एक गरीब मजदूर की मार्मिक कहानी – बदला :-The Silent Revenge

इतना कह कर घनश्याम दास ने अपनी जेब से  २०० रुपए निकाल कर कहा कि अभी तो वो  इतनी ही मदद कर सकते हैं। नंदू ने पैसे पकड़ते हुए घनश्याम  दास का धन्यवाद किया और घर की ओर चल दिया। घनश्याम दास ख़ामोशी से उसकी ओर देख रहे थे लेकिन उनको भी किसी अदृश्य ज़ंजीर ने जकड़ रखा था जिसे वो तोड़ना तो चाहते थे लेकिन तोड़ ना सके।

धुंध चारों ओर छा  गयी थी और पांच कदम से ज्यादा दूर देखना असंभव था।  थका हारा नंदू घर पहुंचा तो देखा कि उसकी पत्नी अपने बेटे छोटू के माथे पर कपड़े की पट्टी गीली कर के रख रही थी।
“अरे झुमरी, क्या हुआ छोटू को?”
“पता नहीं जी, कुछ दिनों से बुखार चढ़ता उतरता है। आ एक दम से ज्यादा हो गया। दोपहर से पट्टी बदल रहे हैं। बुखार है कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा।”

नंदू ने हाथ लगाया तो देखा कि छोटू का बदन आग की भट्ठी कि तरह तप रहा था। उसने जरा भी देर न की और गाँव के बाहर रहने वाले डॉक्टर के पास उसी समय ले गया।  ये डॉक्टर कोई पढ़ा लिखा डॉक्टर नहीं था।

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कई साल पहले ये अपने बाप के साथ शहर गया था और वहीं किसी डॉक्टर के पास काम करते-करते उसने काम सीख लिया था। फिर वो गाँव आकर रहने लग  गया था।  नंदू कि पत्नी कि दवाई भी इसी के यहाँ चल रही थी। नंदू डॉक्टर के पास पहुंचा तो कुछ देर जांचने के बाद उसने भी जवाब दे दिया और उन्हें जितनी जल्दी हो सके शहर जाने कि सलाह दी।

आधी रात होने वाली थी नंदू और उसकी पत्नी बेटे को उठाये खेतों कि पगडंडियों से होते हुए गाँव के बाहर बनी सड़क पर पहुँच गए और वहन से पैदल ही शहर के सरकारी अस्पताल में पहुँच गए। थोड़ी बहुत कागजी कार्यवाही के बाद उसके बेटे को दाखिल कर लिया गया।  लेकिन डॉक्टर का कोई अता-पता नहीं था। नंदू कई बार रिसेप्शन पर बैठी नर्स से पुछा जो साथ बैठी अपनी साथी के साथ गप्पे हांक रही थी। जब नंदू ने कई  बार उससे डॉक्टर के बारे में पूछा तो वो गुस्से में आ गयी और बोली,

“तू कोई मिनिस्टर है क्या जो डॉक्टर साहब अभी आ जाएंगे। इन्तजार करो सुबह तक आ जाएंगे।”
“लेकिन……लेकिन सुबह तक अगर उसे कुछ हो गया तो?”
“बहुत से मरीजों के साथ ऐसा होता है इसमें कोई नई बात नहीं होगी।”

इतना सुनते ही नंदू कि सारी हिम्मत जवाब दे गयी। अभी वो कंधे पर रखे अंगोछे को हाथ में पकड़ माथे का पसीना पोंछते हुए आगे बढ़ ही रहा था की अस्पताल में पसरे सन्नाटे के बीच एक दम शोर शुरू हो गया।,
“अरे हटो रास्ते से…..ले चलो जल्दी…..कोई डॉक्टर को फ़ोन लगाओ…….”



इसी बीच नंदू की नजर रिसेप्शन पर बैठी उस मैडम की तरफ गयी जो कुछ देर पहले बैठी गप्पें लड़ा रही थी अब डॉक्टर को फ़ोन कर के तुरंत आन इ को कह रही थी। नंदू समझ गया था कि किसी अमीर आदमी कि ही तबीयत ख़राब हुयी है इसीलिए इन सब में  ऐसी अफरा-तफरी मच गयी है। नंदू जाकर छोटू के पास बैठ गया।

“क्या कहा उन्होंने? डॉक्टर साहब आ रहे हैं ना ”
“हाँ….”
इसके आगे नंदू से बोला न गया उसे पता था कि डॉक्टर उसके बेटे के लिए नहीं आ रहे थे लेकिन झुमरी को वो ये बता नहीं सकता था। उसमें इतनी हिम्मत ना बची थी।

कुछ समय ऐसे ही बीत गया तभी एक आवाज आई,
“सुनिए….इधर आइये…..एक काम है।”
नंदू तुरंत उठ कर चला गया।
“सुनो एक लड़के का एक्सीडेंट हो गया है और काफी खून बह गया है। इस समय कहीं से खून मिल नहीं रहा। क्या तुम अपना खून दे सकते हो?”
“साहब ……मैं…….”
कहते हुए नंदू अपने बेटे कि तरफ देख रहा था। डॉक्टर सब समझ  गया और बोला, “देखो तुम अपने बेटे कि फिक्र मत करो हम उसका ख्याल रखेंगे।”

नंदू ने मुंह से तो कोई लफ्ज नहीं बोला लेकिन उसके उसके शांत रहने के अंदाज ने डॉक्टर को ये जरूर बता दिया कि उसे ये मंजूर है। नंदू बेबस सा खड़ा था। डॉक्टर ने आदेश जारी किया कि नंदू का ब्लड ग्रुप चेक किया जाए और अगर उस लड़के के ब्लड के साथ मैच हो जाये तो बिना किसी देरी खून चढ़ाने की  तैयारी की जाये।

सब कुछ सही हो जाने के बाद नंदू खून देकर बाहर आ चूका था। डाक्टरों ने उस लड़के की जान बचा ली थी। जैसे ही नंदू अपने बेटे के कमरे कि तरफ जा रहा था उसे रोने कि आवाजें सुनाई पड़ने लगी। वो एक दम घबरा गया। भागता हुआ वो कमरे में पहुंचा तो छोटू लेटा हुआ था।

“आपने इसे लाने में बहुत देर कर दी। डॉक्टर साहब ने दवाइयां दी थीं। इंजेक्शन भी लगाये थे। लेकिन हम  इसे बचा नहीं सके। ”
पास कड़ी नर्स के बोले गए इन शब्दों ने मानो किसी जहरीले बाण कि तरह नंदू को बेहोश कर दिया था। उसे अपने पैरों तले  ज़मीन नजर नहीं आ रही थी। आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। आंसू तो जैसे सूख ही गए थे। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।



“कहाँ है मेरा बेटा? उसे किसी अच्छे से हॉस्पिटल में क्यूँ नहीं लेकर गए? जल्दी बताओ । आई एम अस्किंग समथिंग।” बाहर इस गरजदार आवाज ने नंदू का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसलिए नहीं कि वो बेटे के लिए गुहार लगा रहा था। बल्कि इसलिए क्योंकि उसे ये आवाज जानी-पहचानी लगी थी।

नंदू बहार निकल कर गया तो आवाज शांत हो चुकी थी। उसने देखा कि सामने उसके साहब खड़े थे। वो डॉक्टर से कुछ बात कर रहे थे। बीच-बीच में वो नंदू कि तरफ देख रहे थे। इशारों से पता चलता था कि डॉक्टर उसके साहब को बता रहे थे कि इसी कि वजह से आपके बेटे को जीवनदान मिला है।

साहब दौड़ते हुए नंदू के पास पहुंचे। वहां पहुँचते ही जोर से बोले,
“ये जिसका भी इलाज करवाने आया है, उसके इलाज में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए। जितने पैसे लगेंगे मैं लगाऊंगा।”

तभी उन्हें  कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ। घूम कर देखा तो डॉक्टर साहब पीछे खड़े थे। उन्होंने उस कमरे में इशारा किया। जहाँ नंदू कि पत्नी रो रही थी।  जिस हालत में  कुछ देर पहले नंदू था। उसी के समकक्ष अब उसके साहब भी पहुँच गए थे।

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