घर की याद पर कविता – खंडहर जो कभी घर था अपना | Ghar Par Kavita

किसी कारणवश जब हम अपने घर को कई बरसों के लिए छोड़ के चले जाते हैं तो उसकी हालत एक खंडहर की तरह हो जाती है । उसी खंडहर हो चुके घर की कुछ पुरानी यादों को समेटे हुए घर की याद पर कविता :-

घर की याद पर कविता

घर की याद पर कविता

इस खंडहर को याद करो
जो अपना घर कहलाता था।

हँसी-ठहाके चहल-पहल
भरा पुरा परिवार था,
बुजुर्गी छाया रुपी साया
स्वार्थपरता का अभाव था,
टूटी परंपरा की लडी़याँ
जीना सबने छोड़ दिया,
रिश्तों पर पड़ी दरारे बोली
उस घर से कोई नाता था,

खिड़की-दरवाजे मेज-कुर्सियाँ
सुने पड़े उन झूलों को देखो,
दफन हुई रिश्तों की डो़री
मन में मरता संवेदन देखो,
धूल, आँधीयाँ, ओले, बारिश
पीपल की टहनियाँ छाता था,
गुम हुई किलकारीयों का
सन्नाटा सबको भाता था।

इस खंडहर को याद करो
जो अपना घर कहलाता था।

आँखें मूंद ख्वाब सजाकर
पूरा करने चले गए,
पीठ पे अपने बाँधा झोला
घर से दूर निकल गए,
भूल गए बचपन को अपने
कामों को जब गले लगाया,
मीलों चले कमाने पैसा
मजबूरियों का हार बनाया,

रोकर ज्यादा हँसकर थोड़ा
घर ऐसे छोड़ा जाता था,
बदले परिजन समाज गवाह है
जब जब ठोकर खाता था,
पनाह नहीं मिलती थी हमको
वो खंडहर ही याद आता था,
गुम हुई किलकारीयों का
सन्नाटा सबको भाता था।

इस खंडहर को याद करो
जो अपना घर कहलाता था।

जब जीवन यापन से ज्यादा
संचय की लत लग जाती थी,
तब मकड़ी जाले बुनती थी
घर की छत ढ़ह जाती थी,
मूक स्मृति का रुद्ध क्रन्दन
मृत दिनों की समाधि पाती थी,
गाँवों की जटिलता त्याग उसे
शहरों की चकाचौंध भाती थी,

जब पितरों का मन थर्राता था
आँसू दीवारों को क्षरणाता था,
जब दीमक खाती नीवों को
अस्तित्व धरा रहा जाता था,
सृष्टि पीड़ा का दोष नहीं ये
घर खुद खंडहर बन जाता था,
गुम हुई किलकारीयों का
सन्नाटा सबको भाता था।

इस खंडहर को याद करो
जो अपना घर कहलाता था।

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प्रवीणमेरा नाम प्रवीण हैं। मैं हैदराबाद में रहता हूँ। मुझे बचपन से ही लिखने का शौक है ,मैं अपनी माँ की याद में अक्सर कुछ ना कुछ लिखता रहता हूँ ,मैं चाहूंगा कि मेरी रचनाएं सभी पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनें।

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