साल बीत गया मगर- नए साल पर पुराने हालातों को बयां करती कविताएँ

पुराना साल बीतने पर नया साल तो आ जाता है लेकिन कुछ चीजें वही रहती हैं। जैसे की किसी की यादें, दिए गए दर्द या फिर अपनी किस्मत, हालात और ऐसी ही कई और चीजें। पढ़िए ऐसी ही चीजों को बयान करती नए साल पर पुराने हालातों की कविताएँ :- साल बीत गया मगर और साल मंजिल पर पहुँच गया।

1. साल बीत गया मगर

साल बीत गया मगर

साल बीत गया मगर हालात वही है
टूट कर बिखरे थे जो जज़्बात वही हैं,
किसको दोष दूँ कौन अपना था यहाँ
चेहरे बदल रहे हैं मगर जात वही है।

मैंने देखा है बदल के खुद को मगर
जमाने की अब तक औकात वही है,
हाथ मिले मगर दिल न मिल सके
मतलब से होने वाली मुलाकात वही है।

कब से हटाना चाहता हूं हटती नहीं है क्यों
बुरी बलाओं का जो साया तैनात वही है,
कैसे बदलेगी भला तकदीर अपनी
सितारे हैं वही कायनात वही है।

अब भी चाहत है कि खुश रहें दुश्मन मेरे
चोट जरूर खाई है मगर खयालात वही हैं,
बदल रहा है वक़्त ये रफ्ता-रफ्ता
मगर मेरी जिंदगी में सबात वही है।

साल बीत गया मगर हालात वही है
टूट कर बिखरे थे जो जज़्बात वही हैं।

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2. साल मंजिल पर पहुँच गया

साल मंजिल पर पहुँच गया और मैं अब भी राह में हूँ
खुशियाँ दूर हैं कहीं और मैं दर्द की पनाह में हूँ,
बात ये नहीं कि वो किसी और का हो गया है
बात ये है कि मैं अब भी उसकी चाह में हूँ।

यूँ तो दुनिया भी निकल रही है वक़्त से आगे
मगर मैं डूबा अभी भी खयालातों की थाह में हूँ,
मैं तो समझा था भुला दिया होगा लोगों ने किस मेरा
बाहर निकला तो पाया कि मैं अभी भी सबकी निगाह में हूँ।

जब बदनाम ही हो गया शहर में तो क्या फर्क पड़ता है
क्या फर्क पड़ता है कि मैं उड़ती हुयी किस अफवाह में हूँ,
ज़माने वालों मुझे समझना हो तो बस इतना समझ लेना
कि जो इश्क में होता है मैं शामिल उसी गुनाह में हूँ।

साल मंजिल पर पहुँच गया और मैं अब भी राह में हूँ
खुशियाँ दूर हैं कहीं और मैं दर्द की पनाह में हूँ।

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Sandeep Kumar Singh

Sandeep Kumar Singh

ये कविताएं, शायरियां और कुछ विचार मेरी खुद की रचनाएं हैं। कुछ नकलची बंदरों ने इन्हें चुरा कर अपने ब्लॉग पर डाल लिया है। असली रचनाएं यहीं हैं। आशा करता हूँ कि यदि आप ये रचनाएं कहीं शेयर करते हैं तो हमारे ब्लॉग का लिंक साथ मे जरूर दें। मैं एक अध्यापक हूँ और अपने इस ब्लॉग क लिए खुद ही लिखता हूँ। धन्यवाद।

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