खामोश चीख़ – ड्रग्स के नशे के शिकार लोगो पर एक कविता

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खामोश चीख़ – ड्रग्स के नशे के शिकार लोगो पर एक कविता

खामोश चीख़ ड्रग्स के नशे के शिकार लोगो पर एक कविता

सन्नाटे को चीर रही थी, उसकी चीखें इक रात को,
अँधेरे कमरे से शायद वो आज़ादी चाहता था।
उसकी आवाज़ में कोई इन्क़लाब नहीं था,
जो मांग रहा था वो कोई शबाब नहीं था।
मांग रहा था वो ज़हर जिसका वो आदी था,
खामोश सुन रहे थे सब बस वो ही इक फरियादी था।
टूट रहा था एक-एक अंग उसका,
वो खुद ही कारन था अपनी बर्बादी का।

 वो लत उसे उसके दोस्तों ने ही लगवायी थी,
जो लाख चाहने के बाद भी छूट न पायी थी।
हो रहा था तनहा वो अपनों के बीच,
जल रहा था उस आग में जो खुद उसने लगायी थी।

कल का उजाला आज अंधकार में था,
बदल गया था वो जबसे नशे के बाज़ार में था।
इस कदर फंस गया था वो अपने ही जाल में,
अपना ही घर ही बेच रहा वो धोखे के व्यापार में था।

घूम रहा था वक़्त बीत हुआ उसके सामने,
खुद को बदल नहीं सकता था वो हालात लाचार में था।
अचानक हर ओर शोर खामोश हुआ,
अब फ़िज़ाओं में दौर हवाओं का था।

खुला दरवाजा तो नज़र आया,
देख जिसे सब को पसीना आया।
झूल रहा था जिस्म इक रस्सी के सहारे
छोड़ चुका था वो दुनिया
जो अब तक तड़प रहा था।

 शायद इस हरकत से उसको सुकून आया,
चंद लम्हों में माहौल में अजीब सा जूनून आया।
पहले एक रो रहा था अब कइयों को रोते पाया।
डूब गया था एक सूरज नशे की आग में,
वंश के चिराग मैंने कई परिवारों को खोते पाया।

अगर जागती है जमीर तो अब भी जाग जाओ,
वक़्त आ गया है दूर इस बुराई से भाग जाओ।
संभल जाओ कि राह अभी बाकी है,
तमाम उम्मीदें हैं तुमसे जो पूरी करना बाकी हैं,
तमाम उम्मीदें हैं तुमसे जो पूरी करना बाकी हैं।

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