धर्म वृक्ष:- धर्म के सकारात्मक पहलू

हम लोग अपने जीवन में कई प्रकार के वृक्ष देखते हैं। इन सब में कई वृक्ष लाभकारी होते हैं, व कई स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। कई छोटे होते हैं कई बड़े होते हैं, कई फल देते हैं कई नहीं देते परंतु इन सब में एक सामान्य बात यह है, कि यह सब हमें जीवन देने वाली ऑक्सीजन गैस प्रदान करते हैं। यही कहानी इंसान और धर्म की भी है। आज कल इंसानियत भी एक वृक्ष पर टिकी हुयी है और वह वृक्ष है :- ‘धर्म वृक्ष’।

धर्म वृक्ष:- धर्म के सकारात्मक पहलू

धर्म वृक्ष

संसार में उपस्थित हर धर्म एक वृक्ष की भांति है। जिस तरह साधारण वृक्ष हमें स्थिरता की और दूसरों को फल देने की प्रेरणा देते हैं उसी तरह धर्म वृक्ष हमें जीवन जीने के उद्देश्य व मार्ग बताते हैं। परंतु धर्म वृक्ष ज्यादा या कम फल नहीं देता। यह सब को समान फल प्राप्त करने का मौका देता है। जिस प्रकार एक साधारण वृक्ष अच्छे फल तभी देता है, जब हम उसकी देखभाल अच्छी तरह करते हैं। अगर हम ऐसा नहीं करते तो शायद उस वृक्ष का कोई अस्तित्व ही न रह जाये। यही अवस्था धर्म वृक्ष की भी है। हम जितनी श्रद्धा और भक्ति से पुरुषार्थ करते हैं। हमें उतना ही उत्तम फल मिलता है। यदि हम धर्म का पालन नहीं करते तो जीवन में हमें शांति व संतोष रुपी फल प्राप्त नहीं होता। जिस तरह एक वृक्ष कि बुनियाद धरती से जुडी होती है उसी तरह हर धर्म की बुनियाद मानवता से जुड़ी हुई है।

मानवता एक बरगद के पेड़ की तरह है। जिसमें सब शाखाएं ऊपर की ओर जाती हैं, किंतु कुछ नीचे की ओर आ जाती हैं। समय बीतने के साथ ही ये शाखाएं धरती के भीतर अपनी शाखाएं भेने लगती हैं और जैसे ही ये शाखाएं जड़ का रूप धारण कर लेती हैं उसी के कुछ समय बाद ये अपनी पृथक पहचान बना लेती हैं। और यह सब कुदरत की आवश्यकताओं के अनुसार ही होता है। लेकिन आज कल यही हालत हमारे इस विश्व की है। मानवता रूपी वृक्ष से न जाने आज कितनी धर्म की शाखाएं निकल चुकी हैं। और हर शाखा ने स्वयं को एक वृक्ष के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। बात यहीं समाप्त नहीं होती हम धर्म के जन्मदाता ‘मानवता’ को ही भुलाकर धर्म के नाम पर अपनी एक अलग पहचान बनाने की राह पर चल रहे हैं।

बरगद के वृक्ष की तरह ही मानवता के वृक्ष से कई धर्म की शाखाएं उत्पन्न हो चुकी हैं। परंतु मुख्य जड़ मानवता ही है। धर्म शाखाएं हैं, जो मानवता के बिना जीवित नहीं रह सकती। यदि वह शाखा खुद को एक तने के रुप में स्थापित कर भी ले, तो उसका मूल अस्तित्व मानवता रूपी वृक्ष से ही रहेगा।

यदि आपका धर्म और मन मानवता रुपी वृक्ष से जुड़ा है, आप तभी धर्म की शाखा के योग्य हैं। तभी आप किसी के काम आ सकते हैं। अन्यथा आप की स्थिति खजूर के वृक्ष की तरह है। जो अभिमानित होकर छाती तान कर खड़ा रहता है। परंतु न वह छाया दे सकता है, और ना ही कोई उस से सहज ही फल प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार यदि हम धर्म वृक्ष से अच्छे फल प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें मानवता के हर गुण को नि:स्वार्थ अपनाना पड़ेगा। क्योंकि हमें कर्मों के अनुसार ही धर्म वृक्ष से फल प्राप्त होता है।

यथा रामचरितमानस में तुलसीदास  जी ने भी लिखा है:-

“कर्म प्रधान विश्व राचि राखा
जो जस करई सो तसु फल चाखा।।”

 

 

 

 

 

 


Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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