हिंदी कविता – झूठी उम्मीद | Hindi Poem – Jhuthi Ummid

आप पढ़ रहे है कविता – झूठी उम्मीद ।

झूठी उम्मीद

झूठी उम्मीद

चल आज खुद को धोखा देने की कोशिश करता हूँ,
एक बार फिर से तुझ पर भरोसा करता हूँ,
शायद इस दफा तू सच्चा निकले।

चल आज तेरी सारी गुस्ताखियों को माफ़ करता हूँ,
एक बार फिर से तुझे प्यार करता हूँ,
शायद तू इस दफा वादों का पक्का निकले।

चल आज तेरी हर अदा की मैं तारीफ़ करता हूँ,
एक बार फिर तुझे हमराज करता हूँ,
शायद साफ़ तेरी नियत निकले।

चल आज हर बार तेरी ही बात करता हूँ,
एक बार फिर तेरा नाम करता हूँ
शायद तू गुमनाम निकले।

मगर अफ़सोस कि अब
तुझे ना भूल पाएंगे,
ना मिले मुझे महबूब तुझसा
ये इबादत है मेरी
मिले हर शख्स दुनिया में
मुझे चाहे वो जैसा हो
मगर जो तुझसा मिलना हो तो
रूह इस बदन से जा निकले,
मगर जो तुझसा मिलना हो तो
रूह इस बदन से जा निकले।

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Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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2 लोगो के विचार

  1. waah bahut badhiyaa umdaah kavita padhkar maza aa gaya umeed hai aage bhi apke blog ke madhyam se nayee nayee kavitaon se update rahooga

    • धन्यवाद pushpendra dwivedi जी…..हम आप कि उम्मीद पर खरे उतरने की पूरी कोशिश करेंगे..इसी तरह हमारे साथ बने रैन एक बार फिर आप का धन्यवाद…

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