गौतम बुद्ध का जीवन परिचय | Gautam Buddha Story In Hindi

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय – गौतम बुद्ध कौन थे

गौतम बुद्ध “ बुद्ध धर्म ”के संस्थापक थे। उनका कहना था कि लालच, क्रोध, और मोह के कारण ही मानव सांसारिक बन्धनों में बंधा हुआ है। जिस से उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती। मात्र तपस्या और साधना ही जीवन-मरण के इस चक्कर से हमें मुक्ति दिला सकती है। कैसी रही उनकी जीवन यात्रा आइये जानते हैं ” गौतम बुद्ध का जीवन परिचय ” में।

गौतम बुद्ध जयंती

बुद्ध का जन्म शाक्य वंश में कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी गाँव में 563 ई.पू. हुआ था। बुद्ध के जन्मदिन की सही तारीख एशियाई लूनिसोलर कैलेंडर पर आधारित है। जिसके अनुसार इनका जन्म बैसाख महीने की पूर्णिमा को हुआ था। जन्म के पांचवें दिन हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका नामकरण हुआ। उनका नाम रखा गया “सिद्धार्थ।”

उनके जन्म समारोह के दौरान ही उस समय के विद्वानों ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि सिद्धार्थ या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा।

गौतम के माता-पिता

सिद्धार्थ के पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम महामाया था। इनके जन्म के सात दिन बाद ही इनकी माँ की मृत्यु हो गयी। जिसके बाद इनका पालन-पोषण इनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया।

सिद्धार्थ से बुद्ध बनना

विद्वानों की भविष्यवाणी के अनुसार सिद्धार्थ कहीं राज-पाठ का त्याग न कर दें इसलिए उनके पिता ने इस बात का ख़ास ध्यान रखा कि सिद्धार्थ को किसी भी प्रकार कोई दुःख न पहुंचे। उन्होंने राजमहल में ही सिद्धार्थ के लिए ऐसी सुख-सुविधाओं का प्रबंध किया जिस से उनमें संसार के प्रति मोह बना रहे।

इसी के चलते ही महाराज शुद्धोधन ने 547 ई.पू. में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा नाम की राजकुमारी से करवा दिया। विवाह के बाद भी उन्होंने खुद पर कभी भी भोग-विलास को हावी नहीं होने दिया।

एक दिन जब वे अपने रथ पर नगर की सैर पर निकले तो उन्होंने जीवन की सच्चाई को देखा। उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक सन्यासी और एक मृतक व्यक्ति को देखा। उन्हें देख कर वे विचलित हो गए। मनुष्य आमतौर पर अपने जीवन में ये सब देखने का आदी होता है। लेकिन सिद्धार्थ के लिए ये बिलकुल नई बात थी।

उन्होंने राजमहल में कभी भी ऐसे दृश्य नहीं देखे थे। उन्हें यह जीवन एक छल लगने लगा। जीवन की सच्चाई देख सिद्धार्थ इतना घबरा गए कि उन्होंने सन्यास लेने का फैसला ले लिया। फिर एक रात 29 वर्ष की आयु में वे अपनी पत्नी, बेटे व पूरे साम्राज्य को त्याग  कर चले गए।

इसके बाद उन्होंने वह सब कुछ किया जो उस समय के सन्यासी करते थे। मगर उन्हें आनंद की प्राप्ति नहीं हुयी। मन में अभी भी अशांति बनी हुयी थी। शरीर को कष्ट देने के कारण वे एक नर कंकाल बन चुके थे।

अब उन्हें यह ज्ञान हुआ कि शरीर को कष्ट देकर सत्यता की खोज नहीं की जा सकती। इस से तो वे मानसिक और बौद्धिक स्तर पर भी दुर्बल हो जाएँगे। अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि अब जब तक उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती वे एक ही स्थान पर रहेंगे।

इस प्रकार “गया” में रहते हुए एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी। जिसके बाद वह वृक्ष “बोधिवृक्ष” के नाम से जाना जाने लगा।

सिद्धार्थ से बुद्ध बनने के बाद उन्होंने सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। जिसे “धर्म चक्र प्रवर्तन” के नाम से जाना जाता है। यह उपदेश उन्होंने 5 भिक्षुओं ( कौण्डिन्य, अस्सजि, वप्प, महानाम, भद्दिय ) को दिया था। इन पाँच भिक्षुओं को ‘पञ्चवर्गिक’ कहते हैं।

यह उपदेश उन्होंने आषाढ़ मास की पूर्णिमा को दिया गया था। इसलिए बौद्ध धर्म में आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” के रूप में मनाया जाता है।

अब वे सत्य के प्रचार-प्रसार में लग गए और सबको ज्ञान बाँटने लगे।

गौतम बुद्ध का अंतिम उपदेश

सबको उपदेश देते हुए एक दिन वे एक लुहार के घर रुके। जिसका नाम चुंडा था। वहां भोजन करने के बाद जब बुद्ध ने यात्रा आगे बढ़ाई तब उनकी तबियत ख़राब हो गयी। जिस कारण उन्हें नेपाल के पूर्वी क्षेत्र कुशीनगर में रुकना पड़ा।

यहीं 80 वर्ष की आयु  में बुद्ध ने अपने शिष्यों को अंतिम उपदेश दिया। बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश में ‘अप्प दीपो भव’ ( अपने दीपक स्वयं बनो ) कहा। इसके बाद उन्होंने इस संसार का को त्याग दिया।

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