कविता – रास्ता भटक गया हूँ मैं | Rasta Bhatak Gaya Hu Mai

पढ़िए हिंदी कविता – रास्ता भटक गया हूँ मैं ।

कविता – रास्ता भटक गया हूँ मैं

कविता - रास्ता भटक गया हूँ मैं

खुशियों के इस सफर में
गमों ने किया है बसेरा,
रास्ता भटक गया हूँ मैं
कारवां छूट गया मेरा।

मैं दर दर ठोकर खाता हूँ
हर कदम पर गिरता जाता हूँ
कोशिश करता हूँ लाखों मैं
पर फिर भी संभल न पाता हूँ,
खोया है उजाला जीवन का
है चारों ओर अंधेरा ,
रास्ता भटक गया हूँ मैं
कारवां छूट गया मेरा।

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जब मिलता कोई मुसाफिर है
मैं संग उसके हो लेता हूँ,
किसी मोड़ पर कोई अजनबी
जब मुझको छोड़ के जाता है
मैं गुजरे राह को तकता हुआ
खुद को तनहा सा पाता हूँ,
न पता न कोई ठिकाना है
जहाँ रुके वहीं है डेरा,
रास्ता भटक गया हूँ मैं
कारवां छूट गया मेरा।

हर ओर अजनबी दिखते हैं
रहा न अब कोई मेरा
न रात अंधेरी कटती है
न होता है अब सवेरा,
बेबस सी है जिंदगी अब तो
हर ओर मुसीबत ने घेरा,
रास्ता भटक गया हूँ मैं
कारवां छूट गया मेरा।

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Sandeep Kumar Singh

बस आप लोगों ने देख लिया जीवन धन्य हो गया। इसी तरह यहाँ पधारते रहिये और हमारा उत्साह बढ़ाते रहिय्रे। वैसे अभी तो मैं एक अध्यापक हूँ साथ ही इस अपने इस ब्लॉग क लिए लिखता हूँ। लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण है आप लोगों के विचार। अपने विचार हम तक अवश्य पहुंचाएं। जिससे हम उन पर काम कर के आपकी उमीदों पर खरे उतर सकें। धन्यवाद।

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