कथा जिंदगी के धक्कों की – धक्कों की एक अनकही दास्ताँ | जागते रहें आगे धक्का है

धक्का, खाएं है कभी? क्या कहा? हम धक्का क्यों खाएं? अरे जनाब ढका तो हर किसी को खाना पड़ता है। चाहे वो चाहे या न चाहे। ये सब की किस्मत में पहले से ही लिखा हुआ है। बिना धक्के के जिंदगी चल ही नहीं सकती। इसकी कल्पना करना बेकार है। विज्ञानं में भी कहा जाता है जब तक कोई बाहरी उर्जा स्थायी वास्तु पर नहीं लगायी जाती वह गतिमान नहीं होती। लेकिन ऐसा इंसानों के साथ भी होता है मुझे आज तक नहीं पता था। आखिर कैसे है हमारा धक्कों से जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध? आइये जानते हैं इस लेख में :- कथा जिंदगी के धक्कों की ।

कथा जिंदगी के धक्कों की

कथा जिंदगी के धक्कों की

धक्का, एक ऐसा शब्द जो सुन कर हमें मेलों की, भरी हुयी बसों और ट्रेनों की याद आ जाती है। ये धक्के हम महसूस कर सकते हैं और हमें इनके बारे में पता चल जाता है। धक्के खाना तो हमारे देश की एक परंपरा है। अगर ट्रेन में भीड़ हो तो बस दरवाजे पर कहदे होने का जुगाड़ बनाओ कुछ ही देर में मिलने वाले धक्कों के कारण आप कब अन्दर पहुँच आओगे आप को भी न पता चलेगा। आलम तो ये हो जाता है की आप जल्दी उतर भी नहीं सकते। कई बार तो ये धक्का सिर्फ धक्का ही नहीं रहता। धक्का मुक्की में बदल जाता है।

लेकिन इनके अलावा भी धक्के की एक किस्म होती है जिसे जिंदगी के धक्के कहा जाता है। अक्सर सब लोग कहते ही हैं की जिंदगी में है ही क्या :- दुःख, तकलीफ और धक्के। दुःख और तकलीफ जब मिलते हैं तो सबको पता चल जाता है लेकिन धक्के कब मिल रहे हैं पता नहीं चलता। इसलिए ये वो धक्के होते हैं। जिसे आज तक देख तो न सका कोई लेकिन होते जरूर हैं। और कई दफा तो ऐसे धक्के ओते हैं की क्या बताएं?

सबसे पहला धक्का इन्सान को लगता है जन्म के समय। अमां मियाँ जब जन्म ही धक्के से हो रहा है तो जिंदगी में बिना धक्के जीने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं आप। जन्म तो धक्के खाने की शुरुआत भर होती है। इसके बाद तो जब तक जिंदगी रहती है बस धक्के ही रहते हैं। बछा दूध पीता है। धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है। जब स्कूल जाने के लायक होता है और नहीं जाता तब भी उसे मिलता है धक्का। घर वाले उससे धक्का देकर स्कूल में छोड़ आते हैं।

स्कूल में आने के बाद अगर आप आज-कल की शिक्षा देखें तो वह भी कोई अप्पने आप आगे नहीं भाग रहा। बस धक्का दे रहे हैं। अगर कोई आगे जा रहा है तो हमें अपनी स्पीड नहीं बढानी। बस सामने वाले को धक्का देना है। पोजीशन लेने की होड़ ने बच्चे को बच्चा न रहेन दिया। एक मशीन बना दिया। अब हौले-हौले परीक्षाएं भी आ गयीं। बेचारा बच्चा पास न हुआ तो घर वाले पहुँच गए स्कूल। और जा के बोलते क्या हैं,

“जी, इस बार धक्का देकर आगे कर दें। अगली बार से पढ़ेगा मन लगा कर।”

अब सामने वाला भी क्या करे वो भी तो बचपन से उसे धक्का देकर ही तो ऊपर ला रहा है वरना अभी तो बच्चे ने पांचवीं भी पांच बार कर ली होती।

जिंदगी में किसी तरह पढाई के धक्कों से छुटकारा मिलता है तो धक्के शुरू होते हैं नौकरी के लिए। ऐसे धक्के की लोगों की चप्पलों के साथ-साथ हिम्मत और हौसला भी घिस जाता है। लेकिन कहते हैं न की जब पत्थर को घिसा जाए तभी वह अनमोल रतन बनता है। तो रतन बनने के लिए पत्थर बनना जरूरी है। बाकी का काम धक्के कर देंगे। ऐसे समय में जब किस्मत के धक्के से नौकरी मिल जाती है तो धक्के की किस्म बदल जाती है।

ये धक्के होते हैं परिवार के। जी हाँ,शादी। एक ऐसी रस्म जिसमे धक्के तो नहीं होते लेकिन सारी उम्र धक्के खाने पड़ते हैं। मेरी बात को गलत मत ले जाइएगा। मैं जिन धक्कों की बात कर रहा हूँ वो वो नहीं है ओ आप सोच रहे हैं। ये धक्के हैं राशन कार्ड में अपना और पत्नी का नाम डालने के लिए सरकारी दफ्तर के धक्के खाना। उसेक बाद बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र बनाने के लिए धक्के खाओ। फिर बच्चों के दाखिले के लिए स्कूलों में धक्के खाना।

सरकारी दफ्तरों के बाद बचे हुए धक्के बॉस मारता है। किसी तरह धक्के-खा कर जिंदगी आगे बढ़ाते हैं। बुढ़ापा आने को होता है तो निकम्मी संतान धक्के मरना शुरू कर देती है। और ये धक्के तो मौत तक चलते हैं। अहाँ, मौत तक नहीं मौत के बाद तक। जब धक्के देकर आग के हवाले कर दिया जाता है।

वैसे अगर देखा जाए तो धक्के जीवन के लिए अत्यंत आवशयक हैं। बात बस आपकी सोच पर निर्भर करती है। ये धक्के आपको आगे बढाने के लिए ही होते हैं। बस शर्त यह है की आपको सही धक्का मिलने पर अपने कदम उसके साथ ही बढ़ा लेने हैं। मतलब आपको अपने जीवन में निरंतर प्रयास करते रहना है। क्या पता कौन सा कदम आपको कहाँ पहुंचा दे। मेरा मतलब है कि आपको सफलता दिला दे। धक्के का फ़ायदा उठाना है तो जागते रहो। जो लोग किस्मत के सहारे अपने जीवन में ठहरे हुए हैं वो इन धक्कों से सावधान रहें। क्योंम्की आगे बढ़ने के लिए तैयार न रहने की सूरत में वे अपनी जगह पर गिर सकते हैं। ईवन के धक्के बस उनके लिए ही फायदेमंद हैं जो जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नरत हैं।

ये थी कथा जिंदगी के धक्कों की, सो जिंदगी में धक्के खाते रहिये और आगे बढ़ते रहिये। क्योंकि ये जरूरी है। धन्यवाद।

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Sandeep Kumar Singh

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बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उम्मीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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4 Responses

  1. Jamshed Azmi says:

    हम भारतीय जीवन में धक्के खाकर ही आगे बढ़ते हैं। हमारी तरक्की जीवन में खाए धक्कों पर ही निर्भर करती है। मुझे आपका यह विषय बहुत पसंद आया। बहुत ही मौलिक विषय है। मौलिकता को बढ़ावा देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप अपने कमेंट यूआरएल में सिर्फ साइट का यूआरएल ही टाइप किया कीजिए। इससे मुझे नवीनतम पोस्ट तक पहुंचना आसान होता है।

    • धन्यवाद Jamshed Azmi जी….. लंबे समय के बाद दुबारा आपको देख कर अच्छा लगा। हम आपकी बात ख्याल रखेंगे। एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत आभार। इसी तरह हमारे साथ बने रहिये।

  2. अयाझ says:

    घक्का वाली सोच मझेदार है । 1. कुछ स्वार्थी लोग दुसरोँ को गीराने कुचलने के लिये ही घक्का लगाते हैँ । 2. बहुत सारे लोगों को जीवनमेँ हर तरफ से ईतने घक्के लगते हैँ की वो जीवन मेँ हमेँशा पिछड जाते है । 3. कुछ लूभावने लोगों को जीवनमेँ घक्के नहीं लगते, समाज के लोग उनको अपने कँघोँ पर बेठा कर उनका जीवन सँवारते रहते हैँ । 4. कुछ अमीर लोग पैदाइश से ही दुसरोँ को धक्का देकर पिछड़े रखना ईनकी होबी होती है ।

    • Sandeep Kumar Singh Sandeep Kumar Singh says:

      धक्कों में ही तो सारी जिंदगी समायी है। आपके धक्कों के बारे विचार भी मजेदार हैं।

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