चन्द्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Story Of Chandra Shekhar Azad

इस दुनिया में जन्म तो कई लोग लेते हैं लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो कुछ ऐसा कर जाते हैं। इसके कारण दुनिया उन्हें याद रखती है और उनका सम्मान करती है। ये सब होता है इन्सान की अंतरात्मा जागने के बाद किन्तु कई लोग तो जन्म से ही ऐसी प्रवृत्ति के होते हैं। वो सिर्फ अपने दिल की सुनते हैं। वो अपनी सोच से एक क्रांति लेकर आते हैं। एक ऐसी क्रांति जो इतिहास को बदल कर रख देती है। ऐसे ही एक क्रन्तिकारी युवक थे चन्द्रशेखर आजाद ।


चन्द्रशेखर आजाद का जीवन परिचय

चन्द्रशेखर आजाद

चन्द्रशेखर का जन्म 23 जुलाई, 1906 को भाबरा गाँव ( मध्यप्रदेश) जिसका वर्तमान नाम चन्द्रशेखर आजाद नगर है, में हुआ। पंडित सीताराम तिवारी जोकि चन्द्रशेखर आजाद के पिता थे, अलिरापुर रियासत के एक छोटे से कर्मचारी थे। माता जगरानी देवी गृहिणी थीं। 

चन्द्रशेखर के जन्म के समय माता जगरानी देवी कुपोषण का शिकार थीं। चन्द्रशेखर जन्म के समय गोल-मटोल और कांतिवान मुख वाले  थे। इनके एक बड़े भाई थे सुखदेव। पंडित सीताराम और अग्रणी देवी कि पहली तीन संताने काल का ग्रास बन गयी थीं। अब उनके केवल दो ही पुत्र थे।

पंडित सीताराम जिस इलाके में रहते थे। वह क्षेत्र अधिकतर आदिवासी था। वहां एक ऐसा अंधविश्वास भी था कि अगर किसी बालक को शेर का मांस खिला दिया जाए तो वो बड़ा होकर शेर कि तरह बहादुर बनता है। इसी कारण पंडित सीताराम ने चन्द्रशेखर को बचपन में ही शेर का मांस खिला दिया। पता नहीं ये शेर के मांस का असर था या फिर चन्द्रशेखर का हौसला। दीपावली की एक रात को जब  कुछ बच्चों ने उन्हें छः-सात फुलझड़िया एक साथ जलने को कहा तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट फुलझड़ियाँ हाथों में पकड़ कर जला दी। इससे उनका हाथ जल रहा था लेकिन बच्चों की ख़ुशी के लिए हँसते-हँसते फुलझड़ियाँ जलाते रहे।

जब चन्द्रशेखर आजाद पाठशाला जाने लगे तो उनके पिता ने उनकी शिक्षा को और बेहतर बनाने के लिए विद्यालय की पढाई के बाद भी एक सरकारी कर्मचारी मनोहरलाल त्रिवेदी को उन्हें पढ़ने के लिए बुलाया।  मनोहरलाल त्रिवेदी के अनुसार किसी भी विद्यार्थी को बस छड़ी के डर से ही उत्तम शिक्षा दी जा सकती है। इस कारण वे अपने साथ एक छड़ी जरुर रखा करते थे। जब भी विद्यार्थी कोई गलती करते वे उसी क्षण उन्हें छड़ी मार दिया करते।

एक बार पढ़ाते हुए मनोहरलाल त्रिवेदी जी ने कुछ गलती कर दी चन्द्रशेखर आजाद ने पास में रखी हुयी छड़ी उठाई और झट से मास्टर जी को दे मारी। इस स्थिति से मास्टर जी घबरा गए। उसी क्षण सीताराम तिवारी जी बहार आये और पुछा कि क्या हुआ? तब चन्द्रशेखर ने कहा ,
“जब हम कोई गलती करते है तो उसके दंडस्वरूप मास्टर जी हमे दो छड़ी मारते हैं। अब उन्होंने गलती की तो क्या उन्हें मार नहीं पड़नी चाहिए?”

यह सुन कर सब अवाक् रह गए। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि चन्द्रशेखर को क्या समझाया जाए। लेकिन एक बात सिद्ध हो चुकी थी कि चन्द्रशेखर नियमों के पक्के थे।

चन्द्रशेखर संस्कृत सीखने के लिए काशी जाना चाहते थे परन्तु उनके माता-पिता उन्हें अपने से दूर नहीं भेजना चाहते थे। संस्कृत विद्या प्राप्ति के लिए आजाद ने एक फैसला लिया और परिवार के साफ़ इंकार करने के बाद वे घर छोड़ कर काशी के लिए निकल पड़े। काशी पहुँच कर उन्होंने अपनी सिक्षा आरंभ की और अपने घर वालों को चिट्ठी लिख कर वहां पहुँचने कि सूचना दे दी।

वहाँ पर संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए सहायता उपलब्ध थी। उनके रहने और अन्य जरूरतों की पूर्ती के लिए कई लोग दान दिया करते थे। वहां रहते हुए वे अपने शरीर पर भी ध्यान देते थे। इसीलिए उनका शरीर एक पहलवान की भांति दिखता था। अभी चन्द्रशेखर काशी में ही थे कि उन्हें पता चला कि उह्नके भाई सुखदेव को डाकिये की नौकरी मिल गयी है। जिस कारण उनके पिता जी ने भी चन्द्रशेखर के लिए पैसे भेजना आरंभ कर दिया।

कुछ दिनों बाद उन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि उनका जीवन किसी और उद्देश्य के लिए है। वो अब भी पुस्तक पढने के लिए ध्यान केन्द्रित करते उनका मन भटकने लगता। उनका मन अब देशभक्ति की तरफ बढ़ रहा था। उसी समय देश में कई आन्दोलन चल रहे थे। बंगालियों के विरोध से अंग्रेज इतने तंग हो गए थे कि उन्होंने भारतियों के मूल अधिकारों के हनन के लिए “रोल्ट एक्ट” लागू कर दिया।

सारे देश में इसका विरोध हो रहा था। तभी जनरल ओ डायर ने जलियांवाला बाग़ में बिना किसी चेतावनी गोलियां चलवाकर कई बेगुनाहों को मार डाला और कई लोगों को अंगहीन कर दिया। ये सब देख कर चन्द्रशेखर को बेचैनी सी होने लगती थी। उन्हें समझ नहीं आती थी कि वे क्या करें।

एक बार वे बाजार से गुजर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि कुछ पुलिसवाले आन्दोलनकारियों को बड़ी बेरहमी से पीट रहे थे। जब चन्द्रशेखर ने यह देखा तो उनसे रहा ना गया। उन्होंने एक पत्थर उठाया और एक पुलिस वाले को मार दिया। बाकी पुलिस वाले जब तक कुछ समझ पाते आजाद वहां से जा चुके थे। उस पुलिस वाले का बुरा हाल हो गया और वो खून से लाल हो गया।

इस घटना के बाद चन्द्रशेखर की खोज आरंभ हुयी और जल्द ही वो पकडे गए।पकडे जाने पर भी उनके मुख पर जरा भी डर ना था। ये पहला अवसर था जब चन्द्रशेखर आजाद ने देश कि सेवा में अपना कदम बढाया था। चन्द्रशेखर को पकड़ कर जेल ले जाया गया। वो दिन सर्दी के दिन थे। इंस्पेक्टर ने सोचा इसकी गर्मी आज अपने आप उतर जाएगी और ये समझ जाएगा कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बोलने का क्या अंजाम होता है।

आजाद को बिना किसी गर्म कपडे के धोती कुरते  जेल में बंद कर दिया गया। तकरीबन आधी रात को जब वह इंस्पेक्टर यह देखने के लिए उठा कि आजाद की हालत देखी जाये। जब वह वहां पहुंचा तो देखा कि आजाद बिना धोती कुरते के लंगोट में ही कसरत कर रहे हैं और उनके शरीर से पसीना ही पसीना बह रहा है। यह देखकर वह इंस्पेक्टर दबे हुए क़दमों से वैसे ही वापस चला गया। ये वो समय था जब चन्द्रशेखर आजाद ने अपने आप को पहचाना और ये जाना कि उनका उद्देश्य देश सेवा है।

अगले दिन अदालत में उनको लेकर जाया गया। अदालत कि कार्यवाही आरम्भ हुयी। मजिस्ट्रेट ने सवाल पूछने शुरू किये ,
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“आजाद।”
“पिता का नाम?”
“स्वतंत्रता।”
“घर कहाँ है?”
“जेल।”
“काम क्या करते हो?”
“देश को आजाद करवाने का।”

मजिस्ट्रेट को वह उत्तर, उत्तर कम थप्पड़ ज्यादा लगे। इसलिए क्रोध में मजिस्ट्रेट ने 15 बेंत लगाने कि कड़ी सा सुनाई। जब उन्हें बेंत मारे जाने लगे तो अंग्रेजो ने सोचा कि जब 2-4 बेंत पड़े तो अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाएगी। जैसे ही आजाद को पहला बेंत मारा गया। अंग्रेजों को लगा कि उनके मुंह से चीख निकलेगी लेकिन ऐसा न हुआ। बेंत पड़ने पर अवाज आई,
“भारत माता की जय।”

जितनी बार बेंत पड़ी उतनी बार यही नारा गूंजा। बेंतों के बाद जब कानून के अनुसार उन्हें सांत्वना राशी दी गयी तो उन्होंने वह राशी जेलर के मुंह पर मारी। बहार यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी। इसलिए बहुत सारे लोग चन्द्रशेखर के स्वागत के लिए जेल के बहार इकट्ठे हो गए।

उम्र तो सिर्फ 14 साल थी लेकिन शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट था कि वो एक नौजवान युवा लगते थे। इस घटना के बाद उनके घर वाले उनको घर वापस ले जाने के लिए आये। परन्तु आजाद अब देश को समर्पित हो चुके थे। उनके लिए अब देश को आजाद करवाने की जिमेवारी हर जिम्मेवारी से बड़ी थी।

सन् 1921 में गाँधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन छेड़ा हुआ था जोकि चौरा-चौरी की घटनाके बाद गांधीजी द्वारा वापस ले लिया गया। यह फैसला बिना किसी से पूछे लिया गया था। जिस कारण देश के तमाम नवयुवकों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। तब रामप्रसाद बिस्मिल और शचिन्द्र नाथ सान्याल ने अपने-अपने क्रन्तिकारी दलों को मिलकर 1924 में एक दल “हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ ( एच.आर.ए. )” का गठन किया। जिसका मुख्यालय उत्तर प्रदेश में था। आजाद इस पार्टी में नये सदस्यों को भरती करने के लिए अक्सर साधू या पंडित का भेष बना कर घुमते रहते और युवाओं के मन को, चरित्र, उत्साह, विश्वसनीयता समर्पण व उनके साहस को टटोल कर दल का सदस्स्य बना लेते थे।

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Sandeep Kumar Singh

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2 लोगो के विचार

  1. kadamtaal says:

    चन्द्रशेखर आजाद का जीवन परिचय पढ़कर अच्छा लगा। इन महान विभूतियों के बारे में आज की पीढ़ी को जानकारी होनी चाहिए। आप वास्तव में ब्लाग के द्वारा समाज कल्याण का कार्य कर रहे हैं।

    • Mr. Genius says:

      हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया। आशा करते हैं सब लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेंगे।

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