सवाल श्रेष्ठता का – कहानी धर्मो के लड़ाई की

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सवाल श्रेष्ठता का

सवाल श्रेष्ठता का

एक बुजुर्ग के चार पुत्र थे। चारों अच्छा कमाते थे। अपने पिता की अच्छे से सेवा करते थे। चारों का विवाह हो चुका था, और वह प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन निर्वाह कर रहे थे। उन चारों के आगे दो-दो पुत्र हुए। पूरा परिवार संयुक्त रूप से आगे बढ़़ने लगा।

समय  की गति के साथ  बदलाव आया और परिवार में कुछ खामियां आ गई। धीरे धीरे परिवार के चारों भाई एक के बाद एक अपने पिता का साथ छोड़ कर चले गए। और अपने पिता द्वारा बनाई गई भूमि पर पास पास अपने घर बना लिए। समय व्यतीत होता गया। दादा से दूर हो जाने के कारण सभी संतानें अपने पिता को मात्र इस कारण से श्रेष्ठ जानने लगे कि उन्होंने हमारा पालन-पोषण किया है।

इसी बीच वह कभी कभार दादा जी से मिलने भी जाते थे। दादाजी जिस घर में रहते थे। उनके बेटे व पोते जब मिलने जाते तो सिर्फ उसी कमरे में मिलते जिसमें वह रहते थे। चारों भाइयों का कमरा अलग होने के कारण दादाजी को उसी कमरे में मिलना पड़ता जहां उनका पुत्र मिलना चाहता। पर दादाजी को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं थी। वह पुत्र मोह में थे और हमेशा समझाते थे कि तुम सब फिर से एक हो जाओ पर कोई भी उनकी बात नहीं मानता था।

समय की चाल कुछ ऐसी चली की चारों पुत्रों की संताने यह समझने लगी कि वह मात्र अपने पिता के कारण ही श्रेष्ठता प्राप्त कर सकते हैं उनके पिता के भाइयों के परिवार से उनका कोई लेन-देन नहीं है। और उनके बीच  ईर्ष्या-द्वेश बढ़ता रहा और आज ऐसा समय आया है कि वह अपने दादा की भूमि को अपने पिता की भूमि कहते हैं।

यह हाल उन चारों परिवारों का है। सभी एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते हैं उन सब के पिता ने समझाते हैं कि हम सब एक हैं और दादा यह सुन कर मुस्कुरा देते हैं कि यह खुद सब कुछ बांट कर आज चीख रहे हैं कि हम एक हैं। मेरे भी जमीन पर रह कर अपने स्वामित्व प्रदर्शित कर रहे हैं। उन पुत्रों की संताने अब सिर्फ अपने दादा जी को देखने भर जाते हैं। उनके पास बात करने के लिए आज समय व्यतीत करने के लिए नहीं रुकते। कहीं भी कोई भी बात होता है तो अपने दादा को नहीं बल्कि पिता का नाम लेकर कहते हैं कि मैं उसका बेटा हूं।

अब सोचने वाली बात है कि क्या इस स्थिति में आगे आने वाली पीढ़ियां एकजुट होकर रह सकेंगी? यदि हां, तो कब तक?  क्या हम अपने उस ईष्ट को भूल जाएंगे जो हमारा मूल है? विचार करने जाओगे तब से यह है कि हम आज भी अपने आप को अपने दादा के वंश का एकमात्र हितैषी कहते हैं।

उम्मीद है आपको यह एक पारिवारिक लेख लगा होगा। ऐसा तो हर परिवार में होता है परंतु जिस परिवार के बारे में वह बता रहा था उसके पात्र निम्नलिखित है:-
दादा :- इनके अनेक नाम है भगवान, अल्लाह, वाहे गुरु, गॉड कुछ भी कह सकते हैं आप।
कमरे  :- धार्मिक स्थल
चारों पुत्र :- इनको आप किन्हीं भी चार धर्मों के नाम दे सकते हैं।
संतानें :- इस लेख को पढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति।
माफ करना लेकिन कुछ संताने ऐसी भी हैं जो एकता तो चाहती हैं परंतु उनकी आवाज आपसी लड़ाई के शोर में दब जाती है।

नोट :- यह लेख ” कहानी धर्मो के लड़ाई की – सवाल श्रेष्ठता का ।”  किसी धर्म विशेष या व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है।

 

ये कहानी आपको कैसी लगी अपने विचार हमें कमेंट के माध्यम से जरुर दे, अगर आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है तो हमें भेजे, हम उसे आपके नाम से यह प्रकाशित करेंगे, धयवाद.. तबतक पढ़िए ये बढ़िया लेख-

 

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Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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