रिजल्ट्स और आत्महत्याएं – विद्यार्थी जीवन का एक कड़वा सच

रिजल्ट्स और आत्महत्याएं :- परिक्षाएँ ख़त्म होने के बाद विद्यार्थियों को बस एक ही चीज की प्रतीक्षा रहती है और वो है रिजल्ट। जी हाँ, ये एक ऐसी चीज है जो कई लोगों की जिंदगी बदल देती है। इसके साथ सारे विद्यार्थियों की कुछ न कुछ उम्मीदें जुड़ी हुयी होती हैं। सबने अपने सपने संजोये होते हैं। कोई उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए विदेश जाने के सपने संजोता है तो कोई डॉक्टर और इंजिनियर बनने के।

रिजल्ट्स और आत्महत्याएं

रिजल्ट्स और आत्महत्याएं

सपने देखना अच्छी बात है। तभी तो दुनिया में नए-नए आविष्कार होते हैं। लेकिन जब सपने टूट जाएँ फिर क्या? जब ये पता चले की वक्त की ईंटों से तैयार की गयी सपनों की ईमारत भरभरा कर गिर पड़ी? मुश्किल होता है खुद को संभालना ऐसे समय में।

रिजल्ट आने के बाद कुछ विद्यार्थियों के साथ भी ऐसा ही होता है। जब उन्हें पता लगता है की रिजल्ट वैसा नहीं आया जैसे वो चाहते थे तो वो टूट जाते हैं। कुछ अवसाद में चले जाते हैं और कुछ तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं। जब वो ये सब नहीं झेल पाते तो ऐसा रास्ता अपनाते हैं जिस से उनकी परेशानी तो ख़त्म हो जाती है लेकिन उनके परिवार की परेशानियाँ बढ़ जाती हैं।

भारत में हर साल 1,35,000 लोग एटीएम हत्या करते हैं जिनमें से 80% लोगों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की होती है जो की राष्ट्रीय साक्षरता की औसत 74% से भी ज्यादा है। ये आंकड़े ये बताते हैं कि हमारी पढ़ी लिखी पीढ़ी मानसिक तौर पर कितनी कमजोर है। इतना पढ़ने के बावजूद वो लोग अपने आप को संभल नहीं सकते।

वर्ष 2014 में परीक्षाओं में फेल हो जाने के कारन 2403 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। ये उन विद्यार्थियों की संख्या है जो फेल हुए। ईसके अलावा कुछ ऐसे विद्यार्थी भी होते हैं जो कम अंक आने के कारन भी अपनी जान दे देते हैं। क्या जीवन के एक मोड़ पर असफल हो जाने के कारन हमें जीवन से हार मान लेनी चाहिए? क्या हम इतने कमजोर हो चुके हैं कि अपने जीवन पर नियंत्रण नही कर सकते? आखिर क्यों आती है ऐसी नौबत कि भविष्य को रोशन करने वाला चिराग को समय से पहले ही बुझा देता है?

हमारे समाज में एक चीज आम तौर पर देखने को मिल जाती है। जहाँ माता-पिता निरंतर अपने बच्चे से ये कहते सुने जा सकते हैं :- फालाने के बच्चे के इतने नंबर आये हैं। तुझे उनसे ज्यादा नंबर लेना है, पढ़ेगा नहीं तो कुछ बनेगा कैसे? सारा दिन बस खेलना-खेलना इस बार फेल हुआ तो देखना और ऐसी ही कुछ और बातें।

इस तरह बच्चे के मन में ये चीज बैठ जाती है की अगर वो पास न हुआ तो न जाने उसके साथ क्या हो जाएगा? घर में वो क्या जवाब देगा? उसके दोस्त और रिश्तेदार क्या कहेंगे? बस इन्हीं सवालों के मझधार में वो ऐसा फंसता है कि उसे जिंदगी के खूबसूरत किनारे नजर ही नहीं आते। कुछ नजर आता है तो माता पिता की डांट, दोस्तों का मजाक और रिश्तेदारों के सवाल। इसी बीच वो कुछ ऐसा सोच लेता है की समाज का शोर मातम में बदल जाता है।

कुछ माता-पिता तो आज-कल अपने बच्चों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। इसका कारन है आज के जीवन की व्यस्तता। जिसके कारन दोनों पीढ़ियों के बीच एक अंतर आ रहा है। ऐसे में जब बच्चे की तरफ पूरा ध्यान नहीं दिया जाता तो वह पढ़ाई में पिछड़ता चला जाता है। फिर रिजल्ट वाले दिन उसे यह डर सताने लगता है कि वह अपने माता-पिता का सामना कैसे करेगा? ऐसे समय में वह आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है।

क्या आत्महत्या ही है किसी समस्या से खुद को दूर करने का रास्ता? जरा, सोच कर देखिये। उन माँ-बाप के बारे में जिनके बच्चे ऐसा कदम उठा चुके हैं। क्या बीतती है उनके दिलों पर। कभी सोचा है कि तुम्हारे जाने के बाद उनकी जिंदगी कैसी होगी?

बात यहीं ख़त्म नहीं होतीइस तरह बच्चे के मन में ये चीज बैठ जाती है की अगर वो पास न हुआ तो न जाने उसके साथ क्या हो जाएगा? घर में वो क्या जवाब देगा? उसके दोस्त और रिश्तेदार क्या कहेंगे? बस इन्हीं सवालों के मझधार में वो ऐसा फंसता है कि उसे जिंदगी के खूबसूरत किनारे नजर ही नहीं आते। कुछ नजर आता है तो माता पिता की डांट, दोस्तों का मजाक और रिश्तेदारों के सवाल। इसी बीच वो कुछ ऐसा सोच लेता है की समाज का शोर मातम में बदल जाता है।

यहाँ सोचने वाली बात यह है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए? कैसे इस अनमोल जीवन की महत्वता को पहचान कर इसे एक छोटे से कारन के लिए न गवाया जाए? ये लेख विद्यार्थियों और माता-पिता दोनों के लिए ही है। विद्यार्थी अपनी ताकत को जाने और माता-पिता अपनी जिम्मेवारियों को। आइये जानते हैं हम कैसे इन आत्महत्याओं को रोकने में सफल हो सकते हैं :-

असफलता के लिए सदैव तैयार रहें

असफलता जिंदगी का एक हिस्सा है ठीक वैसे ही ऐसे सफलता जिंदगी का एक हिस्सा है। आपने आज तक ऐसा कोई इंसान नहीं देखा होगा जो सफल होने के बाद काम करना बंद कर दे या फिर अपना जीवन समाप्त कर दे। ठीक उसी तरह, असफ़लत के बाद भी इंसान को प्रयासरत रहना चाहिए। अगर असफलता के बाद जीवनलीला समाप्त करना ही बेहतर होता तो शायद हमें कभी बल्ब न मिल पाता। थॉमस अल्वा एडिसन ने कुछ ही प्रयासों के बाद आत्महत्या कर ली होती।

जिंदगी आगे बढ़ती रहती है और गुजरा वक़्त वापस नहीं आता और अच्छी बात तो ये हैं की जिंदगी किसी को पीछे भी नहीं छोडती। सबको साथ लेकर चलती है। रही बात वक़्त की तो बीता वक़्त आ तो नहीं सकता लेकिन हमारे पास आने वाले वक़्त को बीते हुए वक्त से गयी गुना सुन्दर बनाने के मौका जरूर रहता है। असफलता चाहे कितनी बार मिले तुम उतनी बार उसे से कहो :- मैं अभी जिन्दा हूँ और अब तक जिन्दा हूँ लड़ता रहूँगा।

माता पिता दें बच्चों को समय

कहते हैं भगवान् हर जगह नहीं पहुँच सकते थे इसलिए सबकी देख-रेख के लिए उन्होंने माता-पिता बना दिए। पार आज का समय में देखा जाए तो भगवान् तो मिल जाएँ पर माता-पिता का समय मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। इसी कारन बच्चों और अभिवावकों के बीच दूरी बढती जा रही है। जिससे बच्चे को अच्छे संस्कार और सकारात्मकता नहीं मिल पाती। इस से बच्चा गलत रस्ते अपनाना शुरू कर देता है।

ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों के साथ दिन में कुछ समय जरूर बिताना चाहिए जिसमें वो उनसे बात कर सकें और अपने दिल की बातें कर सकें। ऐसा करने से बच्चों को भी हौंसला मिलता है और उनके बारे में हमें भी जानकारी मिलती रहती है। उनकी भावनाओं के बारे में पता चलता रहता है।

सकारात्मकता की तरफ बढ़ें

बच्चों को ज्ञानवर्धक बातें बताएं। उन्हें हर परिस्थिति में धैर्य बनाये रखने की आदत डालें। उनकी परेशानियों में उनसे बात करें व सदैव कोई सकारात्मक हल ही निकालें। उन्हें इस काबिल बनायें की वो किसी भी सच्चाई का सामना कर सकें। जिंदगी अगर दूसरा मौका न दे तो खुद बनाना चाहिए। जिद करो लेकिन आगे बढ़ने की किसी को पीछे छोड़ने की नहीं।

हारे हो तो बदला लो खुद को और अच्छा बना कर। दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं। पानी बहती हुयी नदी को जब कोई पर्वत या बाँध रोक लेता है तो कुछ देर के लिए नदी बहना बंद कर देती है। लेकिन उस समय वो अपनी ताकत बढ़ा रही होती है। अब उसकी ताकत बढ़ जाती है तो वो या तो पर्वत को अपने रस्ते से हटा देती है या फिर उसके ऊपर से बहने लगती है।

इसी तरह अगर आपके रास्ते में कोई रुकावट आती है तो अपनी ताकत बढ़ाएं। हिम्मत न हारें। जीवन में कोई भी चीज स्थायी नहीं है तो समस्याएँ स्थायी कैसे हो सकती हैं। सदा सकारात्मक सोच रखें। खुद को प्रेरित करते रहें। एक बात हमेशा याद रखें आपको सबसे यदा आप की ही जरूरत है। अपने आपको और अपनी ताकत को पह्चाने।

दोस्तों आपको यह लेख कैसा लगा हमे जरूर बताएं और शेयर कर के दूसरों तक भी पहुंचाएं। जीवन अनमोल है, इसे व्यर्थ न गवाएं। धनयवाद।

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Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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