पुस्तक समीक्षा – एच. आर. डायरीज | Book Review – H. R. Diaries

कुछ नौजवान जिन्होंने नयी दुनिया में कदम रखा, उलझ गये दौड़-भाग के पाटो में। जिंदगी की पेचीदगियों को उन्होंने अपनी तरह से हल करने की कोशिश की, अनेक रोचक मोड़ आते गये , वे हँसे, रोये, घबराये लेकिन रुके नहीं। आखिर में उन्होंने पाया की नौकरी करना कोई बच्चों का खेल नहीं! उनकी जिन्दगी का एक हिस्सा उनसे हर बार सवाल करता है की यह दौड़ यूँ ही क्यों चल रही है? हमें क्यों लगता है की हम एक जगह बंधे हुए है? क्या यह हमारी नियति है?

ये गहरे मायनों से भरी चंद पंक्तियाँ हैं जो हरमिंदर सिंह की लिखी किताब एच. आर. डायरीज से ली गयी हैं। ऐसे ही कई अन्य बातों और रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली हकीकतों को बयाँ करने की कोशिश की है हरमिंदर जी ने अपने इस उपन्यास में। सबसे पहले तो मैं हरमिंदर सिंह जी को उनके पहले उपन्यास के लिए बधाई देता हूँ। ये किताब मुझे Blogadda.com में “ब्लॉगर्स टू ऑथर्स” प्रोग्राम के अंतर्गत समीक्षा के लिए उपलब्ध कराइ गयी। ये उपन्यास पढने के बाद मैं इसकी समीक्षा (मुख्य रूप से सामान्य पाठकों के लिए) कुछ मुख्य बिन्दुओ में दे रहा हूँ। आइये जाने पुस्तक समीक्षा – एच. आर. डायरीज।

एच. आर. डायरीज – मानव संसाधन विभाग की अनकही

पुस्तक समीक्षा - एच. आर. डायरीज

उपन्यास एक नजर में –

⇒शीर्षक: एच. आर. डायरीज – मानव संसाधन विभाग की अनकही
⇒लेखक: हरमिंदर सिंह
⇒प्रारूप: उपन्यास
⇒पृष्ठ: 181
Blog: www.100year.in

उपन्यास (किताब की कहानी) का मुख्य सार-

इस उपन्यास की पूरी कहानी इर्द-गिर्द घुमती है एक कंपनी मानव संसाधन विभाग के ऑफिस में काम करने वाले कुछ कर्मचरियों के बीच, या यूँ कहे की लेखक ने अपने ऑफिस के दिनों की यादों को कहानी के रूप में उतारा है। सामान्यतः किसी भी ऑफिस में कर्मचारियों के बीच होने वाली रोज-रोज की बातचीत, घटनायें, हंसी मजाक, और ऐसे ही घटने वाले कुछ पल इस उपन्यास का मुख्य घटनाचक्र है। उपन्यास के मुख्य पात्र(लेखक), के ऑफिस में पहले दिन से कहानी शुरू होती है, जो ऑफिस में गुजरने वाले सामान्य दिनों और घटनाओं के साथ चलती जाती है। अंत में कुछ भावनात्मक भाग है, जो कहानी के रुख को थोड़ा मोड़ने का काम करता है, और असल में यही भाग है जो कहानी में दम लाता है। लेकिन असल जिंदगी में आमतौर पर लोगों को किसी भी (खासकर सरकारी) ऑफिस में होने वाली कामकाज के तरीकों को से चिढ़ होती है, तो शायद हो सकता है की कुछ लोगों को इस उपन्यास की कहानी ज्यादा अच्छी ना लगे। पूरे उपन्यास को अलग अलग कहानी के रूप में छोटे-छोटे भागों में बांटा गया है, लेकिन फिर भी पूरी किताब एक ही प्रवाह से चलती है।

उपन्यास के पात्र-

उपन्यास के सारे पात्र सामान्य है, और लेखक के अनुसार सभी काल्पनिक है। एक मुख्य किरदार(लेखक) है, जो सारी घटनाओं को पेश करते जाता है, और उसके दो सहकर्मी विजय और तारा है, आप ऐसा समझ सकते है की उपन्यास की कहानी की मुख्य जड़ यही दोनों पात्र है। साथ में कुछ और पात्र है लेकिन वो कहानी को बस आगे बढ़ाने के लिए है। कहानी में आये किरदारों के बारे में, पर्याप्त वर्णन ना होने के कारन पात्रों के बारे में जानकारी की थोड़ी कमी महसूस होती है। कुछ पात्र ऐसे है जिनका आना और जाना पता ही नहीं चलता।

लेखन-

इस उपन्यास में लेखक की शानदार लेखन कला और शब्दों की कारीगरी देखने को मिलती है।  ज्यादा मजेदार या काल्पनिक या रोचक विषय ना होने के बावजूद लेखक ने जिंदगी के कुछ व्यावहारिक बातों को शब्दों में परोसते गये है। जो उनकी वैचारिक परिपक्वता का परिचय देती है।

उपन्यास की खास बातें-

उपन्यास में खास बातें हैं जो अधिकतम पाठकों को पसंद आएंगी। जैसे की लेखक के लेखन का अंदाज, जैसे उसने चीजों को शब्दों के करतब में फांसने का प्रयास किया है। छोटे-छोटे संवाद भी इसमें अच्छे से दर्शाए है। कहीं-कहीं तुकबंदी चल रही घटनाओं को दूरदर्शिता से पेश करना। स्वच्छंद वाक्य संरचना कहानियों के छोटे भाग। किताब के शीर्षक “एच. आर. डायरीज ” के अनुसार ही यह कहानी एक डायरी के जैसी ही पेश की गयी है। किताब की बाहरी बनावट भी इसमें शामिल हो सकती है।

उपन्यास की कमजोरियाँ-

वे चीजें जो उम्मीदों से परे निकली और निराश क्या। जैसे की उपन्यास का टैग लाइन है, “मानव संसाधन विभाग की अनकही”, इससे ऐसा लगता है की इस उपन्यास में मानव संसाधन विभाग के ऑफिस में होने वाली कोई बात या राज की बात या होने वाले गलत काम या किसी भी तरह की भ्रष्टाचार का खुलासा किया गया होगा। और सच बात कहूँ तो मैंने पहली बार इस पुस्तक का कवर देख के यही सोचा था की, इसमें लेखक ने जरुर कोई खुलासा किया होगा। लेकिन यह चीज उम्मीद से कुछ अलग निकली।

लेखक ने ऑफिस की उन घटनाओं से जिंदगी के कुछ फलसफों को बताने की कोशिश किया है, लेकिन कोई ठोस कहानीसार या उद्देश्य ना होने के कारण बहुत से भाग उबाऊ और बोरियत भरी लगने लगती है। उपन्यास के अंत में जरुर थोड़ा भावनात्मक भाग है, और असल में सिर्फ वही भाग है जो इस उपन्यास में कुछ जान डालती है। उपन्यास के शुरुआत में कुछ बातें है जो साफ़ कर देनी चाहिए थी जैसे की कहानी के मुख्य पात्र के बारे में जानकारी और उसके आस पास जो माहौल बना हुआ है उसकी जानकरी साफ़ कर देनी चाहिए थीं, उसके बिना सारी कहानी हवा में उड़ती प्रतीत होता है। कुछ बातें समझ नहीं आती, जैसे विजय का आये दिन परेशान और हताश होना, इन बातों को बहुत बड़ी समस्या के रूप में बताया गया है, लेकिन सामान्य स्तर के पाठकों को कोई विवरण ना मिलने से कुछ बातें बेबुनियाद सी लगने लगती है।

अंत में-

अगर आप ज्यादा काल्पनिक कहानी से हटके कुछ तो सीधी और सरल कहानी पढ़ना चाहते हैं तो ये उपन्यास पढ़ सकते है। सीधी और सरल यादों को कहानी के रूप में पेश किया गया है। अगर आप भी किसी ऑफिस में जॉब करते है या करते थे और आपका रिश्ता ऐसी जगहों से जुड़ी है तब आपको ये उपन्यास जरुर अच्छा लगेगा। अगर आप विद्यार्थी हैं या फिर नौकरी की तलाश कर रहे हैं, तो ये उपन्यास आपको जरूर पढ़ना चाहिए।

आप ये किताब यहा से खरीद सकते है:

उम्मीद है हरमिंदर जी के ये पहला उपन्यास आप एक बार जरुर पढेंगे। धन्यवाद।

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Chandan Bais

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