भगवद् गीता पेन से, मधुशाला सुईं से, गीतांजलि मेहन्दी कोन से लिखी

जिंदगी एक हादसों भरा सफ़र है। कई बार ये हादसे एक इंसान की जिंदगी बदल देते हैं। बदलाव कैसा होता है ये उस इन्सान पर निर्भर करता है जिसके साथ ये हादसा हुआ है। ऐसा बहुत कम देखा जाता है कि किसी हादसे के बाद इन्सान आगे बढ़ने की हिम्मत करे। उसकी जिंदगी गुमनामियों में कहीं खो जाती है। लेकिन इस धरती पर कुछ ऐसे इन्सान भी हैं जो इन हादसों के बावजूद जिंदगी से हार नहीं मानते। वो एक अद्भुत कलाकार के रूप में उभरते हैं। ऐसे लोग फिर इतिहास रचते हैं। ऐसा इतिहास जिसके बारे में किसी ने सोचा भी न हो। आज ऐसे ही एक इंसान के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं जिसने लिखा है भगवद् गीता पेन से, मधुशाला सुईं से, गीतांजलि मेहन्दी कोन से  :-

भगवद् गीता पेन से

जी हाँ इनका नाम है :- पीयूष गोयल। इनका जन्म 10 फरवरी, सन 1967 को उत्तर प्रदेश के दादरी गाँव में हुआ। इनकी माता जी का नाम श्रीमती रविकांता एवं इनके पिता जी का नाम डॉ. दवेंद्र कुमार गोयल है। पियूष गोयल जी ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। सन 2000 में इनकी हंसती-खेलती जिंदगी में एक ऐसा तूफ़ान आया जिससे उबरने में इन्हें 9 महीने का समय लगा। जी हाँ, एक एक्सीडेंट के कारण इन्हें 9 महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा।

कोई और होता तो शायद अपनी किस्मत को कोसता रहता। लेकिन जिसके मन में आगे बढ़ने की भावना हो और दिल में कुछ करने का जज्बा हो। वो किसी भी हालात में अपना हुनर दिखा ही देते हैं। इन 9 महीनों में पियूष गोयल जी ने श्रीमद्भगवद गीता को सिर्फ पढ़ा ही नहीं अपने जीवन में भी उतारा। जिस तरह एक नवजात शिशु का जन्म 9 महीने बाद होता है। उसी तरह पियूष गोयल जी ने इन 9 महीने के समय में खुद को कुछ नया करने के लिए तैयार कर लिया था। यही था उनका नया अवतार।

इसके बाद जब 49 वर्षीय पीयूष गोयल अपने धुन में रमकर कुछ अलग करने में जुट गए तो वे शब्दों को उल्टा लिखने (मिरर शैली) में लग गए। फिर अभ्यास ऐसा बना कि उन्होंने कई किताबें लिख दीं। पियूष गोयल जी की लिखीं पुस्तकें पढ़ने के लिए आपको दर्पण का सहारा लेना पड़ेगा। उल्टे लिखे अक्षर दर्पण में सीधे दिखाई देंगे और आप आसानी से उसे पढ़ लेंगे। उसके बाद वे इस धुन में ऐसे रमे कि कई अलग-अलग सामग्री से कई पुस्तकें लिख दीं।

फिर इन्होंने लिखने के कई और ढंग इजाद किये और उन्होंने भारत की प्रसिद्द पाँच पुस्तकें पाँच अलग -अलग ढंग से लिख दीं। ये पुस्तकें हैं उल्टे अक्षरों में श्रीमद्भभगवद गीता, सुई से मधुशाला, मेंहंदी से गीतांजलि, कार्बन पेपर से पंचतंत्र के साथ ही कील से पीयूष वाणी।

अलग-अलग ढंग से कियाबें लिखने के पीछे भी कोई न कोई किस्सा जुड़ा है। जैसे कि पीयूष गोयल जी बताते हैं कि कुछ लोगों ने उनसे कहा कि आपकी लिखी किताबें पढ़ने के लिए शीशे की जरूरत पड़ती है। कुछ ऐसा करें कि दर्पण की जरूरत न पड़े। इस पर पीयूष गोयल जी ने एक नया ढंग निकला और सुई से मधुशाला लिख दी।

हरिवंश राय बच्चन जी की पुस्तक ‘मधुशाला’ को सुई से मिरर इमेज में लिखने में पियूष जी को करीब ढाई माह का समय लगा। गोयल जी की मानें तो यह सुई से लिखी ‘मधुशाला’ दुनिया की अब तक की पहली ऐसी पुस्तक है जो मिरर इमेज व सुई से लिखी गई है।

आइये देखते और पढ़ते हैं एक अद्भुत कलाकार की उन पाँच पुस्तकों के बारे में जो उन्होंने पाँच अलग-अलग ढंग से लिखी हैं :-

1. उल्‍टे अक्षरों से लिख गई भगवद् गीता पेन से( Bhagwat Gita )

भगवद् गीता पेन से

आप इस भाषा को देखेंगे तो एकबारगी भौचक्के रह जायेंगे। आपको समझ में नहीं आयेगा कि यह किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है। पर आप जैसे ही दर्पण ( शीशे‌ ) के सामने पहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी। सारे अक्षर सीधे नजर आयेंगे। मिरर इमेज में यह विश्व की पहला श्रीमदभागवत गीता है।

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2. सुई से लिखी मधुशाला ( Madhu shala)

सुई से लिखी मधुशाला

ये ऐसा कारनामा है कि देखने वालों आँखें खुली रह जाएगी और न देखने वालों के लिए एक स्पर्श मात्र ही बहुत है। यह पुस्तक मिरर इमेज में लिखी गयी है और इसको पढ़ने लिए शीशे की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि रिवर्स में पेज पर शब्दों के इतने प्यारे मोतियों जैसे पृष्ठों को गुंथा गया है, जिसको पढ़ने में आसानी रहती हैं और यह सूई से लिखी ‘मधुशाला’ दुनिया की अब तक की पहली ऐसी पुस्तक है जो मिरर इमेज व सूई से लिखी गई है। इस कारनामे के लिए पियूष जी का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स, इंडिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड और एवेरेस्ट वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज है।

3. मेंहदी कोन से लिखी गई गीतांजलि ( Gitanjali )

 मेंहदी कोन से लिखी गई गीतांजलि

ये पीयूष गोयल जी का एक और बेहतरीन कारनामा है। 1913 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ को उन्होंने ‘मेंहदी के कोन’ से लिखा है। उन्होंने 8 जुलाई 2012 को मेंहदी से गीतांजलि लिखनी शुरू की और सभी 103 अध्याय 5 अगस्त 2012 को पूरे कर दिए। इसको लिखने में 17 कोन तथा दो नोट बुक प्रयोग में आई हैं। इस पुस्तक के लिए इनको इंडिया बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में स्थान मिला है। पीयूष जी श्री दुर्गा सप्त शती, अवधी में सुन्दरकांड, आरती संग्रह, हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में श्री साईं सत्चरित्र भी लिख चुके हैं। ‘रामचरितमानस’ ( दोहे, सोरठा और चौपाई ) को भी लिख चुके हैं।

4. कार्बन पेपर की मदद से लिखी ‘पंचतंत्र’ ( Carbon paper written ‘Panchatantra’ )

कार्बन पेपर की मदद से लिखी 'पंचतंत्र'

गहन अध्ययन के बाद पीयूष ने कार्बन पेपर की सहायता से आचार्य विष्णुशर्मा द्वारा लिखी ‘पंचतंत्र’ के सभी ( पाँच तंत्र, 41 कथा ) को लिखा है। पीयूष गोयल ने कार्बन पेपर को (जिस पर लिखना है) के नीचे उल्टा करके लिखा जिससे पेपर के दूसरी और शब्द सीधे दिखाई देंगे यानी पेज के एक तरफ शब्द मिरर इमेज में और दूसरी तरफ सीधे।

5. कील से लिखी ‘पीयूष वाणी’

कील से लिखी 'पीयूष वाणी'

पुस्तक ‘पीयूष वाणी’ पियूष जी की खुद की लिखी किताब है जिसे उन्होंने दुबारा कील से ए-फोर साइज की एल्युमिनियम शीट पर लिखा है। पीयूष जी से जब ये पूछा गया कि उन्होंने ये पुस्तक कील से क्यों लिखी है? तो उन्होंने बताया कि वे इससे पहले दुनिया की पहली सुई से स्वर्गीय श्री हरिवंशराय बच्चन जी की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘मधुशाला’ को सुई से लिख चुके हैं। या दुनिया की पहली ऐसी पुस्तक है जो सुई से लिखी गई है। इसके बाद उन्हें विचार आया कि क्यों न कील से भी प्रयास किया जाये सो उन्होंने ए-फोर साइज के एल्युमिनियम शीट पर भी लिख डाला।

इनकी प्रतिभा को सिर्फ भारत ही नहीं अपितु भारत के बहार भी सराहा जा रहा है। इसीलिए इनके रचनात्मक एवं कलात्मक योगदान और कई रिकार्ड्स बनाने के कारण लन्दन की वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी ने इन्हें वर्ष २०१४ में ऑनरेरी डॉक्ट्रेट की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त वे होल्डर रिपब्लिक अवार्ड से सम्मानित हैं।

अप्रतिम ब्लॉग भी भारत की इस प्रतिभा को सलाम करता है। हुनर किसी पहचान की मोहताज नहीं होती। जब वो सामने आती है तो लोगों के सिर उसके आगे खुद-ब-खुद झुक जाते हैं और उसे खूब शाबाशी मिलती है।

यदि आपके अन्दर या आस-पास भी है ऐसा हुनर तो लिख भेजिए हमें उसके बारे में। हम उसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने का प्रयत्न करेंगे। जिससे एक किसी की प्रतिभा को एक नई पहचान मिल सके। धन्यवाद।

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