अख़बार – खबर वही डेट नयी | अख़बार पर एक हिंदी कविता

अकसर देखा जाता है कि अख़बार पढ़ना कई लोगों की आदत होती है। सुबह और कुछ मिले न मिले उन्हें अख़बार जरूर मिलना चाहिए। सबको ये उम्मीद रहती है की शायद कोई ऐसी खबर मिल जाए जो अच्छी हो। आज-कल अख़बारों में जो ख़बरें आती हैं और जो देश की हालात है उसे देखते हुए मैंने ये कविता लिखने की कोशिश की है। पढ़ने के बाद अपने विचार जरूर दें।

अख़बार – खबर वही डेट नयी

अख़बार पर एक हिंदी कविता

अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।
कहीं फेंका गया तेज़ाब, कहीं लूटा गया हिजाब,
अफ़सोस जताने को मोमबत्तियां जल रही हैं,
कहीं दहेज़ की आग में जल गयी सुहागिन,
कहीं कचरे के ढेर में नवजात मिल रही है,
अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।

फसल हुयी तबाह है, मानसून है राह भटक रहा,
कर्ज के नीचे दबा हुआ, फांसी पर कृषक है लटक रहा,
खाना न खाता वो, डर बेटी के दहेज़ का उसको खता है,
धूप में तपता वो है, मुस्कानें कहीं और खिल रही हैं,
अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।

पढ़े-लिखे भी धरने करते, सड़कों और चौराहों पर मरते,
किसी से कर्ज़ा मांग-मांग कर परीक्षाओं के शुल्क हैं भरते,
चिंता और बेरोजगारी साथ-साथ ही बढ़ रही है,
नौकरी तो मिलती नहीं बस दिलासा ही मिल रही है,
अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।

रुपया गिरा मजबूत है डॉलर
पकड़े है रईस मजदूर का कालर,
न जाने इस देश में कैसी हवाएँ चल रही हैं,
सम्मान गिर रहा है नेताओं का और महंगाई बढ़ रही है,
अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।

न जाने कब खबर बदलेगी, न जाने कब तस्वीरें
न जाने कब बाहर आएंगे इनक़लाबी शब्दों के ज़ख़ीरे,
थक गयी हैं आँखें ख़बरों सच्चाई खोजते-खोजते
अब तो अख़बार में खबर देने की जगह भी बिक रही है,
अख़बार भी वही है, घटना भी वही है,
कुछ बदल रहा है तो तारीख बदल रही है।

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Sandeep Kumar Singh

Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उम्मीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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2 Responses

  1. Satish Singh says:

    पत्रक़ारिता के पेशे में ‘बिकाऊ’ ही ज़्यादा ‘टिकाऊ’ होता है…. देखते नहीं, कुछ टीवी डिबेटों में भ्रष्ट जोकरों के साथ/द्वारा बेसिर-पैर की बहस और उसमें सत्ताओं की बेशर्मीपूर्ण चाटुक़ारिता.

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