कबीर के दोहे | संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित। भाग – १

41. यह तन कांचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ।
टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ।।

अर्थ :- यह शरीर मिटटी के कच्चे घड़े के समान है जिसे हम अपने साथ लिये फिरते है और काल रूपी पत्थर का एक ही धक्का लगा, मिटटी का शरीर रूपी घड़ा फुट गया। हाथ कुछ भी न लगा अर्थात सारा अहंकार बह गया। खाली हाथ रह गये।


42. कोई आवै भाव लै, कोई अभाव ले आव।
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव।।

अर्थ :- कोई व्यक्ति श्रद्धा और प्रेम भाव लेकर संतों के निकट जाता है तो कोई बिना भाव के जाता है। किन्तु संतजनों की दृष्टि में कोई अन्तर नहीं पड़ता  वे दोनों को समान दृष्टी से देखते है। न तो वे किसी के प्रेम भाव को गिनते है और न ही अभाव को अर्थात अपनी दया दृष्टी से दोनों को पोषण करते हैं।


43. काल पाय जग उपजो, काल पाय सब जाय।
काल पाय सब बिनसिहैं, काल काल कहं खाय।।

अर्थ :- काल के क्रमानुसार प्राणी की उत्पत्ति होती है और काल के अनुसार सब मिट जाते हैं। समय चक्र के अनुसार निश्चित रुप से नष्ट होना होगा क्योंकि काल से निर्मित वस्तु अन्ततः कालमें ही विलीन हो जाते हैं।


44. प्रेम पियाला सो पिये, शीश दच्छिना देय।
लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय।।

अर्थ :- प्रेम का प्याला वही प्रेमी पी सकता है जो गुरु को दक्षिणा स्वरूप अपना शीश काटकर अर्पित करने को सामर्थ्य रखता हो। कोई लोभी, संसारी कामना में लिप्त मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता वह केवल प्रेम का नाम लेता है। प्रेम कि वास्तविकता का ज्ञान उसे नहीं है।


45. कागा कोका धन हरै, कोयल काको देत।
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनो करि लेत।।

अर्थ :- कौवा किसी का धन नहीं छीनता और न कोयल किसी को कुछ देती है किन्तु कोयल कि मधुर बोली सबको प्रिय लगती है। उसी तरह आप कोयल के समान अपनी वाणी में मिठास का समावेश करके संसार को अपना बना लो।


46. जाका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध।
अनेधे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।।

अर्थ :- यदि गुरु ही अज्ञानी है तो शिष्य ज्ञानी कदापि नहीं हो सकता अर्थात शिष्य महा अज्ञानी होगा जिस तरह अन्धे को मार्ग दिखाने वाला अन्धा मिल जाये वही गति होती है। ऐसे गुरु और शिष्य काल के चक्र में फंसकर अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते है।



47. भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेश सुगम नित सोय।
भक्ति जु न्यारी भेष से, यह जानै सब कोय।।

अर्थ :- सच्ची भक्ति का मार्ग अत्यन्त कठिन है। भक्ति मार्ग पर चलने वाले को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु भक्ति का वेष धारण करना बहुत ही आसान है। भक्ति साधना और वेष धारण करने में बहुत अन्तर है। भक्ति करने के लिए ध्यान एकाग्र होना आवश्यक है जबकि वेष बाहर का आडम्बर है।


48. सांचै कोई न पतीयई, झूठै जग पतियाय।
पांच टका की धोपती, सात टकै बिक जाय।।

अर्थ :- बोलने पर कोई विश्वास नहीं करता, सरे संसार के लोग बनावटीपण लिये हुए झूठ पर आँखे बन्द करके विश्वास करते है जिस प्रकार पाँच तर्क वाली धोती को झूठ बोलकर दुकानदार सात टके में बेच लेता है।


49. अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार।
मेरा चोर मुझको मिलै सरबस डारु वार।।

अर्थ :- संसार के लोग अपने अपने चोर को मार डालते है परन्तु मेरा जो मन रूपी चंचल चोर है यदि वह मुझे मिल जाये तो मैं उसे नहीं मारुगा बल्कि उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दूँगा अर्थात मित्र भाव से प्रेम रूपी अमृत पिलाकर अपने पास रखूँगा।


50. साधु संगत परिहरै, करै विषय को संग।
कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग।।

अर्थ :- जो मनुष्य ज्ञानी सज्जनों की संगति त्यागकर कुसंगियो की संगति करता है वह सांसारिक सुखो की प्राप्ती के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है। वह ऐसे मूर्ख  की श्रेणी में आता है जो बहते हुए गंगा जल को छोड़ कर कुआँ खुदवाता हो।


51. कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खंड।
सद्गुरु की किरपा भई, नातर करती भांड।।

अर्थ :- माया के स्वरुप का वर्णन करते हुए संत कबीर दास जी कहते है कि माया बहुत ही लुभावनी है। जिस प्रकार मीठी खांड अपनी मिठास से हर किसी का मन मोह लेती है उसी प्रकार माया रूपी मोहिनी अपनी ओर सबको आकर्षित कर लेती है। वह तो सद्गुरु की कृपा थी कि हम बच गये अन्यथा माया के वश में होकर अपना धर्म कर्म भूलकर भांड की तरह रह जाते।


52. भक्ति भेष बहु अन्तरा, जैसे धरनि आकाश।
भक्त लीन गुरु चरण में, भेष जगत की आश।।

अर्थ :- भक्ति और वेश में उतना ही अन्तर है जितना अन्तर धरती और आकाश में है। भक्त सदैव गुरु की सेवा में मग्न रहता है उसे अन्य किसी ओर विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता किन्तु जो वेशधारी है अर्थात भक्ति करने का आडम्बर करके सांसारिक सुखो की चाह में घूमता है वह दूसरों को तो धोखा देता ही है, स्वयं अपना जीवन भी व्यर्थ गँवाता है।



53. भक्ति पदारथ तब मिले, जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय।।

अर्थ :- कबीर जी कहते है कि भक्ति रूपी अनमोल तत्व की प्राप्ति तभी होती है जब जब गुरु सहायक होते है, गुरु की कृपा के बिना भक्ति रूपी अमृत रस को प्राप्त कर पाना पूर्णतया असम्भव है।


54. भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव।
परमारथ के कराने, यह तन रहो कि जाव।।

अर्थ :- भक्तो की यह रीति है वे अपने मन एवम इन्द्रिय को पूर्णतया अपने वश में करके सच्चे मन से गुरु की सेवा करते है। लोगो के उपकार हेतु ऐसे सज्जन प्राणी अपने शारीर की परवाह नहीं करते। शारीर रहे अथवा मिट जाये परन्तु अपने सज्जनता रूपी कर्तव्य से विमुख नहीं होते।


55. और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निह्कर्म।
कहै कबीर पुकारि के, भक्ति करो ताजि भर्म।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि आशक्ति के वश में होकर जीव जो कर्म करता है उसका फल भी उसे भोगना पड़ता है किन्तु भक्ति ऐसा कर्म है जिसके करने से जीव संसार के भाव बन्धन से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है अतः हे सांसारिक जीवों। आशक्ति , विषय भोगों को त्यागकर प्रेमपूर्वक भक्ति करो जिससे तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण होगा।


56. गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि गढि काढैं खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै  चोट।।

अर्थ :- संसारी जीवों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं- गुरु कुम्हार है और शिष्य मिट्टी के कच्चे घडे के समान है। जिस तरह घडे को सुंदर बनाने के लिए अंदर हाथ डालकर बाहर से थाप मारता है ठीक उसी प्रकार शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अंतर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराईयो कों दूर करके संसार में सम्माननीय बनाता है।


57. गुरु मुरति आगे खडी, दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटी जाहिं।।

अर्थ :- आत्म ज्ञान से पूर्ण संत कबीर जी कहते हैं – हे मानव। साकार रूप में गुरु कि मूर्ति तुम्हारे सम्मुख खडी है इसमें कोई भेद नहीं। गुरु को प्रणाम करो, गुरु की सेवा करो। गुरु दिये ज्ञान रुपी प्रकाश से अज्ञान रुपी अंधकार मिट जायेगा।


58. जैसी प्रीती कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय।
कहैं कबीर ता दास का, पला न पकडै कोय।।

अर्थ :- हे मानव, जैसा तुम अपने परिवार से करते हो वैसा ही प्रेम गुरु से करो। जीवन की समस्त बाधाएँ मिट जायेंगी। कबीर जी कहते हैं कि ऐसे सेवक की कोई मायारूपी बन्धन में नहीं बांध सकता, उसे मोक्ष प्राप्ती होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।



59. कबीर यह तन जात है, सकै तो ठौर लगाव।
कै सेवा कर साधु की, कै गुरु के गुन गाव।।

अर्थ :- अनमोल मनुष्य योनि के विषय में ज्ञान प्रदान करते हुए सन्त जी कहते है कि हे मानव! यह मनुष्य योनि समस्त योनियों उत्तम योनि है और समय बीतता जा रहा है कब इसका अन्त आ जाये , कुछ नहीं पता। बार बार मानव जीवन नहीं मिलता अतः इसे व्यर्थ न गवाँओ। समय रहते हुए साधना करके जीवन का कल्याण करो। साधु संतों की संगति करो,सद्गुरु के ज्ञान का गुण गावो अर्थात भजन कीर्तन और ध्यान करो।


60. भक्ति दुवारा सांकरा, राई दशवे भाय।
मन तो मैंगल होय रहा, कैसे आवै जाय।।

अर्थ :- मानव जाति को भक्ति के विषय में ज्ञान का उपदेश करते हुए कबीरदास जी कहते है कि भक्ति का द्वार बहुत संकरा है जिसमे भक्त जन प्रवेश करना चाहते है। इतना संकरा कि सरसों के दाने के दशवे भाग के बरोबर है। जिस मनुष्य का मन हाथी की तरह विशाल है अर्थात अहंकार से भरा है वह कदापि भक्ति के द्वार में प्रवेश नहीं कर सकता।

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