मटकू के भी मन में
भाव गया शेखी का जाग ।

नहीं ज्ञान था उसको कुछ भी
कहते किसको हैं संगीत,
फिर भी चाह रहा था गाकर
वह जाए महफिल को जीत ।

नाम जुड़ाया उसने अपना
संचालक से कर फरियाद,
और लगा था वह गाने भी
इसके कुछ ही देरी बाद ।

जब छेड़ा आलाप लगाकर
उसने अपना पूरा जोर,
हँसी दबाकर सुनने वाले
सीटी बजा मचाते शोर ।

उत्साहित होकर मटकू तो
करता ही जाता सुर तेज,
इस धुन में वह साँसों को भी
रख पाया था नहीं सहेज ।

गश खाकर गिर पड़ा मंच पर
गला फटा मटकू का आज,
शांत हो गई सदा सदा को
बेसुर में गाती आवाज ।

समझ रहा था जो अपने को
सभी तरह के गुण की खान,
आत्म -प्रशंसा के चक्कर में
खो बैठा वह मटकू जान ।

बच्चो ! ठीक नहीं होता है
बढ़ा चढ़ाकर करना बात,
व्यर्थ दिखावा करने वाला
एक दिवस खाता है मात ।

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