सर्दी पर हास्य कविताएँ :- ठंड पर हिन्दी हास्य व्यंग्य कविताएँ

सर्दी का मौसम जब भी आता है कई लोगों को ये मुसीबत सा लगने लगता है। वहीं कई लोगों को ये बहुत ही आनंद देने वाली ऋतु प्रतीत होती है। ये तो सबका अपना-अपना नजरिया है। हमारा काम तो आपके नजरिये को ही दर्शाना है। लेकिन यहाँ तो दो नजरिये हैं। कोई बात नहीं तो हम लाये हैं दोनों नजरियों को दिखाती सर्दी पर हास्य कविताएँ ।

सर्दी पर हास्य कविताएँ

सर्दी पर हास्य कविताएँ

 काहे तू ठंड-ठंड ठंड करे

काहे तू ठंड-ठंड ठंड करे
ठंड तो अपनी जान बचाय
औरन का तो पता नहीं
पर अपने काम बहुत ये आय,

पता जरा न किसी को चलता
एक महीना जो न नहाय
झंझट न होय पसीने की
न सूरज ही है मुंह झुलसाय,

खर्चा पाउडर, डीओ का सब
रोज ही देखो बचता जाय
ढंका रहे जो तन ये अपना
मच्छर भी काटन को ना पाय,

परेशानी कोई भी न होवे
जो सोते-सोते लाइट जाए
घुसे-घुसे रजाई में ही
पता न चले सुबह हो जाय,

काहे तू ठंड-ठंड ठंड करे
ठंड तो अपनी जान बचाय
औरन का तो पता नहीं
पर अपने काम बहुत ये आय।

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पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी

पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है
कपड़े खूब पहनते फिर भी
अन्दर घुसती जाती है।

इस तरह के मौसम में
यूँ तो हम हफ्ते भर नहीं नहाते
मगर जब भी नहाते हैं
ये सर्दी बदन में बसती जाती है,
पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है।

फिर होता है हमको जुकाम
रुक जाते अपने सब काम
कभी-कभी तो बैठने के गले से
आवाज भी बैठ सी जाती है,
पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है।

दया जरा न दिखाती है
हमको जरा न भाती है
हमको बना के शिकार ये अपना
मंद-मंद मुस्काती है,
पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है।

पसंद कहाँ है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है,
कपड़े खूब पहनते फिर भी
अन्दर घुसती जाती है।

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‘ सर्दी पर हास्य कविताएँ ‘ में इन दोनों कविताओं के बारे में अपने विचार हम तक कमेंट बॉक्स द्वारा हम तक पहुंचाएं।

धन्यवाद।

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