सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास :- भारत की प्राचीन सभ्यता की सम्पूर्ण जानकारी

प्रशासन एवं आर्थिक जीवन

कृषि

सिन्धु सभ्यता के समय लोगों को कृषि के लिए भरपूर सिंचाई साधन प्राप्त थे। यह प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र था। सिंधु घाटी सभ्यता के समय मुसलाधार बारिश व सिन्धु जैसी सहायक नदियाँ थीं जो कृषि के लिए उपजाऊ मिटटी अपने साथ बहा कर लाती थीं। जो गेहूँ व जौ की खेती में सहायक थीं।

मोहनजोदड़ो के आस-पास के क्षेत्र को सिंध का बगीचा भी कहा जाता है। सिन्धु सभ्यता के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवम्बर में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अगली बाढ़ आने से पहले अप्रैल में गेहूँ व जौ की फसल काट लेते थे। यहाँ से ओई फावड़ा या फाल तो नहीं मिला हा परन्तु कालीबंगा में एक हड़प्पा सभ्यता से जो हलरेखा प्राप्त हुयी है उससे पता चलता है कि राजस्थान में इस काल में हल चलाया जाता था।

सिन्धु घाटी सभ्यता में प्राप्त अवशेषों से पता चला है कि कृषि में लोग गेहूँ, जौ, तरबूज, खरबूजा, कपास, मटर, सरसों, काला तिल उगाते थे। कृषि के लिए वे लोग पत्थर व लकड़ी से बने औजार इस्तेमाल करते थे।बलूचिस्तान व अफगानिस्तान के क्षेत्र में उस समय बाँध बना कर पानी को भविष्य में उपयोग के लिए संरक्षित कर के रखते थे। लेकिन यहाँ नहर होने का कोई सुराग नहीं मिला है। वे दो प्रकार के गेहूँ और जो उगाते थे।

बनावली से पर्याप्त मात्र में जौ और सरसों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। लोथल में प्राप्त अवशेष कुछ अलग थे, जिनसे पता चलता है कि 1800 ई.पू. में लोग चावल (धान) की खेती करते थे। खाद्य पदार्थ को संरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े भंडारगृह भी मोहनजोदड़ो, हड़प्पा व संभवतः कालीबंगा से प्राप्त हुए थे। कालीबंगा के लोग कपास उगाने वाले प्रथम लोग थे। सिंध नदी के पास रहने के कारण ग्रीक और यूनानी लोग उन्हें सिन्धु कह कर बुलाते थे। जो आगे चल कर हिन्दू शब्द में बदल गया। लोथल से आटे की चक्की, चावल, जौ और रोजड़ी से रागी व ज्वार प्राप्त हुए हैं।

पशुपालन

हड़प्पा सभ्यता के लोग कृषि, व्यापर, भोजन व अन्य कार्यों के लिए पशुपालन करते थे। जानवरों में हठी, शेर, बिल्ली, कुत्ता, भैंस के अवशेष प्राप्त होते हैं किन्तु गाय, ऊँट, घोड़ा आदि के बारे में ये लोग नहीं जानते थे।

बैल, भैंस, बकरी, भेड़ व सूअर आदि घरेलु या पालतू जानवरों में आते थे। कूबड़ वाले सांड का अवशेष हड़प्पा से प्राप्त हुए हैं।

शिल्पकला व उद्योग

सिंधु घाटी सभ्यता शिल्पकला व उद्योगइस समय में लोग मनका बनाने सीप बनाने, मृदभांड, कपड़ा उद्योग में कार्यरत रहते थे। कपड़ा उद्योग में उन्हें साधारण सूती वस्त्र व कशिदाकारी वाले कपड़े बनाते थे। मनका बनाने के अवशेष में मोतियों के अवशेष लोथल व चनहूदड़ो से प्राप्त होते हैं। सीपों के अवशेष बालकोट व लोथल से प्राप्त हुए हैं। मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) में लाल मिट्टी व काली मिट्टी के बर्तनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मोहनजोदड़ो से सूती वस्त्रों के अवशेष प्राप्त ही हैं। उस समय लोग सोने-चांदी व एनी बेशकीमती पत्थरों के बने हुए गहने पहना करते थे।

खनिजों के अवशेष जिन जगहों से प्राप्त हुए हैं वे निम्न हैं :-

टीन – अफगानिस्तान, ईरान
चाँदी – ईरान
सोना – कोलार, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान
बतख्शा – अफगानिस्तान
पत्थर – महारष्ट्र
सीसा – अफगानिस्तान
शिलाजीत – हिमालय
तांबा – खेतड़ी (राजस्थान)

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग निम्न देशों के साथ व्यापर करते थे :-

1. अफगानिस्तान व ईरान
2. पर्शिया की खाड़ी (दिलमुन)
3. मिस्त्र
4. मेसोपोटामिया

व्यापर एवं वाणिज्य

यहाँ के लोग पत्थर, धातु, शल्क/हड्डी आदि का व्यापर करते थे। सील एकरूप लिपि व मानकीकृत मापतोल के प्रमाण मिले थे। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग पहिये से परिचित थे। वे अफगानिस्तान व ईरान से व्यापर करते थे। वे नव बनाने के कार्य से भी परिचित थे।

राजनैतिक जीवन

इतनी विकसित नगरीय सभ्यता से पता चलता है कि इस समय भी राजनैतिक सत्ता तो रही होगी पर इसका कोई पुख्ता सबूत अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है कि उस समय के शासक किस तरह की शासन प्रणाली से शासन करते रहे होंगे। हड़प्पा सभ्यता से दुर्ग व नगर क्षेत्र के अवशेष प्राप्त हुए हैं। जिससे यह पता चलता है कि दुर्ग क्षेत्र में शासक व उच्च वर्ग के लोग रहते होंगे और नगर क्षेत्र में सामान्य वर्ग रहता होगा और शासक कर के रूप में अनाज लेते रहे होंगे।

धार्मिक जीवन

सिन्धु घाटी सभ्यता में मंदिर के कोई अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं। वे लोग मातृ पूजा पशुपतिनाथ व कूबड़ वाले एक श्रृंगी बैल की पूजा करते थे। मातृपूजा के अवशेष में एक स्त्री जिसके गर्भ से एक पौधा निकल रहा है, के अवशेष प्राप्त हुए हैं। जिससे यह पता चलता है कि वे लोग प्रकृति की देवी की पूजा करते थे। इसलिए हड़प्पा के लोग पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानकर पूजा करते थे जैसा कि मिस्त्र के लोग नील नदी की देवी ईसिस की पूजा करते थे।

सिन्धु सभ्यता से प्राप्त सील से पता चलता है कि वे लोग पशुपतिनाथ भगवान् की पूजा करते थे क्योंकि सील में तीन सींग वाले एक योगी ध्यानमुद्रा में बैठे हुए हैं और उनके बांये हाथ की तरफ भैंस व गैंडा और दांये हाथ की तरफ हाथी व शेर उनकी ओर देख रहे हैं। जिससे पता चलता है कि वे उन योगी की पूजा कर रहे हैं।

एक सील और प्राप्त हुयी है जिसमें पीपल के पत्तों के निशान प्राप्त हुए हैं। मतलब वे पेड़ों की भी पूजा करते थे। वे सांप, पेड़, सूर्य व जल की पूजा भी करते थे।

हड़प्पा सभ्यता की लिपि

हड़प्पा के लोगों ने मेसोपोटामिया के लोगों की तरह ही लिखने की कला सीखी। लिपि के अवशेष सर्वप्रथम 1853 में प्राप्त हुए। इसकी पूरी लिपि 1923 में प्राप्त हुयी। चित्राक्षर लिपि जोकि सिंधु सभ्यता के अवशेषों से प्राप्त हुयी है इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। हड़प्पा सभ्यता की लिपि के अब तक 4000 अवशेष अब तक प्राप्त हुए हैं। इन लिपि में सबसे ज्यादा अंग्रेजी के ‘U’ अक्षर का ज्यादा उपयोग हुआ है। चित्रों में सबसे ज्यादा मछली का चित्र प्राप्त हुआ है।

सिंधु घाटी सभ्यता का पतन

सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन का अब तक कोई कारण पता नहीं चला है। अलग-अलग जगहों से प्राप्त अवशेषों से खोजकर्ताओं ने अलग-अलग मत दिए हैं। भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार ये सभ्यता बाढ़ के कारण, वातावरण में परिवर्तन बताया जाता है। कामादेज ने इस सभ्यता के अंत का कारण मलेरिया बताया है वहीं निमिथा देव ने प्राकृतिक आपदा को मुख्या कारण बताया है।

तो दोस्तों ये था ‘ सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास ‘ जो हमें भेजा है चित्रा मालविया जी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से। आशा करते हैं कि आपको सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास लेख से सिन्धु घटी सभ्यता के बारे में सारी जानकारी प्राप्त हो गयी होगी। तो आइये जानते हैं लेखिका के बारे में।


चित्रा मालवीयामेरा नाम चित्रा मालवीया है। मैं इंदौर, मध्य प्रदेश से हूँ। मुझे नई-नई भाषाएँ सीखने, नॉवल पढने और नए-नए लोगों से मिलने व उनकी संस्कृति के बारे में जानने का शौक है।

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