होली पर निबंध – रंगों का त्यौहार, इतिहास और जानकारी | Holi Essay In Hindi

आप पढ़ रहे हैं होली पर निबंध :-

भारत के अलग अलग राज्यों में होली के विभिन्न रूप

लट्ठमार होली

राधा जी की जन्मस्थली बरसना की होली विश्व प्रसिद्द है। यह लट्ठमार होली  फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है।  माना जाता है कृष्ण जी होली मानाने के लिए अपने साथी ग्वालों के साथ बरसना जाया करते थे। वहां राधा जी की सखियाँ हंसी-ठिठोली करने के लिए उन पर लाठियां बरसाया करती थीं। जिस से बचने के लिए ग्वाले लाठीयों और ढालों का प्रयोग करते थे। वही परंपरा आज भी निभाई जाती है।

नंदगांव से ग्वाल बाल होली खेलने के लिए पिचकारियों और रंगों के साथ राधा रानी के गाँव बरसना जाते हैं। वहां की औरतें अपने गाँव के आदमियों पर लाठियां नहीं बरसातीं। लाठियों के बीच में एक दूसरे के ऊपर रंग भी डाला जाता है। धूम-धाम तो ऐसी होती है कि विदेशों से लोग आते हैं बरसना की ये लट्ठमार होली देखने।

पंजाब की होली – होला मोहल्ला

punjab ki holi hola mohalla

होली का महत्त्व जितना हिन्दुओं में है उतना ही दूसरे धर्म में भी है लेकिन कारन भिन्न हो सकते हैं। पंजाब में होली के अगले दिन एक बहुत ही विशाल महोत्सव होता है जिसे होला मोहल्ला के नाम से जाना जाता है।

होली के रूप को बदल कर होला मोहल्ला करने के पीछे दशम गुरु गोविन्द सिंह जी का एक खास उद्देश्य था। वह कारन यह था की आनंदपुर में होली को पौरुष के प्रतीक के रूप में मनाया जाता था। इसलिए होली का नाम स्त्रीलिंग से बदल कर पुल्लिंग कर दिया गया। आनंदपुर साहिब का स्थान सिखों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

होला मोहल्ला का उत्सव छः दिनों तक चलता है। जिसमे एक विशाल मेले का आयोजन होता है और उसके साथ ही निहंग अपने पौरुष और अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। जुलूस तीन काले बकरों की बलि से प्रारंभ होता है। एक ही झटके से बकरे की गर्दन धड़ से अलग करके उसके मांस से ‘महा प्रसाद’ पका कर वितरित किया जाता है।



पांच प्यारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं और जुलूस में निहंगों के अखाड़े नंगी तलवारों के करतब दिखते हुए बोले सो निहाल के नारे बुलंद करते हैं। यह जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है।

इतना ही नहीं लोगों के विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है।  यहाँ आये हुए लोगों के लिए विशाल लंगर का आयोजन होता है। पंजाब के कोने-कोने से लोग यहाँ मेला देखने आते है। इस मेले की शुरुआत स्वयं गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी।

बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु का जन्मदिन

होली से एक दिन पहले बंगाल में दोल यात्रा निकली जाती है। इस दिन महिलाएँ लाल किनारी वाली पारंपरिक सफ़ेद साड़ी पहन कर शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं और प्रभात-फेरी (सुबह निकलने वाला जुलूस) का आयोजन करती हैं। भजन-कीर्तन किया जाता है। चैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित राधा-कृष्णा संगीत ज्यादा सुना और गाया जाता है।

राधा कृष्णा की मूर्ती रख कर होली खेली जाती है। शान्तिनिकेतन में रबिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा चलायी हुयी वसंत परंपरा आज भी चलती है। विश्वभारती विश्वविद्यालय में सभी लड़के और लड़कियां पारंपरिक तरीके से होली मनाते हैं। इस उत्सव में सभी अध्यापक व अन्य सदस्य भी हिस्सा लेते हैं।

भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक चैतन्य महाप्रभु का जन्म दिवस भी इसी दिन बंगाल में मनाया जाता है।

मणिपुर की होली – याओसांग

फाल्गुन महीने के दिन मणिपुर में याओसांग नाम से एक त्यौहार मनाया जाता है। और सबसे रोचक बात यह है कि धुलेंडी वाले दिन को यहाँ ‘पिचकारी’ कहा जाता है। लेकिन ये याओसांग है क्या?

याओसांग है एक छोटी सी झोपड़ी। जी हाँ, छोटी सी झोपड़ी।  पूर्णिमा के अपर काल में यह झोपडी हर गाँव में मौजूद नदी व सरोवर के किनारे बनायी जाती है। इस झोपड़ी में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ती स्थापित की जाती है। पूजा-अर्चना के बाद इस होपड़ी को अग्नि देव के हवाले कर दिया जाता है।

सबसे रोचक बात यह है कि इस झोपडी में लगने वाली सामग्री 7 से 13 वर्ष के बच्चे आस-पास के घरों से चोरी कर के लाते हैं। इसकी राख को माथे पर लगाया जाता है और कुछ लोग इसे घर भी लेकर जाते हैं। उसे बाद रंगों से सारा माहौल रंग-बिरंगा हो जाता है। बच्चों द्वारा घर-घर जाकर खाने-पीने की चीजें इकट्ठी की जाती हैं। इन चीजों को एकत्रित कर विशाल सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।



महाराष्ट्र की होली – रंग पंचमी

महाराष्ट्र में होली के बाद भी रंग खेलने की परम्परा है। यह त्यौहार वहां पंचमी के दिन मनाया जाता है। लेकिन इस होली की ख़ास बात यह है कि इसमें बस सूखा गुलाल ही प्रयोग किया जाता है। कई स्वादिष्ट पकवान बनाये जाते हैं। जिनमें पूरनपोली नाम का पकवान अवश्य होता है। मछुवारे अपनी मस्ती बस्ती में नाचते-गाते और मौज मानते हैं। एक दुसरे से मिलने उनके घर जाते हैं।

गोवा की होली – शिमगो

वसंत के आगमन के स्वागत में गोवा के लोग रंगों से खेलते हैं। रंगों के इस खेल को कोंकणी भाषा ( जो कि गोवा की भाषा है ) में शिमगो या शिमगोत्सव कहते हैं।  इस दिन लोग भोजन में शगोटी ( तीखी मुर्गी या मटन ) खाते हैं। यहाँ के उत्सव में ख़ास बात होती है एक विशालकाय जुलूस में।

पंजिम का यह विशालकाय जुलूस अपनी मंजिल पर पहुँच कर सांस्कृतिक कार्यक्रम में परिवर्तित हो जाता है। इस कार्यक्रम में साहित्यिक, सांस्कृतिक और पौराणिक नाटक व संगीत का मंचन किया जाता है। लेकिन इसमें कोई धर्म या जाति बंधन नहीं होता।

तमिलनाडु की होली – कमन पोडिगई

प्राचीन काल में देवी सती के मृत्युलोक चले जाने के बाद भगवान् शंकर को बहुत क्रोध आया और वे व्यथित हुए मानसिक शांति की  प्राप्ति के लिए उन्होंने ध्यान मुद्रा लगा ली। कई वर्षों पश्चात पर्वत राज की पुत्री पार्वती शिव को अपने वर के रूप में पाने के लिए तपस्या करने लगी। लेकिन बिना प्रभु शंकर के ध्यान से बहार आये ये संभव न था। अतएव सबने मिलकर विचार किया की काम देव को यह कार्य सौंपा जाए।

कामदेव ने अपने कार्य की पूर्ती के लिए भगवान् शिव पर कामबाण छोड़ दिया। तब एक बार फिर क्रोध में आए शिव जी के तीसरे नेत्र से कामदेव जल कर भस्म हो गए। लेकिन बाण तो असर कर चुका था। इस लिए शंकर भगवाना और देवी पार्वती जी का विवाह हो गया। कामदेव की पत्नी रति के विलाप के कारन शिव जी ने काम देव को दुबारा जीवन दिया।

वह दिन होली का ही दिन था। रति के विलास को आज भी संगीत के रूप में गाया जाता है। ऐसा मन जाता है की काम देव इस दिन भस्म होते हैं। इसलिए आग में चन्दन की लकडियाँ डाली जाती हैं जिससे कामदेव को भस्म होने में कोई तकलीफ न हो। और उसके बाद कामदेव के पुनः जीवित होने पर रंगों का त्यौहार मनाया जाता है।

अन्य राज्यों की होली

छत्तीसगढ़ में होली के दिन फाग गीत का प्रचलन है, जिसमे युवाओ की टोली रंगों से नहाये हुए होली के गीत गाते हुए धमाल मचाते है। राजस्थान में इस अवसर पर विशेष रूप से जैसलमेर के मंदिर महल में लोकनृत्यों में डूबा वातावरण देखते ही बनता है जब कि हवा में लाला नारंगी और फ़िरोज़ी रंग उड़ाए जाते हैं।

मध्यप्रदेश के नगर इंदौर में इस दिन सड़कों पर रंग मिश्रित सुगंधित जल छिड़का जाता है। लगभग पूरे मालवा प्रदेश में होली पर जलूस निकालने की परंपरा है। जिसे गेर कहते हैं। जलूस में बैंड-बाजे-नाच-गाने सब शामिल होते हैं। नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है।



होली का महत्व

होली का त्यौहार हर किसी के जीवन में बहुत महत्त्व रखता है। होलिका दहन के रूप में ये पाप पर पुण्य की विजय का प्रतीक है। इसी दिन से हिन्दू धर्म के अनुसार नव वर्ष आरंभ होता है। ये त्यौहार ही होते हैं जो सबको आपस में मिला देते हैं। इससे इनका महत्त्व और बढ़ जाता है। हर त्यौहार एक सन्देश के साथ अत है।

रंगों का यह त्यौहार भी यही सन्देश लेकर आता है की जैसे सब के चेहरे रंग जाने पर एक से नजर आते हैं। उसी तरह हमें अपने जीवन में सबको बराबरी की नजर से देखना चाहिए और सदा हँसते मुस्कुराते रहना चाहिए। तभी इस त्यौहार का अर्थ पूर्ण होगा।

आपको होली की जानकारी देता ये लेख होली पर निबंध कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

धन्यवाद।

अभी शेयर करे
WhatsAppFacebookTwitterGoogle+BufferPin It

हमारे सब्सक्रिप्शन पालिसी जानिए या अपना सब्सक्रिप्शन अपडेट कीजिये।

2 Comments

Add Comment