किस्मत पर एक कविता – मुजरा किस्मत का | किस्मत पर शायरी

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मुजरा किस्मत का

किस्मत पर एक कविता - मुजरा किस्मत का | किस्मत पर शायरी

तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।
जितना संभालूँ मैं खुद को ये
मुझे बदनाम करती है।
अमीरों के कोठों पर
चलती है उनकी खातिर।
मेरे कहने पे न मेरा
इक भी काम करती है।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।

मेरी हर हरकत जो होती है
हिमाकत उनको लगती है।
हिमायत उनकी कर दूँ
तो भलाई मेरी होती है।
उनके लिये करता तो
सब काम बनते हैं।
अपने लिए सोचूँ तो
हर बात बिगड़ती है।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।

है डर हार ना जाऊं
जंग जिंदगी से मैं।
पाऊँगा खुदा इक दिन
अपनी बंदगी से मैं।
हैं जो हालात बदलेंगे
जारी कोशिशें जो हैं।
हिम्मत के आगे कहाँ
मुसीबतें ठहरती हैं।
तवायफ बन चुकी किस्मत
मुजरा सरेआम करती है।

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Sandeep Kumar Singh

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ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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