बचपन को ढूँढने बैठा हूँ :- बचपन की यादें छोटी कविता भाग – 2

बचपन जीवन का एक ऐसा हिस्सा होता है जिसे हम जब भी याद करते हैं तो हमारे चेहरे पर बस एक हलकी सी मुस्कान आ जाती है। ये बचपन की यादें अक्सर हमारी सोच में तभी आती हैं जब हम कुछ फुर्सत के लम्हों में होते हैं। ऐसे ही एक लम्हे में मैंने ये कविता ‘ बचपन को ढूँढने बैठा हूँ ‘ लिखने की कोशिश की है। उम्मीद करता हूँ ये कविता आपको आपकी बचपन की यादों के साथ जोड़ने में कामयाब होगी।

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ

शाम ढले आसमान के तले मैं आँखें मूँद के बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

हैं गम भी बहुत परेशानियाँ भी हैं
वक़्त की दी हुयी निशानियाँ भी हैं,
और साथ में हैं दर्द कई उन सब को भूलने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

कभी खुले असमान के नीचे गलियों में दौड़ जब लगती थी
माँ-पापा प्यार बहुत करते डांट कभी-कभी पड़ती थी,
उन्हीं बीते पलों को आज मैं फिर से टटोलने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

वो लाइट का आना-जाना मिलकर सबका शोर मचाना
रात को पढना लालटेन में भोर भये से फिरे उठ जाना,
गाँव के विद्यालय जाती उस पगडण्डी पर घूमने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

फिर टन-टन घंटी बजती थी दौड़ के घर सब जाते थे
खेलते थे बच्चे जब शाम को बड़े बुजुर्ग चौपाल सजाते थे,
मंदिर में होती आरती और रामायण सुनने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

आज कहाँ वो गलियां हैं कहाँ रहे वो चौबारे
कहाँ गये वो साथी जो हर शाम हमको जो पुकारे,
याद जो आये उन किस्सों को आज मैं बुनने बैठा हूँ
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

शाम ढले आसमान के तले मैं आँखें मूँद के बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूँढने बैठा हूँ।

पढ़िए कविता :- बचपन की यादें – नानी का घर

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Sandeep Kumar Singh

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ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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4 Responses

  1. Naveen कहते हैं:

    गुरुजी आपकी कविता पढ़कर बहुत आनंद मिला, हर रोज़ मैं यही से अपने status copy करके update करता हूँ ????☺️☺️☺️

  2. Yogesh Chandra Goyal कहते हैं:

    बचपन को ढूँढने बैठा हूँ –
    Enjoyed reading this lovely poem
    thanks a lot Sandeep bhai

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